प्लास्टिक कचरा- बेदम सरकार, अंधा कानून

प्लास्टिक के उपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए कठोर फैसले लेने होंगे दूसरे प्रकार के कचरों के निस्तारण का अभी तक हमने कोई कुशल प्रबंधन तंत्र नहीं खोज निकाला है

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राजधानी दिल्ली में पिछले वर्ष प्लास्टिक और सामान्य कचरे की वजह से बने पहाड़ के गिरने से पूर्वी दिल्ली के तीन लोगों की मौत हो गयी थी। महानगरों से निकलता प्लास्टिक कचरा जहां पर्यावरण का गला घोंटने पर उतारु है, वहीं इंसानी सभ्यता और जीवन के लिए बड़ा संकट खड़ा हो गया है। लेकिन हमारी संसद और राजनीति के लिए यह मसला कभी बहस का हिस्सा नहीं बना। दिल्ली और देश के दूसरे महानगरों के साथ गांवों में बढ़ते प्लास्टिक कचरे का निदान कैसे होगा, इस पर कोई बहस नहीं दिखती है। अमूमन जब कोई संकट सामने होता है तो हम समाधान और कानून की बात करते हैं। समस्या के निदान के बजाय मसलों पर राजनीति शुरु हो जाती है। राज्यों की अदालतों और सरकारों की तरफ से प्लास्टिक संस्कृति पर विराम लगाने के लिए कई फैसले और दिशा निर्देश आए, लेकिन इसका कोई फायदा नहीं दिखा। दूसरी तरह आधुनिक जीवन शैली और गायब होती झोला संस्कृति इसकी सबसे बड़ा कारक है। आर्थिक उदारीकरण और उपभोक्तावाद की संस्कृति गांव से लेकर शहरों तक को निगल रही है। महानगरों से निकले वाले अपशिष्ट पहाड़ के ढेर में तब्दील हो रहे हैं।

प्लास्टिक कचरे का बढ़ता अंबार मानवीय सभ्यता के लिए सबसे बड़े संकट के रुप में उभर रहा है, लेकिन इसकी असली वजह इंसान नही है। हम सिर्फ वर्तमान में जीना चाहते हैं भविष्य कितना संकटवाला है इसकी चिंता हमें शायद नहीं है। मौसम की पहली बारिश में ही महानगरों में प्लास्टिक कचरे की वजह से नाले जाम हो चले हैं। शहरों में बाढ़ की मुख्य वजह भी पालीथिन बन रही है। भारत में प्लास्टिक का प्रवेश लगभग 60 के दशक में हुआ। आज स्थिति यह हो गई है कि 60 साल में यह पहाड़ के शक्ल में बदल गया है। दो से तीन साल पूर्व भारत में अकेले आटोमोबाइल क्षेत्र में इसका उपयोग पांच हजार टन वार्षिक था। संभावना जताई गयी थी कि इसी तरफ उपयोग बढ़ता रहा तो जल्द ही यह 22 हजार टन तक पहुंच जाएगा। भारत में जिन इकाईयों के पास यह दोबारा रिसाइकिल के लिए जाता है वहां प्रतिदिन 1,000 टन प्लास्टिक कचरा जमा होता है। जिसका 75% भाग कम मूल्य की चप्पलों के निर्माण में खपता है। 1991 में भारत में इसका उत्पादन नौ लाख टन था।

आर्थिक उदारीकरण की वजह से प्लास्टिक को अधिक बढ़ावा मिल रहा है। 2014 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार समुद्र में प्लास्टिक कचरे के रुप में 5,000 अरब टुकड़े तैर रहे हैं। अधिक वक्त बीतने के कारण ये टुकड़े माइक्रो प्लास्टिक में तब्दील हो गए हैं। जीव विज्ञानियों के अनुसार समुद्र तल पर तैरने वाला यह भाग कुल प्लास्टिक का सिर्फ एक फीसदी है। जबकि 99% समुद्री जीवों के पेट में है या फिर समुद्र तल में छुपा है। एक अनुमान के मुताबित 2050 तक समुद्र में मछलियों से अधिक प्लास्टिक होगी। पिछले साल अफ्रीकी देश केन्या ने भी प्लास्टिक पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है। इस प्रतिबंध के बाद वह दुनिया के 40 देशों के उन समूह में शामिल हो गया है जहां प्लास्टिक पर पूर्णरुप से प्रतिबंध है। यहीं नहीं केन्या इसके लिए कठोर दंड का भी प्राविधान किया है। प्लास्टिक बैग के इस्तेमाल या इसके उपयोग बढ़ावा देने पर चार साल की कैद और 40 हजार डालर का जुर्माना भी हो सकता है। जिन देशों में प्लास्टिक पूर्ण प्रतिबंध है उसमें फ्रांस, चीन, इटली और रवांडा जैसे मुल्क शामिल हैं, लेकिन भारत में इस पर लचीला रुख अपनाया जा रहा है। जबकि यूरोपीय आयोग का प्रस्ताव था कि यूरोप में हर साल प्लास्टिक का उपयोग कम किया जाए। यूरोपीय समूह के देशों में हर साल आठ लाख टन प्लास्टिक बैग यानी थैले का उपयोग होता है। जबकि इनका उपयोग सिर्फ एक बार किया जाता है।

