इधर कर्नाटक में बीएस येदियुरप्पा ने अपना इस्तीफा दिया और उधर विपक्ष ने एक सुर में इसे विपक्षी एकता की बड़ी जीत बताने का राग अलापना शुरू कर दिया। इस नाटकीय घटनाक्रम के बाद आधे घंटे बाद ही राहुल गांधी मीडिया से मुखातिब हुए और पीएम मोदी पर हमला बोलते हुए कहा कि पूरा विपक्ष बीजेपी और आरएसएस के खिलाफ एकजुट है। हम सब मिलकर इन सांप्रदायिक शक्तियों को हराएंगे। राहुल गांधी के बाद पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी कर्नाटक की जीत को क्षेत्रीय दलों की बड़ी जीत कहा। लगे हाथ मायावती भी बोल उठीं कि नरेंद्र मोदी का युग अब समाप्त हो गया है और 2019 के चुनाव में विपक्ष बीजेपी का नामोनिशान मिटा देगा। दरअसल 2014 के बाद से ही नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी का विजय रथ जिस तेजी के साथ देश के हर कोने में अपनी विजय पताका फहराते हुए बढ़ रहा है, उसने विपक्षी दलों की नींद हराम कर दी है। कभी देश में कांग्रेस के खिलाफ विपक्षी एकता की बात होती थी। जनता पार्टी से लेकर संयुक्त मोर्चा सरकार तक कई बार विपक्षी एकता के प्रयोग हुए, जो कभी भी अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सके। लेकिन, अब स्थितियां बदल गई हैं। अब बीजेपी के खिलाफ विपक्षी एकता की पहल की जा रही है। कुछ उपचुनावों में इसका सफल प्रयोग किया भी जा चुका है। कोशिश 2019 के लोकसभा चुनाव में इस प्रयोग को सफल करने की है, ताकि बीजेपी को केंद्र की सत्ता से हटाया जा सके।

कर्नाटक में येदियुरप्पा को सरकार नहीं बनाने देने की बात को कांग्रेस विपक्षी एकता के लिए एक बड़ा शुभ संकेत मान रही है। इसमें कोई शक नहीं है कि कर्नाटक में अगर बीजेपी की सरकार बन जाती तो यह उसके मनोबल को काफी बढ़ाता। वहीं बीजेपी की सरकार नहीं बन पाने से विपक्ष का मनोबल उछाल भरने लगा है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में ‘एकला चलो रे’ की तर्ज पर बीजेपी और जेडीएस पर करारा हमला करने वाले राहुल गांधी अब देवेगौड़ा के साथ गलबहियां करने के लिए तैयार हैं। अब राहुल गांधी को लगने लगा है कि कर्नाटक मॉडल को जोर-शोर से आगे बढ़ाकर सभी विपक्षी पार्टियों को एक मंच पर इकट्ठा किया जा सकता है। मोदी और शाह की अगुवई में अगुवाई में चल रहे बीजेपी के रथ को थामने के लिए विपक्षी एकता ही इन दलों के लिए अब एकमात्र विकल्प बचा हुआ है। ऐसा नहीं है कि कर्नाटक चुनाव के पहले विपक्षी एकता की कोशिशें नहीं हुई हैं। सोनिया गांधी दो बार विपक्षी दलों के नेताओं को डिनर पार्टी पर आमंत्रित करके अपनी मंशा जता चुकी हैं। कांग्रेस चाहती है कि यूपीए का एक बार फिर से ढंग से गठन हो और कांग्रेस की अगुवाई में सारे विपक्षी दल बीजेपी का 2019 के लोकसभा चुनाव में मुकाबला करें। एक ओर सोनिया गांधी की कोशिश चल रही हैं, तो दूसरी ओर ममता बनर्जी और टीआरएस प्रमुख के चंद्रशेखर राव भी अपनी ओर से एक फेडरल फ्रंट बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। जहां सोनिया गांधी कांग्रेस की अगुवाई में विपक्षी दलों को एक मंच पर लाना चाहती हैं, वहीं ममता बनर्जी तमाम क्षेत्रीय दलों से मुलाकात कर बीजेपी और कांग्रेस मुक्त फेडरल फ्रंट का गठन करने की कोशिश में लगी हुई हैं। वे पहले ही स्पष्ट कर चुकी हैं कि कांग्रेस अगर चाहे तो इस फ्रंट का हिस्सा बन सकती है, लेकिन फ्रंट की अगुवाई किसी अन्य दल के नेता के पास ही होगी। साफ है कि कांग्रेस की स्थिति उस प्रस्तावित फ्रंट में एक घटक दल की ही होगी, फ्रंट के नेता कि नहीं। विपक्षी एकता के प्रयास में यही बात सबसे बड़ी बाधा है। कांग्रेस विपक्षी दलों को एकजुट तो करना चाहती है, लेकिन उस प्रस्तावित गठबंधन की अगुवाई खुद करना चाहती है और फ्रंट की कमान राहुल गांधी के हाथ में रखना चाहती है, ताकि यदि विपक्षी दल 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को हरा पाने में कामयाब हुए तो प्रधानमंत्री का पद राहुल गांधी के पास ही जाए किसी अन्य दल के पास नहीं। यह एक तथ्य है कि कांग्रेस नेहरु-गांधी परिवार के अलावा किसी अन्य को प्रधानमंत्री पद पर बैठा हुआ नहीं देख सकती। यह ठीक है कि कांग्रेस ने परिवार के बाहर पीवी नरसिम्हा राव और मनमोहन सिंह को भी प्रधानमंत्री पद पर बिठाया है, लेकिन तब ऐसा करना कांग्रेस की मजबूरी थी। जब नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने थे उस समय सोनिया गांधी एक्टिव पॉलिटिक्स में आना आने से कतरा रही थीं, जबकि मनमोहन सिंह को इसलिए प्रधानमंत्री बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि खुद कांग्रेस में सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए एक राय नहीं हो पा रही थी। इसके अलावा विदेशी मूल का होना भी सोनिया के लिए एक नकारात्मक भाव उत्पन्न करता था। उस समय राहुल गांधी भी प्रधानमंत्री पद संभालने योग्य योग्य नहीं हुए थे। अब स्थिति बदल गई है।

