नेताओं को खल रही संतों की नेतागीरी

भले ही सरकार इस नियुक्ति को नर्मदा सेवा और पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से उपयोगी बताए लेकिन विपक्ष को इस बहाने उसके विरोध का मौका तो मिल ही गया है

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राजनीति और धर्म एक दूसरे के पूरक हैं। राजनीति धर्म का संरक्षण करती है और धर्म राजनीति का मार्गदर्शन करता है। आज स्थिति बिल्कुल विपरीत है। राजनीति और धर्म के बीच की लकीर मिट रही है। पहले राजा साधु बन जाता था। अपनी जिम्मेदारी नई पीढ़ी को सौंप देता था। अब नेता कुर्सी से आजीवन चिपके रहना चाहता है। साधु बनने का तो सवाल ही नहीं उठता। गृहस्थ धर्म में प्रवेश करने से पूर्व गृहस्थ को भी साधु होने को कहा जाता है। यहां साधु का अर्थ सभ्य होने से है। पहले साधु-संन्यासी राजा का मार्गदर्शन करते थे। कुछ भी गलत करने पर उसे सही राह दिखाते थे लेकिन अब साधु-संन्यासी खुद राजनीति में आने को बेताब हैं। कर्नाटक के साधु-संत इसके उदाहरण हैं।

कर्नाटक के लोकतांत्रिक इतिहास में आज तक ऐसा नहीं हुआ कि कोई बाबा नेता बना हो, लेकिन अब हवा का रुख बदला है। आज साधु-संत कर्नाटक विधानसभा के चुनाव में भाजपा और कांग्रेस से टिकट मांग रहे हैं और साथ ही इस बात की भी धमकी दे रहे हैं कि उन्हें टिकट नहीं मिला तो वे निर्दलीय चुनाव लड़ेंगे। वे योगी आदित्यनाथ से प्रभावित हैं। कोई योगी मुख्यमंत्री बन जाए तो वह अपने समाज के बीच आदर्श तो बनता ही है। योगी आदित्यनाथ जैसा रुतबा हासिल करने के लिए विधायक और सांसद तो बनना ही पड़ेगा।

दक्षिण कर्नाटक के उडुपी के शिरूर मठ के मठाधीश लक्ष्मीवारा तीर्थस्वामी केवल संन्यासी ही नहीं हैं, अनेक विशिष्टताओं से युक्त हैं। संगीत में निष्णात हैं। उन्हें तैराकी भी पसंद है और पजेरो व बुलेट चलाना भी। हनुमान जयंती के अवसर पर मठ में उन्होंने अपने चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर कर सभी को विस्मित कर दिया। वे भाजपा से अपने लिए टिकट मांग रहे हैं। उनकी इस इच्छा का पार्टी के पूर्व विधायक रघुपति भट और कुछ अन्य नेता विरोध भी कर रहे हैं। स्वामीजी का मानना है कि जो भी विधायक या सांसद चुनकर जाते हैं, वे जनता के बीच लौटकर नहीं आते हैं। आते हैं तो केवल वोट मांगने। स्वामीजी के इस निर्णय से उनके भक्त तो खुश है लेकिन नेता परेशान हैं क्योंकि उन्हें अपने सामने की थाल सरकती नजर आ रही है। संतों के टिकट मांगने से कांग्रेस और भाजपा दोनों ही परेशान हैं।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री ने 5 संतों को राज्यमंत्री का दर्जा क्या दे दिया, कांग्रेस परेशान हो उठी है। उसके नेता इसकी आलोचना कर रहे हैं। कांग्रेस के एक कार्यकर्ता ने तो इस प्रकरण को मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ तक पहुंचा दिया है। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर पीठ में राज्यमंत्री का दर्जा दिए जाने की संवैधानिकता को चुनौती दी गई है। चुनौती देने का कारण राजनीतिक हो सकता है लेकिन चुनौती का आधार व्यवस्था पर सवाल उठाता है। याचिकाकर्ता की दलील है कि जब संविधान में राज्यमंत्री का दर्जा दिए का प्रावधान ही नहीं है तो मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार पांच संतों को क्यों खामख्वाह राज्यमंत्री का दर्जा दे रही है? सवाल बेहद बड़ा है और यह भाजपा ही नहीं, हर दल पर लागू होता है। हर दल अपने चहेतों को इस तरह की सुख सुविधाएं देने की चेष्टा करता है। गैर भाजपा शासित राज्यों में भी पदों की रेवड़ियां बांटी जाती रही है। अपनों को उपकृत करने की इस प्रवृत्ति पर रोक तो वहां भी लगनी चाहिए। मंत्री का दर्जा देने के मामले में शिवराज की उदारता का वैसे भी कोई जोड़ नहीं है। सरकार में जनता द्वारा चयनित प्रतिनिधियों में से मुख्यमंत्री समेत केवल 32 मंत्री हैं, जबकि मंत्री का दर्जा हासिल करने वालों की संख्या 93 है। इनमें से 35 को कैबिनेट और 58 को राज्यमंत्री का दर्जा हासिल है। उन्होंने हाल ही में स्वामी नर्मदानंद, स्वामी हरिहरानंद , कंप्यूटर बाबा, भय्यू जी महाराज और पं. योगेंद्र महंत को राज्यमंत्री का दर्जा दिया है। कंप्यूटर बाबा और पं. योगेंद्र महंत ने तो सरकार को चेतावनी दी थी कि वे नर्मदा घोटाला रथयात्रा निकालेंगे और पौधे लगाने के मामले में हुई धांधली का खुलासा करेंगे।

