Saturday 10 April 2021
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ऑक्सफ़र्ड यूनियन की निर्वाचित अध्यक्षा हिन्दू होने के कारण इस्तीफ़ा देने को मजबूर

'हिन्दू होने के कारण मैं क़तई असहिष्णु या ऑक्सफ़र्ड छात्र यूनियन की अध्यक्ष बनने के अयोग्य नहीं बन जाती' — इस्तीफ़े के बाद रश्मि सामंत का पोस्ट

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मूलतः कर्णाटक की रहने वाली और ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी के छात्र संघ में हाल ही में अध्यक्षा के रूप में चुनी जाने वाली पहली भारतीय महिला रश्मि सामंत ने हिन्दू होने के नाते और हिन्दुओं की पैरवी करने के कारण काफ़ी अपमानित, लांछित और प्रताड़ित होने के बाद अपने पद से त्यागपत्र दे दिया है।

आपस में समन्वय स्थापित करते हुए वामपंथियों ने इससे पहले ढूंढ-ढूंढ कर रश्मि के पुराने सोशल मीडिया पोस्ट्स को सामने लाते हुए उन्हें रंगभेदी, इस्लाम-विरोधी, यहूदी-विरोधी, समलैंगिकता-विरोधी और न जाने क्या-क्या उपाधि उन्हें दे डाली थी। उन्हें हिन्दू होने के कारण भी कोसा गया था।

रश्मि सामंत का ऑक्सफ़र्ड यूनिवर्सिटी छात्र संघ में बतौर अध्यक्ष 11 फरवरी को चुनाव हुआ था। कल उन्होंने सोशल मीडिया और अस्ल जीवन में काफ़ी लांछन सहने के बाद इस्तीफ़ा दे दिया।

यह विवाद तब उठ खड़ा हुआ जब छात्रों द्वारा लिखित व ऑक्सफ़र्ड द्वारा प्रकाशित एक साप्ताहिक पुस्तिका में यह कहा गया कि रश्मि ने Instagram पर अपने मलेशिया पर्यटन के दौरान तस्वीर पर ‘चिंग-चैंग’ लिखकर टिपण्णी की थी। इस टिपण्णी को हिटलर राज में जर्मनी में हुए यहूदियों के नरसंहार से जोड़कर देखा गया। इसके अलावा रश्मि पर आरोप लगा कि उन्होंने अध्यक्ष के रूप में चुने जाने से पहले आयोजित बहस में तत्कालीन केप कॉलोनी (आज का दक्षिण अफ्रीका) के प्रधानमंत्री सेसिल रोड्स की तुलना हिटलर से की थी। कहीं और सोशल मीडिया पर उन्होंने औरतों और किन्नरों के बीच फ़र्क़ किया था। इसके अलावा ऑक्सफ़र्ड स्टूडेंट यूनियन के Campaign for Racial Awareness and Equality (CRAE) और ऑक्सफ़र्ड SU LGBTQ अभियान ने आरोप लगाया कि रश्मि अपनी ग़लती मान कर क्षमा मांगने को तैयार नहीं हैं।

यहाँ तक कि रश्मि को हिन्दू होने के नाते भला-बुरा सुनना पड़ा। एक शिक्षक ने उनके माता-पिता को भी मुआमले में घसीटा और यह प्रश्न उठाया कि उनके सोशल मीडिया प्रोफाइल्स में श्रीराम की छवि क्यों लगी हुई है! अनर्गल प्रलाप का एक ऐसा दौर चला जहाँ यह भी कहा गया कि रश्मि के चुनाव के लिए भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पैसे दिए थे!

विश्वविद्यालय के एक सदस्य प्रोफेसर ने भारत के एक पूरे क्षेत्र को बदनाम करते हुए लिखा कि रश्मि तटवर्ती कर्णाटक से आती हैं जहाँ इस्लाम को घृणा करने वालों की बहुतायत है। प्राध्यापक ने यह भी कहा कि इस प्रान्त के अति-दक्षिण पंथ के लोग गोरों से भी घृणा करते हैं क्योंकि गोर आधुनिक विचारधारा के होते हैं जो हिन्दुत्त्ववादियों को रास नहीं आता! अध्यापक ने ‘जातिवादी’ और ‘पुरुषतान्त्रिक’ हिन्दुओं के बारे में लिखा कि यह समुदाय ग़ैर-हिन्दू ढांचों पर हमेशा से हमला किया है।