राहुल गांधी खुद भी इस बात की घोषणा कर चुके हैं कि वे प्रधानमंत्री पद संभालने के लिए तैयार हैं। कर्नाटक के चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने खुलकर कहा था कि वे प्रधानमंत्री क्यों नहीं बन सकते, अगर चुनाव में बहुमत मिला तो वे प्रधानमंत्री जरूर बनेंगे। यही बात विपक्षी एकता को की संभावना को तार-तार करती नजर आती है। क्योंकि, विपक्षी दल किसी भी हालत में राहुल गांधी को अपना नेता स्वीकार करने के मूड में नहीं हैं। कर्नाटक के चुनाव में भी जहां राहुल गांधी ने अपना पूरा जोर लगाया था, कांग्रेस दोबारा पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में वापसी करने की जगह 122 सीटों से घटकर 78 सीटों पर आ गई। उसे राहुल गांधी की तमाम कोशिशों के बावजूद 44 सीटों का नुकसान सहना पड़ा और वह सत्ता के प्रत्यक्ष दौड़ से बाहर हो गई। यह ठीक है कि बीजेपी कुछ सीटों से बहुमत का आंकड़ा छूने में सफल नहीं हो सकी, इस कारण कांग्रेस और जीडीएस को पिछले दरवाजे से सत्ता पर काबिज होने का मौका मिल गया। लेकिन कर्नाटक की विफलता साा राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर भी सवालिया निशान लग गया है।

