Sunday 24 January 2021
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राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा का दलित कार्ड चल पड़ा

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Politics India राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा का दलित कार्ड चल पड़ा

सियासत में सही समय पर दूरदर्शी नजरिए से लिए निर्णय बेहद मायने रखते हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह सोमवार को राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए प्रत्याशी के तौर पर रामनाथ कोविन्द के नाम का ऐलान कर ऐसा कर दिखाने में सफल रहे। रामनाथ कोविन्द का जन्म उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की (वर्तमान में कानपुर देहात जिला), तहसील डेरापुर के एक छोटे से गांव परौंख में हुआ था। कोविन्द का सम्बन्ध कोरी या कोली जाति से है जो उत्तर प्रदेश में अनुसूचित जाति (दलित) के अंतर्गत आती है। वकालत की उपाधि लेने के पश्चात दिल्ली उच्च न्यायालय में वकालत प्रारम्भ की। वह 1977 से 1979 तक दिल्ली हाई कोर्ट में केंद्र सरकार के वकील रहे। 8 अगस्त 2015 को बिहार के राज्यपाल के पद पर नियुक्ति हुई।

उत्तर प्रदेश से पहले राष्ट्रपति हो सकते हैं रामनाथ कोविंद

कानपुर — प्रधान मंत्री के रूप में देश की कमान तो कई बार उत्तर प्रदेश संभाल चुका है, अब राष्ट्रपति बनने की तैयारी है। रविवार को इसका ऐलान भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने किया। कानपुर के रहने वाले व बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद का देश का अगला राष्ट्रपति बनने का रास्ता करीब-करीब तय हो चुका है। अभी चुनाव बाकी है, लेकिन संख्या के लिहाज से एनडीए उम्मीदवार कोविंद बहुत आगे हैं।

सोमवार को दिल्ली में भाजपा अध्यक्ष अमित शाह द्वारा राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के रूप में रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा करते ही शहरवासियों में खुशी की लहर दौड़ गई। कोविंद के करीबी बीएनएसडी शिक्षा निकेतन के प्रधानाचार्य डा. अंगद का कहना है कि कानपुरवासियों के लिए यह गर्व की बात है। महापौर कैप्टन जगतवीर सिंह द्रौण ने कहा कि यहां का कोई व्यक्ति देश का प्रथम नागरिक बने, इससे बड़ी बात और क्या हो सकती है। हमें तो बहुत खुशी है।

रामनाथ कोविंद के पहले केन्द्र की अटल बिहारी सरकार के दौरान 2002 के राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए उम्मीदवार डा. एपीजे अब्दुल कलाम के खिलाफ कानपुर की लक्ष्मी सहगल ने चुनाव लड़ा था, लेकिन वामपंथियों सहित कुछ ही पार्टियों का उनको समर्थन मिला और वह चुनाव हार गईं। अब कोविंद कानपुर से दूसरे राष्ट्रपति उम्मीदवार बने हैं और एनडीए की संख्या के आधार पर उनकी जीत तय है। रामनाथ कोविंद का जन्म 1945 में हुआ। वह कानपुर देहात की डेरापुर तहसील के परौख गांव के मूल निवासी हैं। आरएसएस से जुड़कर लगातार वह दलितों की भलाई के लिए काम करते रहे। कोविंद 1994 से 2006 तक लगातार दो बार राज्यसभा सांसद रहे। केन्द्र में 2014 में भाजपा की सरकार आते ही पार्टी ने एक बार फिर उन पर विश्वास जताया और बिहार का राज्यपाल बना दिया।

