Friday 17 September 2021
- Advertisement -
HomeCrimeसवर्णों की गणहत्या के सभी अभियुक्तों को किया उच्च न्यायालय ने रिहा

सवर्णों की गणहत्या के सभी अभियुक्तों को किया उच्च न्यायालय ने रिहा

पटना हाईकोर्ट ने अपना निर्णय सुनाते हुए यह भी कहा कि इस कांड में अभियोजन और पुलिस प्रशासन भी आरोपियों के खिलाफ ठोस साक्ष्य पेश करने में असफल रहा है

बिहार में 22 साल पहले हुए 34 भूमिहारों के क्रूरतम नरसंहार पर फैसला सुनाते हुए पटना हाईकोर्ट ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराए गए 15 आरोपियों को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया गया है। कोर्ट के इस फैसले के बाद सेनारी समेत आसपास के गाँवों में भारी निराशा और आक्रोश का माहौल है। लोगों का कहना है कि क्या 34 लोगों की गला रेतकर, और पेट चीरकर हत्या किसी ने भी नहीं की थी। साथ ही लोगों की मांग है कि सरकार आरोपियों को सजा दिलाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करे।

क्या हुआ था 18 मार्च 1999 को

22 साल पहले 18 मार्च 1999 को दिल्ली में वाजपेयी सरकार अपना एक साल पूरा होने का जश्न मना रही थी। उसी रात बिहार के सेनारी गांव में 500-600 एमसीसी (माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर) के लोग घुसे। सेनारी गांव में 300 घर थे जिसमे 70 भूमिहार परिवार रहते थें। हथियारों के साथ घुसे एमसीसी के अपराधियों ने गाँव को चारों ओर से घेर कर घरों से खींच-खींच के मर्दों को बाहर किया गया। इस घटना को शाम 7.30 से रात 11 बजे के बीच में अंजाम दिया गया था। वहीं पुलिस को नरसंहार की सुचना 11:40 मिनट पर प्राप्त हुई थी।

भूमिहार समाज के कुल 40 लोगों को चुनकर उन्हें गांव से बाहर ठाकुरबाड़ी मंदिर के पास ले गए। जहाँ उनकी बड़ी ही क्रूरता के साथ 34 लोगों की गला और पेट चीर कर हत्या कर दी गयी जबकि 6 लोगों को वही तड़पता हुआ छोड़ दिया गया था। घटना की नरसंहार में जान गवा चुके अवध किशोर शर्मा की पत्नी चिंतामणि देवी ने लिखाई थी। जिसमे अन्य पीड़ितों के बयानों को भी शामिल किया गया था। घटना की विवेचना करते हुए स्थानीय पुलिस ने 15 नामजद व अन्य आरोपियों पर IPC 147, 148, 149, 324, 307, 302, 452, 380, 120-B, आर्म्स एक्ट, 3/4 एक्सप्लोसिव सब्सटांसिस एक्ट के तहत FIR दर्ज की थी।

रक्त रंजित का ऐसा दृश्य था कि गाँव के पटना हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार पद्मनारायण सिंह जब अपने सेनारी गांव पहुंचे तो अपने परिवार के 8 लोगों की फाड़ी हुई लाशें देखकर उनको दिल का दौरा पड़ा और उनकी मौत हो गई।

अपनी आँखों से पुरे घटना क्रम को देखने वाली चिंतामणि देवी ने सेनारी हत्याकांड में अपने बेटे व पति को खो दिया था। पुलिस द्वारा लिए गए उनके बयान की एक कॉपी हमारी टीम के पास भी पहुंची है। जहां उन्होंने पूरी घटना को बयान किया है। उन्होंने बताया कि “मेरा नाम चिंतामणि देवी है। शाम करीब 7.30 बजे मेरा बेटा मधुकर लालटेन की रोशनी में छत पर पढ़ रहा था और मैं भी वहीं थी। कुछ शोर सा सुनकर मेरे पति घर से बाहर आये। मैं और मेरे बेटे ने देखा कि कई लोग गली में पहुंच गए हैं। इंजीनियर साहब राधे श्याम शर्मा के घर के पास उनके दरवाजे पर दस्तक दे रहे थे। मेरे बेटे ने उन्हें सूचित किया कि उनके घर में कोई भी पुरुष सदस्य नहीं है।

