अपनों से अपनी बात कहना कठिन होता है, क्योंकि अपने सुनने में कम, सुनाने में ज्यादा विश्वास करते हैं। ‘घर का जोगी जोगड़ा आन गांव का सिद्ध’ वाली बात होती है। गनीमत है कि देश के मौजूदा राष्ट्रपति डॉ रामनाथ कोविंद के साथ ऐसा नहीं हुआ। उनकी बात सलीके से सुनी गई। उन पर अमल की बात भी कही गई। मगर, यह सब कब तक पूरा होगा, उस पर कितना अमल हो पाएगा, यह तो नहीं कहा जा सकता, लेकिन इतना तो तय है ही कि अगर उनकी सलाह पर शतांश भी अमल हुआ तो भी इस देश का कायाकल्प होते देर नहीं लगेगी।

राष्ट्रपति दो दिन अपने गृह जनपद कानपुर में रहे। वहां उन्होंने कई कार्यक्रमों में शिरकत कर कानपुर से अपनी सघन आत्मीयता और नजदीकी का अहसास कराया। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के दीक्षांत समारोह में उन्होंने विद्यार्थियों से अपने अर्जित ज्ञान को सामाजिक सरोकारों से जोड़ने की अपील की। उन्हें बताया कि एक भी विद्यार्थी आगे बढ़ता है, तरक्की करता है तो इससे राष्ट्र की तरक्की होती है। छात्र आगे बढ़ेंगे तो देश आगे बढ़ेगा। लेकिन, यह सब तभी संभव हैं जब छात्र अपने से बड़ों से प्रेरणा लें, बड़ा सोचें और बड़ा करें। कुछ नया और अलहदा करें। जो भी काम हाथ में लें, पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी से उसे पूरा करें। उन्होंने छात्र-छात्राओं को इस बात की नसीहत भी दी कि वे हमेशा अनुशासित रहें, उदार बनें और असफलता से न डरें। निर्धारित और सधे हुए लक्ष्य से तैयारी करें। कामयाबी आपके कदम चूमेगी। निश्चित रूप से उनके ये विचार दीक्षांत समारोह में मौजूद छात्र-छात्राओं का मार्गदर्शन करेंगे।

राष्ट्रपति सर्वोच्च पद है। राष्ट्रपति देश का प्रथम नागरिक होता है। देश को आगे ले जाना ही उसका एकमेव अभीष्ठ होता है। राष्ट्रपति का उद्बोधन इस अभीष्ठ का ही शंखनाद है। इस देश में प्रतिभाओं की कमी नहीं है। कमी है तो उनके सही मार्गदर्शन की। उन्होंने विद्यार्थियों को जो नसीहत दी है, उसमें यह भी है कि अपनी पेशेवर जिंदगी में वे थोड़ा वक्त अपने और परिवार के लिए निकालें। व्यस्त जिंदगी में व्यायाम और योग जरूर करें। खेलें-कूदें। संगीत सुनें। घूमें-फिरें। इससे तनाव कम होगा और नयेपन की भी अनुभूति होगी। यह नसीहत सुनने में सामान्य लग सकती है लेकिन इसके फायदे बड़े हैं। उन्होंने विद्यार्थियों को निरंतर विनम्र और अहंकार रहित जीवन जीने की भी सलाह दी है। विनम्रता को तो उन्होंने सफलता का राज करार दिया। उन्होंने भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के छात्र-छात्राओं से ऐसी तकनीक विकसित करने की अपील की, जिससे गंगा में प्रदूषण का स्तर कम किया जा सके। उन्होंने कानपुर को फिर उत्तर प्रदेश का मैनचेस्टर बनाने में सहयोग देने का भी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान कानपुर के छात्रों से आग्रह किया। उन्होंने शिक्षाविदों से भी अपील की कि वे सामाजिक समस्याओं के समाधान के लिए आगे आएं। कुछ खास करें। वकीलों को राष्ट्र निर्माता बताकर उन्होंने कानपुर ही नहीं, देश भर के वकीलों का मस्तक गर्व से ऊंचा कर दिया है। राष्ट्रपति चूंकि खुद भी वकालत पेशे से जुड़े रहे हैं, इसलिए इससे पेशे से उनका जुड़ाव स्वाभाविक भी है। कानपुर बार एसोसिएशन की आजीवन सदस्यता भी उन्होंने बड़े ही प्रेम से वापस की है। इससे कानपुर के वकीलों को झटका तो जरूर लगा होगा। राष्ट्रपति ने वकीलों को जिम्मेदारी से काम करने, गरीबों की मदद करने और महिलाओं के हित को प्राथमिकता देने की नसीहत दी है। उनकी नसीहत में वादकारियों का दर्द और परेशानी भी प्रमुखता से उभरी है। उनका मानना है कि वादकारी जब कचहरी में आता है तो वह मजबूती से खड़ा नहीं हो पाता। उसकी चिंता वकीलों को करनी चाहिए। वादकारी जब अपने मुकदमे की पैरवी के लिए कचहरी पहुंचता है तो उसे लगता है कि उसे आज कुछ खास मिलेगा लेकिन जब दोपहर बाद अगली तारीख उसके हाथ लगती है तो उसकी मानसिक स्थिति क्या होती है, इसका आकलन नहीं किया जा सकता। वकीलों की आए दिन होने वाली हड़ताल को भी उन्होंने न्याय व्यवस्था के सुचारु संचालन की बाधा करार दिया। उन्होंने यह भी कहा कि वकालत और चिकित्सकीय पेशे में कमाई के अवसर तो हैं लेकिन इसमें सिद्धांत भी है। अन्य दूसरे पेशे में एथिक्स नहीं है। राष्ट्रपति की यह बात अन्य पेशों से जुड़े लोगों को नागवार भी गुजर सकती है लेकिन वकीलों को राष्ट्रनिर्माता कहकर, उन्हें महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर,पं. जवाहर लाल नेहरू और मोतीलाल नेहरू की विरासत बताकर उन्होंने वकीलों को जो प्रेरणा दी है, अगर उस पर वकीलों ने जरा भी अमल किया, तो इससे उनकी छवि तो सुधरेगी ही, देश को न्याय मिलने में भी सहूलियत होगी। उन्होंने देश में तीन करोड़ मुकदमों के लंबित होने पर चिंता जताई और इस बात का भी जिक्र करना वे नहीं भूले कि इनमें से 6 लाख मामले तो 10 साल से ऊपर के हैं।