भाजपा ने एक तीर से साधे कई निशाने, विरोधी चित्त

लखनऊ — भाजपा के इस दांव से विरोधी दल चारों खाने चित नजर आ रहे हैं। उनमें आपसी फूट भी तय मानी जा रही है।
भाजपा ने कोविन्द का नाम घोषित कर एक तीर से कई निशाने साधे हैं। लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेताओं का नाम इस रेस में होने की अटकलों के बीच विपक्ष को यकीन था कि इस बार उसकी सियासत परवान चढ़ेगी, लेकिन जिस तरह से कोविन्द के नाम का ऐलान हुआ, उसने विपक्ष के किले में सेंध लगाने का काम किया है। बेहद सरल स्वभाव के रामनाथ कोविन्द का सियासी कैरियर पूरी तरह से निर्विवाद रहा है। साफ-सुथरी राजनीति करने वाले कोविन्द जहां अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के समय में भी पार्टी में अहम ओहदों पर रहे हैं, वहीं संगठन में भी उनकी पकड़ मजबूत मानी जाती है। बिहार के राज्यपाल रहते हुए उनके वहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी अच्छे सम्बन्ध हैं।

कोविंद दो बार राज्यसभा सांसद रहने के साथ पार्टी का प्रमुख दलित चेहरा भी रहे हैं। ऐसे में दलित चेहरे को आगे बढ़ाकर भाजपा ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की सुप्रीमो मायावती को भी घेरने की कोशिश की है। मायावती हमेशा आरोप लगाती रही हैं कि भाजपा दलित विरोधी है और उसके नेता सिर्फ वोटबैंक के लिहाज से दलितों के घर जाते हैं। इस लिहाज से अब मायावती को दलितों को समझा पाना बेहद मुश्किल होगा कि राष्ट्रपति पद के लिए एक योग्य, अनुभवी दलित को प्रत्याशी बनाकर भाजपा ने आखिर कैसे दलित विरोधी काम किया है?

शायद यही वजह है कि मायावती अब बैकफुट पर हैं। उन्होंने कहा है कि रामनाथ कोविन्द के दलित होने के कारण बसपा की उनके प्रति सोच सकारात्मक है। वहीं उन्होंने विपक्ष को नसीहत देते हुए भी कहा है कि अगर विपक्ष कोई लोकप्रिय दलित का नाम इस पद के लिए लाता है तो वह उस पर भी विचार करेंगी। जाहिर है कि विपक्ष के लिए राष्ट्रपति चुनाव को दलित बनाम दलित बनाना आसान नहीं होगा। ऐसे में यह तय माना जा रहा है कि कोविन्द के जरिए भाजपा ने विपक्ष के किले में सेंध लगा ली है। अब अगर मायावती कोविन्द की उम्मीदवारी का आगे किसी वजह से विरोध भी करती हैं, तो उनके लिए यह आत्मघाती राजनीति का सबब बन सकता है।

इसके अलावा समाजवादी पार्टी (सपा) की बात करें तो पार्टी संरक्षक मुलायम सिंह यादव हाल ही में भाजपा नेताओं के साथ बैठक में कह चुके हैं कि अगर एनडीए की ओर से घोषित प्रत्याशी कट्टर भगवा सोच वाला न हो और वह सबको मंजूर हो, तो वह उसका समर्थन करेंगे। ऐसे में भाजपा ने मुलायम की पहली शर्त तो पूरी कर ही दी है। कुछ इसी तरह की स्थिति पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव की होगी। राहुल से दोस्ती से बाद अखिलेश का कांग्रेस प्रेम भले ही बढ़ गया हो, लेकिन वह सियासी तौर पर लगातार कमजोर हो रहे हैं और यह दोस्ती उन्हें बेहद महंगी भी पड़ रही है। इसलिए अगर वह सिर्फ एनडीए उम्मीदवार का विरोध करने के नाम पर या फिर भाजपा के खिलाफ मजबूत विपक्ष की चाहत में कोविन्द का विरोध करते हैं, तो यह उनके लिए भी राजनैतिक रूप से नुकसानदायक साबित हो सकता है।