उनमे से एक व्यक्ति ने मेरे बेटे को नीचे बुलाया। मधुकर को लगा कि वह उससे कुछ पूछना चाहते है जिसके लिए वह लालटेन लेकर नीचे चला गया। मैं भी अपने बेटे के पीछे गई। मैंने सह-ग्रामीणों को देखा (1) सोना भुइयां के बेटे रामाशीष भुइयां (2) रामलखन भुइयां, अज्ञात का पुत्र, (3) साधु भुइयां अज्ञात का पुत्र, (4) वेंकटेश भुइयां, माटी भुइयां का पुत्र, (5) भोडा भुइयां (6) बिफन भुइयां (7) मुर्गी भुइयां, (8) गेंदा भुइयां,(9) राधे नाथून रवानी के पुत्र श्याम रमानी और (10) घोघर भुइयां का पुत्र सुरेश भुइयां (11) लूटन भुइयां का पुत्र भागलू भुइयां, (12) बोध भुइयां के पुत्र चमारू भुइयां (13)दुखन कहार (14) दुल्ली यादव (15) व्यास यादव, गांव के जनार्दन यादव के दोनों बेटे गोखुलपुर और (16) रमेश यादव मेरे घर के पास खड़े थे।

उनमें से मेरे गांव के लोग लुंगी और गंजी पहने थे। दुखन कहार, दुल्ली यादव, व्यास यादव और रमेश यादव पुलिस की वर्दी में थे। साथ में उनके साथ अन्य व्यक्ति भी थे जिन्हें मैं नहीं पहचान सकी। इस दौरान मुर्गी भुइयां मेरे बेटे का हाथ पकड़ा और खींच कर ले जाने लगा। मैंने उसके सामने याचना की, लेकिन उसने मेरे अनुरोध पर ध्यान नहीं दिया और उसे ठाकुरबाड़ी जोकि उत्तर-पूर्व दिशा में स्थित है वहां ले गया। इसी बीच मुझे 3-4 राउंड गोली चलने की आवाज सुनाई दी। साथ ही उन्होंने नारा लगाया “एमसीसी जिंदाबाद”। तब, मुझे पता चला कि वे थे एमसीसी पार्टी के सदस्य है। वे मेरे बेटे को मारने के लिए ले गए थे। मेरे पति भी बाहर गए हुए थे। मैं अपने बेटे और पति को छुड़ाने के लिए ठाकुरबाड़ी की ओर चल पड़ी।

मैंने देखा कि सैकड़ों चरमपंथी वहाँ इकट्ठे हुए है। उनमें से कुछ पुलिस की वर्दी और कुछ ने लुंगी और गंजी पहने थे। वे पसुली और गरसा ले जा रहे (धारदार हथियार) लिए हुए थे। उन्होंने मेरे पति और बेटे को हाथ बांधकर बांध दिया था। गेंदा भुइयां ने मेरे बेटे और मुर्गी भुइयां ने मेरे पति की टांगें बांध दीं। तीन चार लोगो ने उन्हें ज़मीन पर दबाकर उनकी गर्दन को पसुली से काट दिया था। मैंने जब शोर मचाया तो उन्होंने मुझे धक्का दे दिया जिससे मैं भूसे के ढेर पर गिर पड़ी। फिर वहीं से मैंने देखा कि वे गांव के कई लोगों को ला रहे थे।

