बिजली तो पहुंच गयी, रोशन कब होंगे गांव

यहां इस बात को भी समझ लेना आवश्यक है कि कई बार बाढ़ जैसी प्राकृतिक वजह से गांव के लोगों को कई महीने तक मूल गांव से हटकर निवास करना पड़ता है

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केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद कई मोर्चों पर इस सरकार ने उल्लेखनीय सफलता पाई है। हर गांव तक बिजली पहुंचाने का लक्ष्य मोदी सरकार ने हासिल कर लिया है, लेकिन अब एक बड़ा लक्ष्य हर गांव को रोशन करने का है। ढांचागत सुविधा के तौर पर गांव बिजली के तारों से भले ही जुड़ गए हैं, बिजली भी पहुंच गयी है, लेकिन जब तक सभी गांवों में पर्याप्त मात्रा में बिजली की आपूर्ति नहीं होती, तब तक ऐसे बिजली कनेक्शन देने का कोई औचित्य नहीं है। यद्यपि मोदी सरकार ने अपने इसी कार्यकाल में देश के हर घर को बिजली से रोशन कर देने की प्रतिबद्धता जताई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 अप्रैल को ही एक ट्वीट करके कहा था कि मणिपुर के लेईसांग गांव समेत देश के ऐसे तमाम गांवों में बिजली पहुंच चुकी है, जो अब तक इससे अछूते थे। 2015 में देश के सभी गांवों को विद्युतिकृत करने के लिए प्रधानमंत्री ने दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना की शुरुआत की थी। इसके लिए 10 मई 2018 का लक्ष्य तय किया था, लेकिन प्रधानमंत्री के ट्वीट के मुताबिक यह लक्ष्य 12 दिन पहले ही हासिल कर लिया गया। निश्चित रूप से यह केंद्र सरकार की बड़ी सफलता है। हालांकि विपक्ष केंद्र के इस दावे पर सवालिया निशान लगा रहा है। उसका दावा है कि देश में अभी भी ऐसे कई गांव हैं, जहां बिजली का कनेक्शन नहीं पहुंचा है। लेकिन विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय स्पष्ट किया है कि जनगणना आयुक्त के कार्यालय में चिन्हित हर गांव तक बिजली पहुंचा दी गई है।

यहां इस बात को भी समझना जरूरी है कि किसी एक गांव में बिजली पहुंच जाने का अर्थ यह कतई नहीं है कि गांव के हर परिवार ने बिजली का कनेक्शन ले ही लिया हो। हर गांव कई टोलों-मोहल्लों में बंटा होता है। कई बार बिजली का कनेक्शन टोले के हिसाब से दिया जाता है। यानी पहले एक टोले को में कनेक्शन लगता है, फिर दूसरे, तीसरे टोले में कनेक्शन दिया जाता है। हो सकता है बड़े गांव में आखिर तक बिजली का कनेक्शन पहुंचते-पहुंचते 2 से 4 महीने तक का भी समय लग जाए, लेकिन इसका ये अर्थ कतई नहीं है कि उस गांव तक बिजली पहुंची ही नहीं। सरकार का लक्ष्य हर गांव तक बिजली पहुंचाने का था और इस लक्ष्य से 12 दिन पहले ही हासिल कर लिया। विपक्ष का ये भी कहना है कि कई छोटे गांवों की दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना के तहत उपेक्षा कर दी गई है।

यहां इस बात को भी समझ लेना आवश्यक है कि कई बार बाढ़ जैसी प्राकृतिक वजह से गांव के लोगों को कई महीने तक मूल गांव से हटकर निवास करना पड़ता है। कई बार इनमें से कुछ लोग उन सुरक्षित स्थानों के आस-पास ही बस जाते हैं। इस बसावट को जबतक गांव के रूप में मान्यता नहीं मिलती, तबतक उन्हें अस्थाई बसावट ही माना जाता है। स्वाभाविक रूप से ऐसी कई बसावटों तक अभी बिजली का कनेक्शन नहीं पहुंचा होगा, लेकिन अगर जनगणना आयुक्त के कार्यालय में दर्ज हर गांव तक भी बिजली का कनेक्शन पहुंच गया है, तो यह अपने आप में बहुत बड़ी बात है। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट में भी बताया गया है कि भारत के 85% गांवों तक बिजली का कनेक्शन पहुंच चुका है। विश्व बैंक की ये रिपोर्ट आने के करीब तीन महीने बाद 28 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने ट्वीट कर देश के सभी गांवों के विद्युतीकरण होने का दावा किया है। मतलब साफ है कि जब विश्व बैंक की रिपोर्ट तैयार हो रही थी उस समय तक 85 फीसदी गांवों में ही बिजली पहुंची थी, लेकिन बाद के दिनों में यदि सरकार ने हर संसाधनों का उपयोग करके देश के सौ फीसदी गांवों तक विद्युत कनेक्शन पहुंचा दिया, तो कोई वजह नहीं है कि इसपर भरोसा न किया जाये। जहां तक विद्युतीकरण की बात है तो जिस किसी भी गांव में सार्वजनिक स्थलों- पंचायत, सामुदायिक भवन, स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल आदि के साथ गांव के महज दस फीसदी घरों तक बिजली का कनेक्शन पहुंच जाता है, उस गांव को सरकारी रिकॉर्ड में विद्युतीकृत गांव माना जाता है।

