लोकपाल की नियुक्ति के लिए सर्वोच्च न्यायालय के जरिए दबाव बनाकर विपक्ष की तैयारी दरअसल नरेंद्र मोदी की सरकार को घेरने की है। जिस स्वयंसेवी संगठन कॉमन काज के वकील शांतिभूषण ने इस याचिका को दाखिल किया है, उनके पुत्र प्रशांत भूषण आम आदमी पार्टी के पदाधिकारी रहे हैं। अन्ना आंदोलन को खुद शांतिभूषण का बड़ा सहयोग रहा है। आम आदमी पार्टी ने 18 दिसंबर 2013 को संसद में पास लोकपाल बिल पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा था कि इस अधिनियम से तो चूहा भी जेल नहीं जा सकता। अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने संशोधन के बाद पारित हुए लोकपाल को ’जोकपाल’ करार देते हुए कहा था कि इस बिल से तो चूहा भी जेल नहीं जाएगा। पारदर्शिता या भ्रष्टाचार मुक्त भारत की संरचना की तो उम्मीद ही व्यर्थ है। कांग्रेस के तत्कालीन उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा था कि अकेले लोकपाल बिल से भ्रष्टाचार पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता। यूपीए के व्यापक भ्रष्टाचार विरोधी ढांचे को लाने के लिए छह और विधेयक पास किए जाने की जरूरत है।

समाजवादी पार्टी और शिव सेना ने भी लोकपाल बिल की आलोचना की थी लेकिन आज हालात बदल गए हैं। कांग्रेस अगर लोकपाल को लेकर इतनी ही गंभीर होती तो इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के ही कार्यकाल में देश में लोकपाल की नियुक्ति हो गई होती। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्र के खिलाफ आवाज उठाने वाले जजों में से एक केंद्र सरकार को इस मामले में दस दिन का समय देने वाली पीठ के एक सम्मानित जज हैं। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। फिर भी सबको पता है कि लोकपाल विधेयक बहुत मजबूत नहीं है। इंदिरा गांधी ने तो अपने कार्यकाल में प्रधानमंत्री पद को लोकपाल के दायरे में ही नहीं आने दिया था। उन्होंने तो सांसदों को भी इस कानून के प्रभाव क्षेत्र से बचाए रखने की हर संभव कोशिश की थी।

भाजपा की नीयत पर सवाल उठाने से पहले कांग्रेस को अपने गिरेबान में झांकना होगा, वह तो मोरार जी देसाई, एचडी देवेगौड़ा और अटल बिहारी वाजपेयी ही थे जिन्होंने बतौर प्रधानमंत्री लोकपाल के दायरे में प्रधानमंत्री को भी लाने पर सहमति दी थी। पहले भी इस बात के सवाल उठे थे कि लोकपाल की नियुक्ति तो ठीक है लेकिन अगर लोकपाल भ्रष्टाचारी हो जाए तब क्या होगा? 1963 से लोकपाल की नियुक्ति पर शुरू विचार के दौरान 1966 में पहली बार प्रशासनिक सुधार समिति ने केंद्र और राज्य के लिए दो स्वतंत्र प्राधिकरण बनाने की संस्तुति की थी। सबसे पहले 1968 में इंदिरा गांधी के समय आये लोकपाल विधेयक में प्रधानमंत्री और सांसदों को उसके तहत नहीं रखा गया था। विधेयक पास होने के बावजूद 1969 में लोकसभा भंग हो जाने की वजह से लोकपाल की नियुक्ति अधर में लटक गई। अगस्त, 1971 में एक बार फिर यह विधेयक संसद पटल पर रखा गया, लेकिन इसे किसी भी समिति को विचारार्थ नहीं भेजा गया। फिर जुलाई 1977 में मोरारजी भाई देसाई के समय आये विधेयक में प्रधानमंत्री को शामिल नहीं किया गया था, लेकिन सांसद इसके दायरे में थे। संयुक्त प्रवर समिति की दो संस्तुतियों के बीच छठी लोकसभा भंग हो जाने की वजह से लोकपाल की नियुक्ति फिर अधर में लटक गई।

1985 में राजीव गांधी के कार्यकाल में फिर यह विधेयक संसद में लाया गया और इसे संयुक्त प्रवर समिति के पास भेजा गया। बाद में इसे सरकार ने वापस ले लिया । सन् 1989 में वीपी सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में लोकपाल विधेयक को संसद में पेश किया गया। इसे संसद की स्थायी समिति को भेजा गया, लेकिन लोकसभा भंग हो जाने के बाद इसका पहले जैसा ही हस्र हुआ। 1997 में देवगौड़ा राज में यह विधेयक संसद में पेश किया गया। संसद की स्थायी समिति ने इस विधेयक में संशोधन से संबंधित सिफारिशें पेश कीं, लेकिन लोकसभा भंग हो जाने के कारण यह विधेयक कानून नहीं बन पाया। सन् 1998 में व 2001 में अटल बिहारी वाजपेयी के शासनकाल में दो बार इस विधेयक को संसद में पेश किया गया लेकिन, इससे पहले कि इस विधेयक को लेकर स्थायी समिति द्वारा पेश सिफारिशों पर कोई विचार होता, दोनों ही बार लोकसभा भंग हो गई।