जनता दल (यूनाईटेड) की बात करें तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वयं कह चुके हैं कि रामनाथ कोविन्द ने राज्यपाल के रूप में बेहतरीन कार्य किया है। उन्होंने इस बात की खुशी भी जतायी है कि बिहार के राज्यपाल को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया गया। नीतीश ने भाजपा के इस फैसले के बाद कोविन्द से मुलाकात भी की और यह भी कहा है कि उन्होंने अपनी भावना से राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को अवगत करा दिया है। नीतीश ने कहा है कि कोविन्द ने हमेशा राजभवन और राज्यपाल पद की गरिमा का पूरा ख्याल रखा, उन्हें इस बात के लिए हमेशा याद रखा जाएगा। जाहिर है कि कोविन्द की इतनी तारीफ करने के बाद जद यू के लिए उनकी उम्मीदवारी का विरोध करना आसान नहीं होगा। दूसरी ओर राजद के लिए भी कुछ ऐसी ही स्थिति होगी। ऐसे में लालू के लिए महज कांग्रेस का साथ देने के नाम पर कोविन्द का विरोध करना सियासी लिहाज से अच्छा सन्देश नहीं देगा।

ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि भाजपा के एक दांव ने विपक्ष को धर्म संकट में डाल दिया है। उनके पास कोविन्द का विरोध करने का एक भी मजबूत कारण नहीं है। दूसरी ओर भाजपा ने अपने इस फैसले से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एजेण्डे को भी धार देने की कोशिश की है। कोविन्द स्वयं भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की पृष्ठभूमि से हैं। वहीं संघ के सभी अनुषांगिक संगठन अपने-अपने स्तर से सामाजिक समरसता की दिशा में काम कर रहे हैं। स्वयं मोदी सरकार के मंत्री भी दलितों के घर जाकर भोजन करके इस बात का सन्देश दे रहे हैं कि भाजपा किसी भी स्तर पर छुआछूत और भेदभाव की विरोधी है।

प्रधानमंत्री मोदी पहले ही डॉ. भीमराव अम्बेडकर से जुड़े पंचतीर्थ स्थलों के विकास का ऐलान कर चुके हैं, इस दिशा में काम भी जारी है। इसके साथ ही यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय सरसंघचालक मधुकर दत्तात्रेय देवरस ’बाला साहब देवरस’ का शताब्दी वर्ष है। बाला साहब देवरस ने लोगों में सामाजिक चेतना जगाने, समाज को भेदभाव मुक्त बनाने और दलितों के हित व विकास के लिए आजीवन काम किया। इस तरह भाजपा ने कोविन्द के जरिए बाला साहब देवरस को भी सच्ची श्रद्धांजलि देने का सन्देश दिया है।

रालोसपा ने किया कोविंद का समर्थन

नई दिल्ली — राजग के घटक राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी ने (रालोसपा) ने राष्ट्रपति पद के लिए बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद की उम्मीदवारी का स्वागत किया है।

रालोसपा के राष्ट्रीय महासचिव व प्रवक्ता फजल इमाम मलिक ने कहा कि पार्टी अध्यक्ष व केंद्रीय मानव संसाधन राज्यमंत्री उपेन्द्र कुशवाहा ने पहले ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के चयन के लिए अधिकृत कर दिया था।

रालोसपा का मानना है कि कोविंद राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाने का फैसला सही है और इससे सामाजिक न्याय की अवधारणा और मजबूत होगी।
रालोसपा अध्यक्ष उपेन्द्र कुशवाहा ने कहा कि कोविंद की उम्मीदवार से फिर यह साबित हुआ है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गरीबों और समाज के के सबसे निचले तबके की चिंता है। और उस तबके को आगे बढ़ाने के लिए वे लगातार प्रयास कर रहे हैं।

कुशवाहा ने उम्मीद जताई कि राजग उम्मीदवार रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति पद का चुनाव बड़े अंतर से जीतेंगे।

मायावती ने कोविन्द को लेकर अपनाया सकारात्मक रुख़

लखनऊ — बहुजन समाज पार्टी (बसपा) की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए की ओर से उम्मीदवार रामनाथ कोविन्द को लेकर सकारात्मक रूख अपनाया है।

मायावती ने कहा कि उन्हें भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और केन्द्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री एम. वेंकैया नायडू ने भी आज टेलीफोन पर बताया कि भाजपा व एन.डी.ए. ने राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के लिये दलित वर्ग से रामनाथ कोविंद का नाम तय कर दिया है।