Internal Image for "ऑक्सफ़र्ड यूनियन की निर्वाचित अध्यक्षा हिन्दू होने के कारण इस्तीफ़ा देने को मजबूर"

रश्मि प्रेजिडेंट-इलेक्ट पद से इस्तीफ़ा देकर अपने घर उडुपी लौट आई है। इससे पहले उन्होंने फ़ेसबुक पर एक पोस्ट डाला जिसपर उन्होंने ऑनलाइन बाहुबलियों की भर्त्सना की तथा असहिष्णुता की आलोचना की। उन्होंने कहा कि ऑक्सफ़र्ड यूनियन की अध्यक्षा बनना उनके लिए गर्व की बात थी।

अपने माता-पिता पर हुए ऑनलाइन हमले से रश्मि आहत हैं। उनकी हिन्दू आस्था पर चोट पहुँचने के कारण वे व्यथित हैं। उन्होंने लिखा कि बहुत साल पुराने कुछ पोस्ट्स में उन्होंने कुछ ऐसे विचार रखे थे जो उनके आज के विचारों से मेल नहीं खाते और इसलिए उन पोस्ट्स के हवाले से उनपर हमला करना उचित नहीं था।

उन्होंने कहा कि श्रीराम के प्रति आस्था कोई अपराध नहीं है लेकिन हिन्दुओं की आस्था के इस विषय का उनके ख़िलाफ़ अभियान में प्रयोग हुआ।

हिन्दुत्त्व का झंडा एक बार फिर से बुलंद करते हुए रश्मि ने लिखा, “The fact that I am a Hindu no way makes me intolerant or unfit to be the President of the Oxford SU। Contrary to this, I understand the value of diversity in its true sense, though my exposure to the intricacies of the developed world is limited. (हिन्दू होने के कारण मैं क़तई असहिष्णु या ऑक्सफ़र्ड छात्र यूनियन की अध्यक्ष बनने के अयोग्य नहीं बन जाती। बल्कि मैं विविधता के महत्त्व को समझती हूँ हालांकि विकसित देशों की संस्कृतियों के ताने-बाने की समझ मुझमें कम है)”

त्यागपत्र देने का कारण समझाते हुए रश्मि लिखती हैं कि “मेरे जीवनमूल्यों ने मुझे सिखाया है कि मैं संवेदनशील बनूँ और विशेष कर उन लोगों के प्रति कर्त्तव्यनिष्ठ रहूँ जिन्हें मुझ पर भरोसा है। सर्वोपरि हमें प्रत्येक मनुष्य के प्रति आदर का भाव रखना चाहिए और छात्र समुदाय के प्रति संवेदनशील होना चाहिए जिन्हें कम से कम एक कार्यपालक अध्यक्ष की आवश्यकता है। व्यक्तिगत तौर पर cyberbullying से मुझे पीड़ा हुई है और यह मेरे साथ संवेदनशीलता के नाम पर किया गया”।

India Ahead News के साथ एक साक्षात्कार में रश्मि ने कहा कि जो सोशल मीडिया पोस्ट्स उनके ख़िलाफ़ इस्तेमाल हुए वे पाँच साल पहले लिखे गए थे जब वे किशोरावस्था से गुज़र रही थीं। उन्होंने कहा कि उस दौरान किसी भी विषय पर उनकी राय दृढ़संकल्पित नहीं हुई थी। उन्होंने यह भी कहा कि जिन टिप्पणियों के कारण उन्हें रंगभेदी बताया गया वे व्यंग्यात्मक थे और किसी को चोट पहुँचाने के अभिप्राय से नहीं लिखे गए थे।

अपने पोस्ट में रश्मि ने यह भी लिखा कि उपनिवेश को साम्राज्यवादी ताक़तें और उनसे पीड़ित लोग भिन्न दृष्टि से देखते हैं। उन्होंने लिखा कि उन्होंने साम्राज्यवादियों की अपनी राय मूलनिवासियों पर थोपने की प्रवृत्ति के विरोध में एक अभियान चलाया था और यह आह्वान किया था कि साम्राज्यवादी अपने इस दोष पर आत्मविश्लेषण करें और स्वयं को सुधारें।

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