राष्ट्रपति पहले राजनेता नहीं हैं जिन्होंने देश हित में छात्रों, बुद्धिजीवियों, वकीलों, चिकित्सकों, शिक्षाविदों और वैज्ञानिकों से इस तरह की अपील की है, उनके पूर्व के राष्ट्रपति भी इस तरह की अपील करते रहे हैं। प्रधानमंत्री तो अपने मन की बात में, अपनी किसी भी जनसभा में देश को आगे ले जाने की समाज के सभी वर्गों से अपील करते रहे हैं। उन्हें सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की सलाह देते रहे हैं। सवाल यह है कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की बार-बार सलाह देने की जरूरत क्यों पड़ रही है। जो शिक्षा प्राइमरी में ही मिल चुकी है, उच्च शिक्षा प्राप्त विद्यार्थियों को भी, पढ़े-लिखे बुद्धिजीवी वर्ग को भी अगर सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की सलाह दी जाए तो इसका मतलब है कि हम अपने जीवन लक्ष्य से कहीं न कहीं भटक चुके हैं। स्व तक ही सीमित हो गए हैं। अपने फायदे के लिए सामाजिक कायदे-कानून की अनदेखी कर रहे हैं। जब हम अपने परिजनों को ही अहमियत नहीं दे रहे तो समाज हमसे क्या उम्मीद करे। इस गिरावट के मूल में जाना होगा। केवल नसीहतों से काम नहीं होगा। रणनीतिक तौर पर इस समस्या से निपटना होगा। जीवन में पैसा ही काफी नहीं है। रोजी-रोटी के चक्कर में परिवार, समाज और देश की अनदेखी उचित नहीं है। पड़ोसी का खेत सूखा रहेगा तो इससे विद्रोह की स्थिति उत्पन्न होगी। रोटी, कपड़ा और मकान इस देश की मूलभूत जरूरत है लेकिन उससे भी बड़ी जरूरत है नैतिक उत्थान, आत्मिक उत्थान। इसके बिना बात नहीं बनने वाली। वकीलों के आचरण पर, वादकारियों से उनके व्यवहार पर, अदालतों में आए दिन होने वाली हड़ताल पर निरंतर सवाल उठते रहते हैं। अब जब राष्ट्रपति ने उन्हें राष्ट्र निर्माता करार दिया है तो उम्मीद की जा सकती है कि इसका लाभ देश की न्याय व्यवस्था को मिलेगा। देश को आगे ले जाना सबका काम है लेकिन यह तभी संभव है जब सभी ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी से अपना दायित्व निभाएं और अर्जित आय का एक अंश राष्ट्रनिर्माण में लगाएं। गिरों को उठाएं और उन्हें आत्मनिर्भर बनाएं।