मायावती ने कहा कि कोविन्द मूल रुप से उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के निवासी हैं और दलित वर्ग में कोरी जाति से ताल्लुक रखते हैं, जिनकी संख्या पूरे देश में बहुत कम है। साथ ही वह शुरु से ही अधिकांश भाजपा व आर.एस.एस. से ही जुड़े हुये रहे हैं। इसलिए इनकी इस राजनैतिक पृष्ठभूमि से तो मैं कतई भी सहमत नहीं हूं।

बसपा सुप्रीमो ने कहा कि हालांकि भाजपा व एन.डी.ए. ने अब इनको राष्ट्रपति पद के लिए अपना उम्मीदवार तय कर लिया है तो ऐसी स्थिति में इनके दलित होने के नाते इनके प्रति हमारी पार्टी का स्टैण्ड नकारात्मक तो नहीं हो सकता है, यानी सकारात्मक ही रहेगा, बशर्ते यदि विपक्ष से इस पद के लिए अन्य कोई दलित वर्ग का इनसे अधिक लोकप्रिय व काबिल उम्मीदवार चुनाव के मैदान में नहीं उतरता है।

मायावती ने यह भी कहा कि अगर कोविन्द के नाम की घोषणा करने से पहले भाजपा सभी विपक्ष की पार्टियों को विश्वास में ले लेती तो यह ज्यादा उचित रहता। हालांकि इनसे पहले दलित वर्ग से के.आर. नारायणन भी इस पद पर आसीन हो चुके हैं। इसलिए मेरा मानना है कि यदि एन.डी.ए. इस पद के लिए दलित वर्ग से किसी गैर-राजनैतिक व्यक्ति को आगे करते तो यह ज्यादा बेहतर होता।

भाजपा का कोविंद का नाम तय करना एकतरफा फैसला — कांग्रेस

नई दिल्ली — भाजपा की तरफ से बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने को कांग्रेस ने एकतरफा फैसला करार दिया है।

राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने संवाददाता सम्मेलन में भाजपा पर राष्ट्रपति उम्मीदवार के ऐलान को लेकर आरोप लगाया कि उन्होंने फैसला करने के बाद हमें जानकारी दी है।

उन्होंने कहा, ‘जब हमसे मुलाकात की, तो हमें कहा था कि आम सहमति के लिए किसी भी घोषणा से पूर्व आपको सूचित किया जाएगा, लेकिन उन्होंने निर्णय के बाद हमें सूचित किया।‘

हालांकि कोविंद के नाम की घोषणा करते हुए अमित शाह ने कहा कांग्रेस आलाकमान को कोविंद के नाम की जानकारी दी गई थी।

गुलाम नबी आजाद ने कहा, भाजपा ने राम नाथ कोविंद के नाम पर कोई चर्चा नहीं की। उनका फैसला एकतरफा था। कोविंद को समर्थन देने न देने के सवाल पर उन्होंने कहा, पार्टी विपक्ष की दूसरी पार्टियों से बात करके अपना स्टैंड क्लियर करेगी।

उल्लेखनीय है कि राष्ट्रपति चुनाव को लेकर कांग्रेस 22 जून को विपक्ष के साथ बैठक कर सकती है।

इससे पहले सोमवार दोपहर रामनाथ कोविंद के नाम की घोषणा करते हुए भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि नाम फाइनल करने से पहले कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह से बात हुई थी। उन्होंने दावा किया कि स्वयं प्रधानमंत्री ने कोविंद के नाम पर सोनिया गांधी से बात की थी।

दलित उम्मीदवार तय करना राजनीतिक टकराव है — येचुरी

नई दिल्ली — मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव सीताराम येचुरी ने भाजपा पर राष्ट्रपति उम्मीदवार के ऐलान में भी राजनीतिक टकराव का आरोप लगाया है।

येचुरी ने कहा, रामनाथ कोविंद जी आरएसएस की दलित शाखा के प्रमुख थे, वह एक राजनीति हुई ना, ये सीधा-सीधा राजनीतिक टकराव है। विपक्षी पार्टियां 22 जून को बैठक करेंगी। आजाद हिंदुस्तान के इतिहास में एक ही बार ऐसा हुआ है कि जब राष्ट्रपति निर्विरोध निर्वाचित हुए हैं।

