Sunday 24 October 2021
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स्वास्थ्य कर्मियों के बलिदान का उचित सम्मान

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विश्वव्यापी कोविड-19 महामारी के प्रकोप को सहते हुए समाज के एक अंश ने चीनी मूल के घातक रोगज़नक़ के साथ जान का जोख़िम उठाते हुए अविराम युद्ध किया है। संसाधनों के अभाव और कौन सी दवा कारगर सिद्ध होगी, इस दुविधा के बीच भारत के अस्पतालों के वार्डों में, चिकित्सक, सेविका और स्वास्थ्यसेवा कर्मी हर दिन, नक़ाबपोश, नींद से वंचित लोगों की जान बचाने के अथक प्रयास में जुटे रहे हैं। अपने करियर में पहली बार एक साथ इतने बीमार और इतने शव इन योद्धाओं ने देखा और ऑक्सीजन तथा जीवनरक्षक औषधि की कमी के बावजूद मरीज़ों और उनके परिजनों को ये आश्वस्त करते रहे। वे कोविड-19 आइसोलेशन वार्ड में उन लोगों के अंतरंग, एकाकी दुःख के भी साक्षी रहे हैं जिनसे एक दुर्लभ मानवीय संबंध भी उनके बन गए होंगे, एक ऐसा संबंध जिसका सूत्र कभी भी कट सकता है। उन्होंने कई रोगियों के अंतिम क्षणों में उनके प्रियजनों को हिम्मत न हारने का उपदेश देते हुए स्वयं के भीतर कुछ टूटकर बिखरता हुआ महसूस किया होगा। मौत के साथ अपने दैनिक मुठभेड़ों के बीच कई बार उन्होंने माहौल को हल्का करने की कोशिश भी की — कभी पीपीई सूट और अस्पताल की वर्दी में नृत्य किया तो कभी उत्साहवर्द्धक प्रवचन करते हुए वीडियोज़ साझा किए। यदि महामारी ने कभी-कभी मानवीय पूर्वाग्रहों और व्यवस्थागत असमानताओं के जघन्य स्वरूप को सामने लाया है तो इसने विज्ञान के अदम्य साहस और सेवा की भावना को भी देखा है। पिछले लगभग दो वर्षों में चिकित्सा समुदाय ने मानवीय मूल्यों का सर्वोत्तम उदाहरण प्रस्तुत किया है। हाल ही में विंबलडन में एनएचएस कार्यकर्ताओं के लिए स्वतःस्फूर्त अभिवादन ने समाज की कृतज्ञता को अंतरराष्ट्रीय पटल पर रख दिया और उसी भावना को कल भारत में राष्ट्रीय चिकित्सक दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की श्रद्धांजलि ने प्रतिध्वनित किया।

कोरोनावायरस से ग्रसित बीमारों की मृत्यु दर के उतार-चढ़ाव के बीच चिकित्सा समुदाय को जो क़ीमत चुकानी पड़ी है, उसका मूल्यांकन स्यात असंभव हो क्योंकि कोविड -19 से 1,500 से अधिक डॉक्टरों की मौत हो गई है, जिनमें से 800 लोगों की जान दूसरी लहर में चली गई लेकिन अन्य कथित frontline कर्मियों की तरह इन्होंने मांगों का पिटारा सर पर लिए हड़ताल नहीं कर दिया बल्कि स्वजनों को खोये हुए लोगों ने जब इनपर हमला किया तो अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए इन्होंने केवल मूक विरोध दर्ज किया। हालांकि डॉक्टर स्वास्थ्य कर्मियों के पदानुक्रम के शीर्ष पर बैठे हैं, नर्सों और वार्ड बॉयज़ के बलिदान कुछ कम नहीं हैं। इस संवेदनशील कार्यक्षेत्र में जब असंतोष और रोष दिखाई दिए तो अस्पतालों ने अस्थायी अनुबंधों पर स्वास्थ्य कर्मियों को काम पर रखा। ऐसे उच्च तनाव वाले वातावरण में क़रीब दो साल तक सेवा देते हुए इस क्षेत्र से मनोरोग के कई केसेज़ बाहर आ सकते हैं, जिसकी तयारी देश ने अभी तक की नहीं है।

कोविड -19 महामारी ने तंत्र की सीमितताओं को उजागर तो किया पर यह कहना उचित होगा कि स्वास्थ्य विभाग के सैनिकों के बिना स्थिति और भयावह हो सकती थी। राष्ट्रीय संसाधनों की पर्याप्त आपूर्ति के संकल्प द्वारा ही उनकी सेवा का सम्मान किया जा सकता है। साथ ही ग़लत सूचनाओं और अफ़वाहों का खंडन और विज्ञान के प्रति नई प्रतिबद्धता से देश डॉक्टरों, नर्सों व अन्य स्वास्थ्य कर्मियों का सम्मान कर सकता है।

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