राहुल गांधी ने अपने नेतृत्व में चुनावी हार का एक रिकॉर्ड कायम किया है। यही कारण है कि विपक्षी दल उनको अपने गठबंधन का नेता मानने से के लिए तैयार नहीं हैं। अगर कांग्रेस सच में चाहती है कि विपक्षी दलों का एक मजबूत गठबंधन बने तो उसे सबसे पहले प्रस्तावित गठबंधन की अगुवाई करने का विचार छोड़ना होगा। क्योंकि अगर ऐसा हुआ, तभी विपक्षी एकता हो सकेगी और उनका गठबंधन 2019 के आम चुनाव में बीजेपी को कड़ी टक्कर दे सकेगा। जहां तक कर्नाटक मॉडल की बात है, तो कर्नाटक मॉडल चुनाव परिणामों के बाद उपजी परिस्थितियों की वजह से तैयार हुआ है। यह कोई कांग्रेस या जेडीएस की सोची समझी रणनीति नहीं थी। मंगलवार को जब चुनाव परिणाम आ रहे थे, उस समय भी विपक्षी नेताओं के दबाव में ही कांग्रेस को एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद ऑफर करने के लिए मजबूर होना पड़ा था। अन्यथा उसके पहले कांग्रेस के कई नेता विभिन्न टीवी चैनलों पर स्वीकार कर चुके थे कि वे जनता का फैसला स्वीकार करते हैं और विपक्ष में बैठने के लिए तैयार हैं। लेकिन चंद्रबाबू नायडू तथा ममता बनर्जी ने कांग्रेस पर दबाव डाला कि वह जेडीएस को बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान करे और कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री पद पर आसीन कराए। ममता बनर्जी का कहना था कि कांग्रेस का यह कदम विपक्षी एकता की राह को मजबूत करेगा और बीजेपी को इसी रास्ते से सत्ता से दूर रखा जा सकेगा। बीजेपी ने पिछले कुछ समय में बहुमत नहीं मिलने के बाद भी विभिन्न राज्यों में जिस तरह सरकार बनाने में सफलता पाई है, उसकी वजह से ममता बनर्जी और चंद्रबाबू नायडू को डर था कि वह कर्नाटक में भी आठ सीटों का आसानी से जुगाड़ कर लेगी। ऐसा होता तो बीजेपी पूरी ताकत के साथ इस साल चार राज्यों के विधानसभा चुनावों में जाती और उसी बढ़े हुए मनोबल के साथ अगले आम चुनाव का भी सामना करती। इसके साथ ही यह भी समझ लेना चाहिए कि विपक्षी एकता का रास्ता भी इतना आसान नहीं है। यह सोनिया गांधी के साथ ही राहुल गांधी को भी समझना होगा और उन्हें विपक्षी एकता के नाम पर अपने प्रधानमंत्री बनने की महत्वकांक्षा को कुछ समय के लिए स्थगित करना होगा। कर्नाटक चुनाव ने बीजेपी को भी एक बड़ा संदेश दिया है।

कर्नाटक चुनाव में कभी बीजेपी के सहयोगी रही तेलुगू देशम पार्टी और शिवसेना ने जिस तरह कांग्रेस और जेडीएस का कर्नाटक के तेलुगू तथा मराठी भाषी क्षेत्र की अलग-अलग विधानसभा सीटों पर समर्थन किया, जिसके परिणामस्वरुप बीजेपी को इन क्षेत्रों में वैसी सफलता नहीं मिल सकी, जिसकी वह अपेक्षा कर रही थी और अंततः वह बहुमत के आंकड़े से 8 सीट दूर रह गई। बीजेपी को यह भी समझना होगा कि आने वाला लोकसभा चुनाव एक ओर तो बीजेपी की मौजूदा सरकार के कामकाज का की परीक्षक होगा, वहीं बीजेपी को एंटी इनकंबेंसी फैक्टर का भी सामना करना पड़ेगा। ऐसे में अपने पुराने सहयोगियों को नाराज करने का जोखिम पार्टी नहीं उठा सकती है, क्योंकि पुराने साथी पार्टी को चुनाव के समय गहरा जख्म दे सकते हैं। बीजेपी को इसके साथ ही एनडीए का दायरा बढ़ाने की दिशा में भी विचार करना होगा। क्षेत्रीय दलों को अधिक से अधिक संख्या में अपने साथ जोड़कर ही बीजेपी 2019 के चुनावी रण को पार कर सकती है। कर्नाटक में जो हुआ सो हुआ, लेकिन अब पार्टी को कर्नाटक चुनाव को भूलते हुए आगे की रणनीति पर अभी सही विचार करना होगा, तभी वह 2019 में अपनी वापसी की बात सोच सकती है।

हिन्दुस्थान समाचार/दिव्य उत्कर्ष

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