बहुत संभव है कि देश के अनेकों गांव ऐसे होंगे, जहां 50% से ज्यादा लोगों के घरों तक बिजली का कनेक्शन नहीं पहुंचा होगा। लेकिन, गांव को विद्युतीकृत मानने का यह पैमाना भी आज का नहीं, बल्कि सत्तर के दशक में तय किया गया पैमाना है। दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना के साथ ही प्रधानमंत्री सहज बिजली हर घर योजना यानी सौभाग्य योजना भी चलायी जा रही है। इस योजना के तहत इसी साल 31 दिसंबर तक देश के हर घर को रोशन करने का लक्ष्य तय किया गया है। पहले यह समय सीमा 31 मार्च 2019 तक थी, लेकिन अब इसे तीन महीने कम कर दिया गया है। सौभाग्य योजना का तात्पर्य हर घर में सर्विस लाइन केबल, बिजली मीटर और सिंगल लाइन वायरिंग से है।

गांवों के विद्युतीकरण का मतलब केवल एक बार बिजली के खंभे और तार लगाकर बिजली पहुंचा देना ही नहीं है। सरकारी दस्तावेजों में ऐसे कई गांवों का जिक्र भी मिलता रहा है, जहां बिजली के खंभे और तारें भी लग गईं। कुछ दिन बल्ब भी जले, लेकिन उसके बाद न तो बिजली की आपूर्ति हुई, ना बिजली के तार बचे। लोगों ने बिजली के खंभे तक उखाड़ लिये। इसलिए विद्युतीकरण का सही लाभ तभी मिल सकता है, जबकि बिजली की आपूर्ति के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार किया जाये और पर्याप्त बिजली की आपूर्ति हो। इसके अलावा देश में कई दुर्गम क्षेत्र ऐसे भी हैं, जहां तक बिजली की आपूर्ति कर पाना काफी कठिन है। ऐसे दुष्कर क्षेत्रों में गैर परंपरागत स्रोतों अथवा बैटरी द्वारा बिजली पहुंचाई जा रही है। ऐसे घरों को बैटरी के साथ 200 से 300 वॉट का पावर पैक उपलब्ध उपलब्ध कराया जा रहा है। देश के 15 फीसदी गांवों में सौर ऊर्जा द्वारा बिजली पहुंचाई गई है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 7 मई 2018 तक ग्रामीण इलाकों के 53,90,047 घरों तक बिजली पहुंचाई जा चुकी है। इस योजना के तहत गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों से कोई पैसा नहीं लिया जाता, जबकि सामान्य परिवारों को 10 किस्तों में 500 का भुगतान करना होता है। ये खुशी की बात है कि देश के हर गांव तक बिजली पहुंच गई है और देश के हर घर को 31 दिसंबर 2019 तक रोशन करने का लक्ष्य भी सरकार ने तय कर लिया है। लेकिन बड़ा सवाल यह भी है कि देश के सभी घरों तक न्यूनतम 12 घंटे बिजली उपलब्ध कराने लायक बिजली का उत्पादन कैसे होगा। अभी देश में बिजली की जितनी उत्पादन क्षमता है, उसमें हर घर तक प्रतिदिन औसतन चार घंटे ही बिजली की आपूर्ति की जा सकती है। इसलिए सरकार को एक बड़ा लक्ष्य बिजली के उत्पादन का भी तय करना होगा, ऐसा करके ही वह सच में दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना को सफल बना सकेगी। अन्यथा यह पूरी कवायद महज सरकारी खानापूरी बनकर रह जाएगी।

हिन्दुस्थान समाचार/योगिता पाठक

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