Monday 18 October 2021
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HomePoliticsIndiaदलित वनाम दलित — कोविंद के ख़िलाफ़ उतरेंगे बाबासाहेब के पौत्र?

दलित वनाम दलित — कोविंद के ख़िलाफ़ उतरेंगे बाबासाहेब के पौत्र?

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नई दिल्ली — अभी-अभी ख़बर मिली है कि सीपीआईएम महासचिव सीताराम येचुरी ने कहा है कि गोपाल कृष्ण गांधी या प्रकाश अम्बेडकर विपक्ष के उम्मीदवार हो सकते हैं। हालांकि उनकी पहली पसंद गोपाल गांधी हैं। परन्तु दलित-विरोधी बतलाए जाने का जोख़िम उठाने से घबरायी हुई विपक्ष की अधिकाँश पार्टियाँ आंबेडकर के समर्थन में खड़ी होंगी।

प्रकाश यशवंत आम्बेडकर भारत रत्न डॉ भीमराव आंबेडकर के पौत्र है तथा यशवंत भीमराव अम्बेडकर के पुत्र हैं। वे संसद के दोनोँ सदन राज्यसभालोकसभा के सांसद रह चुके है।

आंबेडकर का जन्म 10 मई 1954 को (मुंबई, महाराष्ट्र, भारत) में हुआ था। उनके पिता का नाम यशवंत भीमराव अम्बेडकर, और माता का नाम मीराताई यशवंत अम्बेडकर है। प्रकाश अम्बेडकर अपने दादा, आधुनिक भारतीय संविधान के जनक के रूप में जाने जाते डॉ॰ भीमराव आंबेडकर द्वारा नामित किया गया था; प्रकाश अम्बेडकर .Stanislaus हाई स्कूल और सिद्धार्थ कॉलेज, मुंबई भारत में सिक्षा ली। उन्होंने 1982 के बाद से पूरे भारत में कई आंदोलनों का नेतृत्व किया। उनके भाई आनंदराज अंबेडकर रिपब्लिकन सेना का नेता है।

राष्ट्रपति चुनाव को लेकर गुरुवार को कांग्रेस की अगुवाई में 17 विपक्षी दलों की बैठक आज शाम के 4:30 बजे शुरू होगी। हालांकि नीतीश कुमार ने एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन का ऐलान करके विपक्ष खेमे में बेचैनी मचा दी है। नीतीश के इस फ़ैसले से लालू यादव जैसे उनके साथी कम से कम दो दिनों तक स्तब्ध रहे। राष्ट्रपति चुनाव में सोनिया और लालू के प्लान में नीतीश ने सेंध लगा दी है।

कांग्रेस की अगुवाई में बैठक तो हो रही है लेकिन अब विपक्ष के पास अपना राष्ट्रपति बनाने की ताक़त नहीं बची है। नीतीश कुमार के समर्थन के बाद एनडीए के राष्ट्रपति उम्मीदवार रामनाथ कोविंद के लिए पास उससे ज़्यादा वोट जुट चुके हैं, जितने में जीत होती है।

नीतीश को मनाने और विपक्षी गुट की एकता क़ायम रखने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद पटना गए लेकिन बातचीत लगभग विफल साबित हुई। ज़ाहिर है कि राष्ट्रपति पद के लिए रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की जोड़ी ने बिहार में चुनाव के वक्त बने लालू-नीतीश और कांग्रेस के महागठबंधन को हिला दिया है।

नीतीश कुमार की जेडीयू सांसदों-विधायकों से बातचीत के बाद पार्टी ने साफ़ कर दिया है कि वह बिहार के गवर्नर रहे रामनाथ कोविंद को ही राष्ट्रपति चुनावों में समर्थन देगी। ख़ास बात ये है कि जेडीयू ने इस ऐलान से पहले 22 जून होने वाली कांग्रेस व अन्य विपक्षी दलों की बैठक तक का इंतजार नहीं किया। नीतीश के इस रुख़ से सवाल उठ रहे हैं कि क्या बिहार में महागठबंधन अंतिम सांसें ले रहा है और नीतीश की एनडीए में घर वापसी हो सकती है?

कोविंद-नीतीश के बेहतर संबंध

जब से रामनाथ कोविंद बिहार के राज्यपाल बने, नीतीश कुमार से उनके बेहतर संबंध रहे हैं। एक भी ऐसा मौक़ा नहीं आया जब बतौर राज्यपाल कोविंद ने नीतीश सरकार के लिए मुश्किल पैदा की। ऐसे समय जब शराबबंदी पर बना ख़्त क़ानून विवादों में था और क़ानूनी स्तर पर इसकी आलोचना हो रही थी, राज्यपाल कोविंद ने इस पर अपनी सहमति बिना सवाल के दे दी। इसके अलावा कुलपतियों की नियुक्ति पर भी नीतीश की पसंद को अपनी सहमति दी। दोनों के बीच परस्पर संबंध बहुत अच्छे रहे।

महादलित दांव

नीतीश ने बिहार में अपनी राजनीतिक ज़मीन महादलित वोट के सहारे ही पाई थी। यही वोट इनका सबसे बड़ा दांव भी है। ऐसे में नीतीश का तर्क है कि अगर वह कोविंद का विरोध करते हैं तो इसका ग़लत संदेश जा सकता है। नीतीश का यह भी मानना है कि ताक में बैठी भाजपा उनके विरोध का उपयोग यूपी की तर्ज़ पर राजनीति करने के लिए कर सकती है। जेडीयू बिहार में दलित और अति पिछड़े तबक़े को अपने पक्ष में रखने की पूरी कोशिश कर रही है।