2010 में यहां के लोगों ने प्रति व्यक्ति औसत 191 प्लास्टिक थैले का उपयोग किया। इस बारे में यूरोपीय आयोग का विचार था कि इसमें केवल छह प्रतिशत को दोबारा इस्तेमाल लायक बनाया जाता है। यहां हर साल चार अरब से अधिक प्लास्टिक बैग फेंक दिए जाते हैं। वैज्ञानिकों के विचार में प्लास्टिक का बढ़ता यह कचरा प्रशांत महासागर में प्लास्टिक सूप की शक्ल ले रहा है। प्लास्टिक के प्रयोग को हतोत्साहित करने के लिए आयरलैंड ने प्लास्टिक के हर बैग पर 15 यूरोसेंट का टैक्स 2002 में लगा दिया था। जिसका नतीजा रहा किं 95% तक कमी आयी। जबकि साल भर के भीतर 90% दुकानदार दूसरे तरह के बैग का इस्तेमाल करने लगे जो इको फ्रेंडली थे। साल 2007 में इस पर 22% कर दिया गया। इस तरह सरकार ने टैक्स से मिले धन को पर्यावरण कोष में लगा दिया। अमेरिका जैसे विकसित देश में कागज के बैग बेहद लोकप्रिय हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार प्लास्टि नष्ट होने में 500 से 1000 साल तक लग जाते हैं। दुनिया में हर साल 80 से 120 अरब डालर का प्लास्टिक बर्बाद होता है। जिसकी वजह से प्लास्टिक उद्योग पर रि-साइकिल कर पुनः प्लास्टिक तैयार करने का दबाब अधिक रहता है।

जबकि 40% प्लास्टिक का उपयोग सिर्फ एक बार के उपयोग के लिए किया जाता है। प्लास्टिक के उपयोग को प्रतिबंधित करने के लिए कठोर फैसले लेने होंगे। प्लास्टिक और दूसरे प्रकार के कचरों के निस्तारण का अभी तक हमने कोई कुशल प्रबंधन तंत्र नहीं खोज निकाला है। उपभोक्तावाद की संस्कृति ने गांवों को भी अपना निशाना बनाया है। यहां भी प्लास्टिक संस्कृति हावी हो गई है। बाजार से वस्तुओं की खरीदारी के बाद प्लास्टिक के थैले पहली पसंद बन गए हैं। कोई भी व्यक्ति हाथ में झोला लेकर बाजार खरीदारी करने नहीं जा रहा है। यहां तक चाय, दूध, खाद्य तेल और दूसरे तरह के तरल पदार्थ जो दैनिक जीवन में उपयोग होते हैं उन्हें भी प्लास्टिक में बेहद शौक से लिया जाने लगा है। जबकि खानेपीने की गर्म वस्तुओं में प्लास्टिक के संपर्क में आने से रसायनिक क्रिया होती है, जो सेहत के लिए अहितकर है लेकिन सुधिवा जनक संस्कृति हमें अंधा बना रही है। जिसका नतीजा है इंसान तमाम बीमारियों से जूझ रहा है, लेकिन ग्लोबलाइजेशन के चलते बाजार और उपभोक्ता एवं भौतिकवाद का चलन हमारी सामाजिक व्यवस्था, सेहत के साथ-साथ आर्थिक तंत्र को भी ध्वस्त कर रहा है। एक दूषित संस्कृति की वजह से सारी स्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। सरकारी स्तर पर प्लास्टिक कचरे के निस्तारण के लिए ठोस प्रबंधन की जरुरत है। पर्यावरण संरक्षम के लिए पूरी इंसानी जमात को प्रकृति के साथ संतुलन बना कर लंबी लड़ाई लड़नी होगी। लेकिन प्लास्टिक पर प्रतिबंध और उपयोग के लिए बने कानून बेमतलब साबित हो रहे हैं। पब्लिक इस संकट पर बेफ्रिक और सरकारों को राजनीति से फुर्ससत कहां।

SOURCEहिन्‍दुस्‍थान समाचार/प्रभुनाथ शुक्ल
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