सन् 2005 व 2008 में भी यह विधेयक संसद में पेश किया गया, लेकिन अस्तित्व में नहीं आ सका। सन् 2011 में अन्ना हजारे और उनके सहयोगियों के आंदोलन के बाद 4 अगस्त, 2011 को नया लोकपाल विधेयक लोकसभा में पेश किया गया। लोकपाल विधेयक का नौवां संस्करण सदन पटल पर रखा गया। उसे संसद की स्थायी समिति के पास भेज दिया गया लेकिन वह कानून नहीं बन पाया। 27 जुलाई, 2016 को कार्मिक, लोक शिकायत और पेंशन मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने लोकसभा में लोकपाल एवं लोकायुक्त (संशोधन) विधेयक, 2016 को पेश किया था। इस संशोधन के अनुसार, लोकपाल अधिनियम में लोक सेवक से अपनी, पत्नी या पति और बच्चों की परिसंपत्तियों और देनदारियों की घोषणा की अपेक्षा की गई है।

लोक सेवक के कार्यकाल संभालने के 30 दिनों के भीतर सक्षम प्राधिकरण के समक्ष यह घोषणा करनी होगी। साथ ही लोक सेवक को हर वर्ष 31 जुलाई तक इन परिसंपत्तियों और देनदारियों का वार्षिक रिटर्न फाइल करना चाहिए। लोकपाल अधिनियम के निर्देशानुसार, संबंधित मंत्रालय की वेबसाइट पर 31 जुलाई तक घोषणा से संबंधित विस्तृत जानकारी प्रकाशित होनी चाहिए। विधेयक के प्रावधानों के अनुसार लोक सेवकों द्वारा की जानेवाली घोषणाओं का स्वरूप और तरीकों का निर्धारण केंद्र सरकार द्वारा किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने लोकपाल की नियुक्ति में देरी पर केंद्र से जवाब मांगा है। सरकार से कहा है कि वह दस दिन में बताए कि लोकपाल कब तक नियुक्त हो जाएंगे और इसके लिए अब तक क्या कदम उठाए गए जबकि सरकार पहले ही अपना पक्ष स्पष्ट कर चुकी है कि लोकसभा में नेता विपक्ष नहीं है।

लोकपाल की चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा अध्यक्ष, चीफ जस्टिस या उनकी ओर से नामित सुप्रीम कोर्ट के जज और एक नामचीन हस्ती के साथ नेता विपक्ष भी शामिल होता है। नेता विपक्ष की जगह सबसे बड़े दल के नेता को समिति में रखने का संशोधन कानून में होना है। इसके साथ करीब 20 संशोधन लंबित हैं। बहुचर्चित अन्ना आंदोलन तो साढ़े चार साल पहले का मामला है लेकिन लोकपाल कानून बनने के प्रयास तो बहुत पहले से चल रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के बार-बार निर्देश देने के बावजूद लोकपाल गठन टलता रहा है, यह अपने आप में चिंता का विषय हो सकता है लेकिन सरकार पर जान-बूझकर लोकपाल की नियुक्ति में गंभीरता न बरतने का आरोप समझ से परे है। वरिष्ठ वकील शांति भूषण लोकपाल की नियुक्ति के लिए सुप्रीम कोर्ट को अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करने की सलाह दे रहे हैं।

क्या सर्वोच्च न्यायालय को अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं है? मई में ही मोदी सरकार लोकपाल की नियुक्ति करने वाली चयन समिति में वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी को नियुक्त कर चुकी है। वरिष्ठ वकील पीपी राव के निधन के बाद यह पद खाली हुआ था। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि लोकसभा में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी यानी कांग्रेस के सदन में नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को नेता प्रतिपक्ष मानते हुए लोकपाल के गठन की प्रक्रिया पूरी की जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद एक बार लोकपाल के चयन समिति की बैठक भी बुलाई गई, लेकिन किन्हीं कारणों से वह नहीं हो पाई।

निर्णय चयन समिति को लेना है। मल्लिकार्जन खड़गे खुद चयन समिति की बैठक में नहीं गए थे। सब कुछ कांग्रेस अपने मनमुताबिक तय करेगी, यह कैसे चलेगा? कांग्रेस का यह तर्क बेहद बचकाना है कि 13 साल गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने लोकायुक्त नहीं बनने दिया। अब केंद्र में उनकी सरकार का आखिरी साल चल रहा है. ऐसे में लोकपाल को लेकर भी उनकी नीयत साफ नहीं है। अन्ना आंदोलन के दौरान कई राज्यों ने इसके लिए जरूरी कानून भी पास किया था लेकिन लोकायुक्त को लेकर कानून बनाने वाली राज्य सरकारें इसके गठन से परहेज कर रही हैं। वजह चाहे जो भी हो।