जबरन उनका गला रेत कर उनकी बर्बर हत्या कर रहे थे। इसके बाद मैंने देखा कि ज्यादातर गाला काट कर हत्याएं दुखन राम और रमेश यादव कर रहे थे। मेरे से यह सब देखा नहीं गया जिसके बाद मैं रोते व छाती पीटते घर वापस आ गयी। इसके 2 से 3 घंटे बाद मैंने एक विस्फोट की आवाज सुनी। सभी आरोपी MCC ज़िंदाबाद के नारे लगाकर वहां से बेख़ौफ़ चले गए। घटना के बाद पुरे गाँव में चीख पुकार मच गई। मैं फिर से ठाकुरबाड़ी गई। मैंने वहां कई ग्रामीणों को रोते हुए देखा। साथ ही दर्जनों मृतकों के लहूलुहान शव पड़े थे। मेरे बेटे व पति का भी शव वहां पड़ा था। ग्रामीणों ने मुझे बताया कि सैकड़ो की संख्या में MCC के कट्टरपंथी आये थे जोकि ऊँची जाति के पुरुषो का नरसंहार करना चाहते थे।”

निचली अदालत ने 74 आरोपियों में से 15 को सुनाई थी सजा

जहानाबाद सिविल कोर्ट के अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश रंजीत कुमार सिंह ने इस नरसंहार के 15 आरोपियों को 15 नवंबर 2016 को सजा सुनाई थी। जिसमे 11 आरोपियों को मौत व अन्य को सश्रम आजीवन कारावास की सजा सुनाई गयी थी। जिला न्यायलय ने बुधन यादव, बचेश कुमार, बुटाई यादव, सतेंद्र दास, ललन पासी, द्वारिक पासवान, करीमन पासवान, गोराई पासवान, उमा पासवान व गोपाल साओ को फांसी की सजा सुनाई थी। जबकि 74 आरोपियों में से तब भी साक्ष्य के अभाव में 23 अन्य को बरी कर दिया था। जबकि कुछ की सुनवाई के दौरान मौत हो गई थी।

पटना हाईकोर्ट ने अपना निर्णय सुनाते हुए यह भी कहा कि इस कांड में अभियोजन और पुलिस प्रशासन भी आरोपियों के खिलाफ ठोस साक्ष्य पेश करने में असफल रहा है। पटना हाई कोर्ट ने रात के अंधेरे में आरोपियों की पहचान किए जाने पर सवाल उठाते हुए अपना निर्णय दिया है। अदालत ने घटना को तो सही माना है, किन्तु आरोपियों की पहचान को सही नहीं माना है।

सेनारी काण्ड के पीड़ितों के परिजनों ने हमसे बातचीत में कोर्ट के निर्णय पर असहमति जताई है। कोर्ट भले ही साक्ष्य के अभाव की बात कर रहा है किन्तु इस नरसंहार में उनके परिजनों के कटे हुए सिर से बढ़कर क्या सबूत हो सकता है ? सेनारी नरसंहार का नाम सुनकर आज भी पुरे इलाके के लोगों की रूह काँप उठती है। किन्तु आज 22 साल बाद सभी आरोपियों को साक्ष्य के आभाव में बरी किया जाना उनके जख्मों पर नमक रगड़ने के समान है।

कोर्ट के फैसले पर दुःख व्यक्त करते हुए भारतीय जनता पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष डॉ संजय जायसवाल ने फेसबुक पर लिखा है कि, “34 इंसानों की हत्या किसी ने नहीं की. दुखद!!!!!??????” संजय जायसवाल ने कोर्ट द्वारा सुनाये गए इस फैसले पर अपनी नाराज़गी व्यक्त करते हुए दुःख जताया है।

इस नृशंश हत्याकांड में पटना हाईकोर्ट द्वारा सुनाये गए फैसले से लोगों में काफी निराशा है। मृतक के परिजनों का कहना है कि सरकार फैसले में सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करे जिससे उन्हें न्याय मिल सकें

To serve the nation better through journalism, Sirf News needs to increase the volume of news and views, for which we must recruit many journalists, pay news agencies and make a dedicated server host this website — to mention the most visible costs. Please contribute to preserve and promote our civilisation by donating generously:

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

- Advertisment -

Popular since 2014

EDITORIALS

[prisna-google-website-translator]