कांग्रेस का आरोप है कि इस दबाव में आकर ही शिवराज सरकार में उन्हें राज्यमंत्री का दर्जा दिया गया है। व्यापम घोटाला पहले से ही शिवराज सरकार के लिए गले की हड्डी बना हुआ है। हर बार सरकार के सामने विरोधी दल के नेता होते थे लेकिन इस बार संत समाज है। मामला भी नर्मदा से जुड़ा है। मध्यप्रदेश की जनता के बीच नर्मदा का बेहद सम्मान है। नर्मदा सेवा में घपला-घोटाला तो लोग बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेंगे। मध्यप्रदेश में इसी साल विधानसभा चुनाव भी होने हैं। कई बार से सत्ता से बाहर कांग्रेस अब नहीं तो कभी नहीं वाली स्थिति में है। इसके लिए वह हर संभव प्रयोग कर रही है। एससी/एसटी एक्ट पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बहाने उसने केंद्र सरकार को तो घेरा ही, दलितों को राज्य में हिंसक आंदोलन के लिए भी बरगलाया। अब संतों के जरिए उसने राज्य में शिवराज सरकार के खिलाफ माहौल गरमाने की कोशिश की थी। अगर कंप्यूटर बाबा और महंत इस मामले को ज्यादा तूल देते तो इससे शिवराज सरकार की छवि बिगड़ती। जगद्गुरु स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने भी सरकार पर राजनीतिक कदाचार के आरोप लगाए हैं।

भले ही सरकार इस नियुक्ति को नर्मदा सेवा और पर्यावरण संरक्षण के लिहाज से उपयोगी बताए लेकिन विपक्ष को इस बहाने उसके विरोध का मौका तो मिल ही गया है। पांचों संतों को नर्मदा संरक्षण के बाबत सुझाव देने के लिए बनाई गई समिति का विशेष सदस्य बनाया गया है। 2016 में छह माह चली नर्मदा सेवा यात्रा में 312 से ज्यादा साधु-संत, प्रमुख हस्तियों और फिल्मी कलाकारों को सरकार ने राजकीय अतिथि का दर्जा देकर भी शिवराज चर्चा में रहे थे। मंत्री बनाना सरकार का स्वविवेक है लेकिन इसके लिए प्रथम वरीयता किसे मिले,यह भी तो तय होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने अगर दर्जा प्राप्त राज्यमंत्रियों की नियुक्ति की वैधता पर निर्णय दिया तो यह निर्णय पूरे देश में विचार का एक नया आयाम स्थापित करेगा। राजनीतिक दलों के स्वार्थों पर से भी पर्दा हटेगा। कुछ भाजपा नेता इस निर्णय की प्रशंसा भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि राज्यमंत्री का पद अगर संतों को नहीं दिया जाएगा तो क्या डकैतों को दिया जाएगा? अगर यह सिद्धांत ठीक है तो फिर कर्नाटक में संतों को टिकट देने पर ऊहापोह क्यों है?

हिन्दुस्थान समाचार/ सियाराम पांडेय ‘शांत’

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