Sunday 26 June 2022
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बिहार शिक्षातंत्र की दयनीय स्थिति

आज अंततः मुझे वह देखने को मिला जिसमें एक लगभग 6 वर्षीय बच्चे ने बिहार की शिक्षा व्यवस्था के यथार्थ से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को अवगत करवाया। बिहार सरकार के माध्यमिक विद्यालय की शिक्षिका के पुत्र होने के नाते मुझे बिहार की शिक्षा व्यवस्था को समीप से जानने का अवसर मिला। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की कमी एक आम समस्या रही है।

मेरी स्वर्गीय माता का जब खगौल से दानापुर सन 1995 में स्थानान्तरण हुआ तब उनसे मुझे ज्ञात हुआ था कि उनके नए विद्यालय में उनके पूर्व स्थायी संस्कृत शिक्षक का प्रबंध ही नहीं था!

प्रत्येक दिन संस्कृत एवं अंग्रेजी की शिक्षा ग्रहण करने हेतु मेरे घर पर अन्य सरकारी विद्यालय के विद्यार्थियों का संध्याकाल में तांता लगा रहता था। मुझे कई बार अचरज होता था कि दसवीं कक्षा के विद्यार्थी एक साधारण सा अंग्रेजी में अनुवाद नहीं कर पाते थे।

मैंने कई लोगों को बिहार में शिक्षा व्यवस्था की दुर्दशा के लिए शिक्षकों को ही केवल दोषी ठहराते हुए सुना है। परन्तु मैं इस बात से पूर्ण रूप से सहमत नहीं हूँ। मैंने अपनी आँखों से कई बार विद्यार्थियों को सरकारी विद्यालयों की अंग्रेज़ी कक्षाओं में इसलिए अनुपस्थित पाया क्योंकि इस विषय में उत्तीर्ण होना बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के दसवीं के छात्रों के लिए आवश्यक नहीं है! और इस बात को मेरे घर पर आने वाले कई विद्यार्थियों ने स्वीकार भी किया है।

जब सन् 2005 में नई सरकार का बिहार में पदार्पण हुआ तब मुझमे यह आशा जागृत हुई कि शायद यह सरकार दसवीं तक अंग्रेज़ी को अनिवार्य विषय घोषित करने की चेष्ठा करेगी। परन्तु दुर्भाग्य की बात है कि ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। शिक्षा व्यवस्था की जिस दुर्दशा का मैं 1990 और 2000 के दशक में साक्षी रहा हूँ वह आज उससे भी दयनीय स्थिति में है।

पटना तथा राज्य के अन्य हिस्सों में कुकुरमुत्ते की तरह खुल रहे निजी विद्यालय इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि बिहार सरकार की शिक्षा व्यवस्था पर लोगों का भरोसा तनिक भी नहीं है। आपत्ति निजी विद्यालयों के पदार्पण से नहीं है, परन्तु उनमें शिक्षा के मानक का कोई मापदंड तो हो जिसका निर्णय सरकार समुचित ढंग से करे। इसके लिए परीक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता है। एक तरफ़ तो ऐसा हो नहीं रहा; दूसरी तरफ़ मरणासन्न शिक्षा व्यवस्था की ताबूत में आख़री कील ठोकने का कार्य राज्य सरकार ने अनुबंधित प्राथमिक शिक्षकों की बहाली का निर्णय करके किया।

इन अनुबंधित शिक्षकों का मासिक वेतन वेतन केवल रु० 5,000-7,000 के बीच रखा गया। इन शिक्षकों की नियुक्ति में भारी धांधलियां हुई। शिक्षकों एवं शिक्षा व्यवस्था का ऐसा तिरस्कार आपने कभी नहीं सुना होगा।

20,000 से भी अधिक संख्या में अनुबंधित शिक्षकों की डिग्रियाँ फ़र्ज़ी पाई गईं। पटना उच्च न्यायालय का हमें कृतज्ञ होना चाहिए जो इस विषय का संज्ञान लिया गया और इन फ़र्ज़ी डिग्रीधारी शिक्षकों को अविलम्ब त्यागपत्र देने को कहा गया। अन्यथा उन अबोध विद्यार्थियों के भविष्य के साथ क्या होता इसकी आप केवल कल्पना ही कर सकते हैं। रु० 5000 वेतन वाली नौकरी के लिए फ़र्ज़ी डिग्रीधारी ही शिक्षक मिलेंगे ना?

मेरी स्वर्गीय माता जब दसवीं कक्षा की संस्कृत की उत्तरपुस्तिकाओं का मूल्यांकन करती थीं तब उन्होंने कई ऐसे प्रसंग बताए थे जब बिहार के दूरस्थ क्षेत्रों के छात्रों ने सीता को श्रीकृष्ण की पत्नी बताया था!

यहाँ तो मैंने सिर्फ़ प्राथमिक एवं माध्यमिक शिक्षा की दुर्दशा का वर्णन किया है। उच्च शिक्षा की दुर्दशा पर तो एक पूरा लेख लिखा जा सकता है। इस मृत शिक्षा व्यवस्था को केवल पुनर्जीवित करने की अपेक्षा हम बिहार में बनने वाली नई सरकार से कर सकते हैं।

इस दयनीय परिस्थिति के लिए अभिभावक भी कम दोषी नहीं हैं — जो शिक्षा ग्रहण करने के लिए अपने बच्चों को सिर्फ इसलिए प्रेरित करते हैं क्योंकि इससे उन्हें आजीविका मिलेगी, इसलिए नहीं कि इस शिक्षा से उनका ज्ञान वर्धन होगा। यह मानसिकता भी कम विनाशकारी नहीं है।

नई सरकार और अभिभावकों को मिल कर शिक्षा व्यवस्था को सुदृढ़ करने का प्रयत्न करना होगा। साथ ही दोनों पक्षों को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि परीक्षाएँ कदाचारमुक्त हों ताकि हाजीपुर वाली घटना की पुनरावृत्ति न हो सके।

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