उत्तर प्रदेश के राजनीतिक दलों की नैतिकता की पोल खुली

अगर इन सभी नेताओं को गरीब मान लिया जाए तो भी अब इन सभी नेताओं ने चुनाव आयोग के समक्ष हलफनामे में अपनी संपत्ति का जो विवरण दिया है

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उत्तर प्रदेश के सभी विरोधी राजनैतिक दल अब महागठबंधन बनाकर अपनी उपस्थिति तो दर्ज करा ही रहे हैं, साथ ही साथ प्रदेश व केंद्र सरकार की नीतियों व व निर्णयों पर एक होकर हल्ला भी बालने लग गये हैं। लेकिन इस बीच कुछ ऐसी घटनाएं घटी हैं, जिसके कारण सभी विरोधी दलों की नैतिकता की पोल पूरी तरह से खुलती जा रही है। अभी यह महागठबंधन बेहद आरंभिक अवस्था में है, लेकिन विपक्ष की हरकतों से यह साफ होता जा रहा है कि यह दल दलितों, पिछड़ों, अति पिछड़ों व गरीबों और अल्पसंख्यकों के वाकई में कितने हमदर्द है। इन दलों की भारतीय संविधान व सर्वोच्च न्यायालय सहित सभी संवैधानिक संस्थाओं के प्रति कितना मान सम्मान शेष रह गया है। जब देश की अदालतें इन दलों के पक्ष में फैसला सुनाती हैं, तो वह अच्छी हो जाती है, अगर नहीं सुनाती, तो बुरी हो जाती है। एक समय था जब इन दलों के कारण राजनीतिक तूफान आते थे, लेकिन आज इनके दबाव में पत्ता भी नहीं उड़ पा रहा है। यही कारण है कि आज यह सभी दल एकाध सफलताओं के कारण भारी अहंकार में आते गए हैं। अभी हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के एक ऐतिहासिक निर्णय के बाद उत्तर प्रदेश के सभी पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास खाली करना पड़ा, लेकिन सरकारी आवासों का मोह इनके मन से छूट नहीं पा रहा है। भले ही इन लोगों ने अपने बंगले खाली कर दिए हैं।

प्रदेश की राजनीति में सरकारी बंगलों का मोह और उस पर राजनीति की अलग कहानी रही है। लेकिन माननीय कोर्ट के आदेश के आदेशों के अब इन नेताओं को अपना घर खाली करना ही पड़ा। यह सभी दल अभी तक बीजेपी नेताओं को नैतिकता की खूब दुहाई देते रहे हैं, लेकिन बंगला विवाद के बाद वास्तव में इन दलों न्रकार की छटपटाहट दिखायी व बयानबाजी की, उससे इनके नेताओं की पोल खुल गयी। जब सरकारी बंगलों पर कोर्ट का आदेश आया, तब सबसे पहले बीजेपी सरकार के पूर्व मुख्यमंत्रियों राजनाथ सिंह व कल्याण सिंह ने अपना आवास खाली करने का निर्णय करके इन सभी दलों के नेताओं को भरी दबाव में ला दिया। सबसे पहले कोर्ट के आदेश के खिलाफ समाजवादी पार्टी के पूर्व मुखिया और मुलायम सिंह यादव अपना पक्ष रखने और बंगला बचाने के लिये मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पास पहुंच गये। उनका कहना था कि उनके पास मकान नहीं है, तो अब कहां रहने जायेंगे। वहीं उनके सुपुत्र अखिलेश यादव ने चालाकी करते हुए आवास को खाली करने के लिए दो साल का समय मांगना शुरू कर दिया। प्रदेश के एक और मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने अपनी बीमारी का हवाला दे दिया। पूरे प्रकरण में सबसे आश्चर्यजनक और चौकाने वाली दंबगई की राजनीति तो बीएसपी सुप्रीमो मायावती ने की। इस समय राजनैतिक दृष्टिकोण से यदि किसी की हालत बेहद खराब है तो वो मायावती की ही है। उनके पास ले देकर एक सरकारी बंगला ही बचा था। आज संसद के दोनों सदनों में ही नहीं उत्तर प्रदेश विधानसभा में भी उनकी उपस्थिति नगण्य हो गयी है।