दरअसल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली में सोमवार दोपहर राम नाथ कोविंद के नाम की घोषणा की। कोविंद भाजपा का दलित चेहरा हैं। भाजपा ने उनके नाम की घोषणा करके विपक्ष को भी साधने की कोशिश की है।

दूसरी ओर राष्ट्रपति चुनाव को लेकर कांग्रेस 22 जून को विपक्ष के साथ बैठक कर सकती है।

इससे पहले येचुरी ने शनिवार को कहा था कि अगर सत्तारूढ़ एनडीए अगर 20 जून तक उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं करता है तो 21 जून को वो सर्वसम्मति से विपक्ष से नाम घोषित करने की अपील करेंगे।

राष्ट्रपति चुनाव को लेकर विपक्षी दलों की बैठक 22 को

नई दिल्ली — राष्ट्रपति चुनाव को लेकर विपक्षी दल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में 22 जून को उम्मीदवार के नाम पर विचार कर, ऐलान कर सकते हैं।

हालांकि भाजपा पहले ही रामनाथ कोविंद को उम्मीदवार बनाने का ऐलान कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बारे में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को जानकारी दी है।

दूसरी ओर कांग्रेस का आरोप है कि भाजपा ने राष्ट्रपति उम्मीदवार का चयन और ऐलान कांग्रेस की सहमति के बिना किया।
राज्यसभा में विपक्ष के नेता और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद ने भाजपा पर राष्ट्रपति उम्मीदवार का ऐलान को लेकर आरोप लगाया कि उन्होंने फैसला करने के बाद हमें जानकारी दी। उन्होंने कहा, ‘जब हमसे मुलाकात की, तो हमें कहा था कि आम सहमति के लिए किसी भी घोषणा से पूर्व आपको सूचित किया जाएगा, लेकिन उन्होंने निर्णय के बाद हमे सूचित किया।‘

वहीं विपक्षी दलों की बैठक को लेकर जेडीयू के वरिष्ठ नेता शरद यादव ने कहा, ‘विपक्षी दलों की बैठक में नाम पर विचार करेंगे। एनडीए ने जो नाम दिया है उस पर भी बात करेंगे।‘

दरअसल भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली में सोमवार दोपहर राम नाथ कोविंद के नाम की घोषणा की। कोविंद भाजपा का दलित चेहरा हैं। भाजपा ने उनके नाम की घोषणा करके विपक्ष को भी साधने की कोशिश की है।

इससे पहले राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनावों के लिए विपक्षी दलों ने 14 जून को संसद लाइब्रेरी बिल्डिंग में बैठक की थी।
इस बैठक में राज्यसभा में नेता विपक्ष और कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद, लोकसभा में नेता विपक्ष और कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, जद(यू) नेता शरद यादव, राजद नेता लालू प्रसाद, सीपीआई नेता और महासचिव सीताराम येचुरी, टीएमसी नेता डेरेक ओ ब्रायन, समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव, बसपा नेता सतीश चंद्र मिश्रा, डीएमके नेता आर.एस.भारती और एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल मौजूद थे।

इसके बाद गृहमंत्री राजनाथ सिंह और केंद्रीय मंत्री वेंकैया नायडू इस मामले पर मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के महासचिव सीताराम येचुरी और सोनिया गांधी से भी मुलाकात की।

बैठक के बाद येचुरी ने शनिवार को कहा था कि अगर सत्तारूढ़ एनडीए अगर 20 जून तक उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं करता है तो 21 जून को वो सर्वसम्मति से विपक्ष से नाम घोषित करने की अपील करेंगे।

उल्लेखनीय है कि चुनाव आयोग ने पिछले हफ्ते ही अगले राष्ट्रपति के चुनाव के लिए 17 जुलाई का ऐलान किया था और मतगणना 20 जुलाई को कराने का ऐलान किया है। देश के मौजूदा 13वें राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का कार्यकाल 24 जुलाई को समाप्त हो रहा है। जबकि उपराष्ट्रपति का कार्यकाल अगस्त अंत में समाप्त हो रहा है।

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