राजनीति में अतिशयोक्ति आम बात है, पर कुछ चुनावी वादे और दुश्मन ख़ेमे पर लगाए गए चंद इलज़ामात फिर भी हज़म नहीं होते। शुक्रवार कुछ ऐसा ही बोल गईं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी-वाड्रा। उत्तर प्रदेश के मिर्ज़ापुर में भाषण देते हुए उन्होंने वोटरों को यह कहकर बरगलाने की कोशिश की कि प्रधानमंत्री-किसान योजना के तहत जो रु० 2,000 की पहली क़िस्त ग़रीब किसानों को सरकार कि तरफ़ से दी गई है वह वापस ले ली जाएगी! प्रियंका ने यह तो नहीं समझाया कि यह संभव कैसे हो सकता है या फिर जिन किसानों ने पैसे बैंकों से निकाल लिए हैं उनके खाते से दो-दो हज़ार आखिर कैसे वापस ले लिए जायेंगे, पर इस बेतुके इलज़ाम से उनकी परिपक्वता पर सवाल ज़रूर उठ खड़ा हुआ है। यदि बरसों तक कांग्रेस के कार्यकर्ता यह मना रहे थे कि राहुल गांधी के राजनीति में बतौर नेता असफल होने के बाद अब प्रियंका ‘दीदी’ ही उनकी नैया पार लगा सकती हैं तो उनकी आशाओं पर पानी फिर गया है। पिछले 15 वर्षों से बारम्बार, अलग-अलग भाषणों और साक्षात्कारों के दौरान ज़ुबानी फिसलन और तैयारी के अभाव के कारण आज भाई की छवि की जो दुर्दशा है, क्या बहन ने उससे कोई शिक्षा नहीं ली? इससे पहले तैश में आकर जब प्रियंका ने किसी कार्यकर्ता से टीवी कैमरा के सामने कह दिया था कि वे वाराणसी से चुनाव लड़ने के लिए तत्पर हैं और फिर कांग्रेस ने उनके सपने को परवान नहीं चढ़ने दिया तो पार्टी की किरकिरी हो गई थी। उस समय सैम पित्रोदा का यह कहना कि प्रियंका के पास चुनाव लड़ने से कहीं बड़े दायित्व हैं और राजीव शुक्ला का यह बयान कि वे लड़ना तो चाहती थीं लेकिन पार्टी ने मौक़ा नहीं दिया — परस्पर विरोधी वक्तव्य थे।

यह तो उस मीडिया का भला हो जो 2008-09 से परिवार के धरोहर के प्रमोशन में लगी हुई है जिसने इस मौक़े पर भी प्रियंका को बचा लिया, वरना जग हँसाई और हुई होती। ख़बर यह बनी कि प्रियंका का कहना है कि नरेन्द्र मोदी और अमिताभ बच्चन के बीच किसी को भी प्रधानमंत्री बना दिया जाए तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि दोनों अभिनेता हैं और लोगों के काम दोनों में से किसी को भी नहीं करना! प्रश्न यह नहीं है कि क्या प्रियंका बच्चन परिवार के साथ कोई पुराना हिसाब बराबर करना चाह रही थी। प्रश्न यह है कि अपनी बात वोटरों तक पहुँचाने के लिए फूहड़पन का सहारा क्यों लिया जाए? हालांकि उत्तर प्रदेश में मोदी के टक्कर में सपा-बसपा-रालोद का गठबंधन खड़ा है और कांग्रेस के द्वारा अधिक से अधिक यह हो सकता है कि वे मोदी-विरोधी ख़ेमे में फूट दाल दे जिसका फ़ायदा भाजपा को मिले, यदि पित्रोदा की बात सही है तो प्रियंका अपनी “बड़ी ज़िम्मेदारी” का तमाशा क्यों बना रही हैं? जिस राज्य से कांग्रेस का नामोनिशान मिट गया हो वहाँ पार्टी को पुनर्जीवित करना बच्चों का खेल नहीं है। बचकानी बातों का लेकिन नतीजा यही होगा कि वोटर के साथ-साथ कार्यकर्ता और समर्थक भी इधर-उधर छिटक जायेंगे।

आर्थिक नीतियों के आधार पर मोदी सरकार को घेरने की गुंजाइश है पर इसे कांग्रेस के शीर्ष परिवार ने गँवा दिया है। एक तरफ़ राहुल गांधी अपनी ‘न्याय’ योजना को समझाते हुए कहीं रु० 72,000 सालाना की जगह रु० 72,000 मासिक बोल जाते हैं तो कहीं यह समझाने में नाकाम होते हैं कि बिना मध्यम वर्ग पर टैक्स का बोझ लादे रु० 3.60 लाख करोड़ आयेंगे कहाँ से। पाँच दशकों से अधिक जिस पार्टी की सरकार ने उद्योगों को आज़ादी देने के बजाय निजी प्रकल्पों को हड़पने का काम किया, आज जब वही पार्टी युवाओं को आश्वासन देती है कि उनके द्वारा स्टार्ट-अप खोले जाने पर पाँच साल तक किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी तो विश्वास करना मुश्किल हो जाता है। इस वक़्त नौकरियों का अभाव है, यह समझाने के लिए राहुल ने एक बार भी न तो एनएसएसओ और न ही श्रम मंत्रालय के आंकड़ों का हवाला दिया; सिर्फ़ ‘मोदी आपको पकोड़े वाले बना देंगे’ यही कहते रहे। जब वे 22 लाख सरकारी नौकरियाँ साल भर में देने का वादा करते हैं तो यह भी हिसाब नहीं रखते कि केंद्र सरकार के पास इतनी नौकरियाँ हैं ही नहीं और गिने-चुने राज्यों में कांग्रेस की सरकारें हैं। ऐसे में कांग्रेस को कम से कम सोनिया गांधी जितनी परिपक्वता की आवश्यकता थी जिन्होंने भले ही मोदी को “मौत का सौदागर” बतलाकर गुजरात में अपनी हार को दावत दी थी, पर ऊलजुलूल बातें उनसे कम ही सुनी गईं। चूँकि उनका स्वास्थ्य साथ नहीं दे रहा, बेटी प्रियंका को नेतृत्व का रिक्त स्थान भरना चाहिए था। पर शारीरिक कमज़ोरी की हालत में भी सोनिया विपक्षी पार्टियों को एकजुट करने की कोशिश में लगी हुई हैं, जिसपर उनके बेटे राहुल का ध्यान ही नहीं गया। और प्रियंका के बारे में उतने ही हलके पत्रकार अगर यह कह रहे हैं कि उनके नैन-नक़्श इंदिरा गांधी से मिलते हैं तो तुलना की वहीं समाप्ति हो जानी चाहिए। भाई-बहन में अपना मज़ाक़ उड़वाने की प्रतिस्पर्धा चल रही है।