उन्होंने भी सरकारी बंगले को लेकर खूब नाटक किया और बीजेपी पर ही उनकी छवि खराब करने का आरोप लगा दिया।मायावती ने बंगला खाली करने के नाम पर खूब ओछी राजनीति की, उन्होंने सरकारी बंगले को कांशीराम यादगार विश्राम स्थल ही बना दिया। इसकी आड़ में उन्होंने दलितों व पिछड़ों का हमदर्द बनने ढोंग रचा है। मायावती ने बेहद ही अनैतिक ढंग से सरकारी बंगले को लूट लिया। उनका यह कृत्य पूरी तरह से अनैतिक और समाज विरोधी है। यह दलितों के साथ और मान्यवर कांशीराम जी के खिलाफ भी एक बहुत बड़ा धोखा है। मायावती की नैतिकता की पराकाष्ठा तो उसी समय गटर में चली गयी थी, जब अपनी सफाई देने के लिये उन्होंने मीडिया को बुलाया। वहां उन्होंने जिस प्रकार की भाषा शैली का प्रयोग बीजेपी के लिये किया, उससे यह साफ पता चल रहा है कि उनके मन में बीजेपी के प्रति कितनी दुर्भावना और उससे बदला लेने की कितनी छटपटाहट है। मायावती की भाषा बेहद विकृत भी होती जा रही है। इसके कई कारण हैं। बीएसपी सरकार में हुए चीनी मिल घोटालों की सहित कई अन्य घोटालों की जांच शुरू हो गई है तथा कुछ की शुरू होने जा रही है। नोटबंदी के बाद मायावती का पैसा डूब चुका है। चुनाव लड़ने के लिये काफी धन चाहिए, रैलियां करने के लिए व भीड़ बुलाने के लिये धन चाहिए। काफी दबाव के चलते उन्हें अपने सबसे खतरनाक दुश्मन से भी दोस्ती करनी पड़ रही है। मायावती के नये दोस्त घोटालों और कई प्रकार के अपराधों में आकंठ डूबे हैं। सरकार योगी आदित्यनाथ की है। देश में मोदी लहर चल रही है। यही कारण है कि आज मायावती जिनकी राजनीति कभी मोदी के सहारे ही आगे बढ़ी थी और बीजेपी ने उनके जीवन की रक्षा की थी, आज वही मायावती बीजेपी को हराने के लिये छटपटा रही है। उसी आड़ में मायावती गलती पर गलती करती जा रही हैं।

बंगला खाली करने के दौरान सभी दलों के नेताओं ने यह बताने का असफल प्रयास किया कि वे बेहद गरीब हैं। उनके पास रहने को मकान नहीं हैं। यह बेहद घटिया और नायाब तरीका था। बीएसपी सुप्रीमो मायावती के बंगले की कहानी पूरे प्रदेश में चर्चित हो चुकी है। समाजवादी पार्टी के पूर्व मुखिया मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के पास भी अपनी काफी संपत्ति है। अगर इन सभी नेताओं को गरीब मान लिया जाए तो भी अब इन सभी नेताओं ने चुनाव आयोग के समक्ष हलफनामे में अपनी संपत्ति का जो विवरण दिया है, उसकी भी अब जांच हो जानी चाहिए, जिससे सब दूध का दुूध और पानी का पानी हो जायेगा। दलितों और पिछड़ों के ये तथाकथित नेता वास्तव में बेहद गरीब हैं या फिर देश की जनता व सरकार के धन के लुटेरे।

SOURCEहिन्दुस्थान समाचार/मृत्युंजय दीक्षित
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