सभी विकल्प खुला रखने की कोशिश

नीतीश अलग राह चुनकर बिहार की राजनीति में सभी विकल्प खुला रखना चाहते हैं। जब लालू प्रसाद और उनके परिवार पर करप्शन से जुड़े नए केस आए तो बीजेपी ने उन्हें खुली पेशकश की कि वह उनके साथ आ जाएं। लेकिन नीतीश कुमार ने इस प्रस्ताव को ख़ारिज किया। लेकिन इस संभावना के बने रहने की बदौलत वह बिहार में राजनीतिक संतुलन भी बनाने में कामयाब रहे हैं।

राष्ट्रपति पद पर विपक्ष को एकजुट करने की शुरुआती पहल स्वयं नीतीश कुमार ने की थी! उनके अलग राह पकड़ने का पहला संकेत तब मिला था जब उन्होंने ऐन मौक़े पर 26 मई को विपक्ष की संयुक्त बैठक से खुद को अलग कर लिया था, जबकि उसके ठीक अगले दिन दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी की ओर से आयोजित लंच में शामिल हो गए थे।

बिहार के समीकरण

243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में बहुमत के लिए 122 विधायकों की संख्या चाहिए। इस समय जेडीयू के 71, आरजेडी के 80 जबकि कांग्रेस के 27 विधायकों वाली महागठबंधन सरकार चल रही है|यदि नीतीश आरजेडी से नाता तोड़कर एनडीए में जाते हैं तो कांग्रेस के 27 विधायक भी सरकार से हट जाएंगे। ऐसे में नीतीश को सरकार बचाने के लिए 51 और विधायकों की जरूरत होगी। विधानसभा में भाजपा के 53 विधायक हैं। इसके अलावा एलजेपी के 2, आरएलएसपी के 2, एचएएम के 1, सीपीआई एमएल लिब्रेशन के तीन और स्वतंत्र 4 विधायक हैं। यानी जेडीयू और बीजेपी मिलकर सरकार बना सकते हैं क्योंकि दोनों पार्टियों के विधायकों का आंकड़ा कुल मिलाकर 124 बैठता है।

महागठबंधन पर पड़ेगा असर

विपक्ष की ओर से अपना संयुक्त उम्मीदवार खड़ा करने के बावजूद नीतीश कुमार एनडीए उम्मीदवार को सहयोग देने के संकेत के बाद महागठबंधन की सेहत पर असर पड़ सकता है। अब विपक्ष के सामने दो बिंदुओं पर मंथन हो रहा है। या तो दलित के बदले किसी दलित चेहरे को ही उतारे या फिर दलित के बदले किसान कार्ड खेले। यह भी मंशा है कि साथ ही ऐसे नाम को चुनें जिसे शिवसेना के अलावा दक्षिण के दलों का भी सपोर्ट हासिल हो।

कोविंद के नाम के ऐलान के साथ ही विपक्षी दलों में बीजेडी, टीआरएस, वाईएसआर कांग्रेस ने तुरंत उन्हें सपोर्ट देने का ऐलान कर दिया था। नीतीश कुमार भी सपोर्ट दे सकते हैं। ऐसे में अब एनडीए के पास 60 फीसदी से अधिक वोट हैं। मंगलवार को विपक्षी दलों में आपसी मंत्रणा जारी रही। सूत्रों के अनुसार, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के साथ बैठक की। गुलाम नबी आजाद ने दूसरे विपक्षी दलों से संपर्क साधा। फिलहाल कांग्रेस मीरा कुमार, एमसए स्वामीनाथन, सुशील कुमार शिंदे, प्रकाश आंबेडकर के नाम पर विचार कर रही है और बैठक में इन में से किसी एक नाम पर समर्थन जुटाने का प्रय़ास करेगी। जबकि भाजपा को दलित कार्ड खेलने पर नीतीश समेत दक्षिण की कई पार्टियों का समर्थन पहले ही मिल चुका है।

वोट गणित

एनडीए के पास राष्ट्रपति चुनने के लिए अभी पांच लाख 32 हजार वोट हैं। ओडिशा की सत्ताधारी बीजेडी ने भी कोविंद का समर्थन किया है। बीजेडी के पास 37 हजार 257 वोट हैं। बीजेपी को दक्षिण भारत की दो प्रमुख पार्टियां वाईएसआर कांग्रेस और टीआरएस का समर्थन भी हासिल है और अब नीतीश की पार्टी के भी 20 हजार 779 वोट एनडीए के खाते में आ गए। ऐसे में अब कोविंद के समर्थन में छह लाख 29 हजार 658 वोट हो गए हैं। जो जीत के लिए जरूरी पांच लाख 49 हजार 422 वोटों से कहीं ज्यादा हैं।

विपक्ष के पास अधिक विकल्प नहीं

विपक्ष के पास अधिक विकल्प नहीं हैं क्योंकि उद्धव को तोड़ने का कांग्रेस का मनसूबा नाकाम हो चुका है। मायावती विपक्ष की बैठक में शामिल होंगी लेकिन वो पहले ही दलित के नाम पर कोविंद को समर्थन करने का ऐलान कर चुकी हैं बशर्ते कि विपक्ष भी किसी दलित को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित न करे।

इससे पहले कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, पूर्व गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे या गोपाल कृष्ण गांधी के नाम पर कई नेताओं और पत्रकारों ने जमकर अनुमान लगाए।

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