बचपन अभी पूरी तरह से बीता नहीं, वयस्कता अभी पूरी तरह से आई नहीं। अभी तो हम बचपन और वयस्कता के बीच की दहलीज़ पर खड़े हैं… जी, हम किशोर हैं, टीनेजर हैं… न बच्चे न युवा!

युवा हो रहा किशोर मन बहुत से अंतर्द्वंद से गुज़रता है। शरीर और मन में हो रहे परिवर्तनों को अक्सर सहजता से नहीं ले पाता और फलस्वरूप कभी कुंठित तो कभी विद्रोही हो उठता है।

किशोर मन हमेशा यही चाहता है कि बस लपककर तुरंत ही वयस्कों की क़तार में शामिल हो जाएँ। उम्मीद करता है कि आसपास के लोग हमें बड़ा और ज़िम्मेदार मानें, हमसे ऐसे व्यवहार करें जैसे किसी वयस्क व्यक्ति के साथ किया जाता है; ज़रूरी मसलों पर लोग हमसे राय-मशविरा करें और हमारे सुझावों को सम्मान भी दिया जाये।

दरअसल किशोरावस्था में हम इस अंतर को समझ ही नहीं पाते कि हम बड़े हो रहे हैं या बड़े हो गए हैं। यह वो समय है जब हमारा कच्चा मन परिपक्वता के लिये तैयार हो रहा होता है। लेकिन हम इस तैयारी को परिपक्वता ही मान लेते हैं। हम समझते हैं कि अब हम परिपक्व हो चुके हैं, इतने समझदार हो गए हैं कि न केवल ख़ुद अपने निर्णय ले सकते हैं, बल्कि दूसरों का भी मार्गदर्शन कर सकते हैं।

मन में इस तरह के विचार आना कोई अनोखी बात नहीं है और न ही यह कोई समस्या है। आमतौर पर सभी किशोर ऐसी मनोदशा से गुज़रते हैं। लेकिन समस्या तब खड़ी होती है जब हम दूसरों के रवैये से कुंठित होने लगते हैं। जब हमें लगता है कि लोग हमें परिपक्व नहीं मान रहे, हमारे सुझावों को वह सम्मान नहीं दे रहे जो उन्हें देना चाहिए, तब हमें हताशा और कुंठा घेरने लगती है जो हमारे पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करने लगती हैं।

कुछ-कुछ ऐसी ही मनःस्थिति होती है जब हमारी बचपन वाली चपलता जाने लगती है और हम अकेलेपन में घिरने लगते हैं… न पढ़ाई में मन लगता है और न ही किसी और काम में। यहाँ तक कि कई बार लोगों से मिलना-जुलना भी अच्छा नहीं लगता। परेशानी इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि इस समय पढ़ाई भी अपने महत्वपूर्ण मोड़ पर होती है। ज़िन्दगी के यही वर्ष हमारे करियर के लिए बहुत अधिक महत्वपूर्ण होते हैं।

लेकिन मन है कि हमारी सुनता ही नहीं! हम मानकर बैठ जाते हैं कि हमें कोई नहीं समझता, इसलिए जल्दी किसी से अपने दिल की बात भी करना नहीं पसंद करते। अपनी परेशानी, अपनी मनोदशा किसी के साथ साझा भी नहीं करना चाहते। लेकिन यह हमारी गलती होती है।

वास्तव में आपसे बड़े सभी लोग आपकी मनोदशा को अच्छी तरह से समझ सकते हैं क्योंकि वे भी उम्र के इस नाज़ुक दौर से गुज़र चुके हैं। आप शायद इस बात को स्वीकार न कर पायें लेकिन दरअसल वे भी कभी न कभी इस तरह की व्याकुलता, बेचैनी और कुंठा के शिकार हुए होंगे। एक बार अपने माता-पिता को दोस्त बनाकर तो देखिए। पहले अपने अनुभव न शेयर करके उनसे उनके अनुभवों के बारे में, उनकी सोच के बारे में समझने की कोशिश करें। फिर आपको पता चलेगा कि आपको कोई अनोखे अनुभव नहीं हो रहे।

इसके बाद आपको उनके साथ अपने मनोभाव साझा करने में अधिक परेशानी नहीं होगी। संभव है कि आप अभी भी उनसे कुछ भी कहने में संकोच करें।

हो सकता है कि आपके मन में यह बात आए कि माता-पिता से अगर अपने मन की बात कही तो वे डाँटेंगे या उनके सामने आपकी छवि ख़राब हो जायेगी। लेकिन ऐसा भी तो हो सकता है कि वे आपकी समस्या को समझकर उनका समाधान बताएँ। आख़िर माता-पिता आपके अपने हैं, आपको प्यार करते हैं, आपका भला-बुरा समझते हैं; वे ही आपको क्यों नहीं समझेंगे?

सच तो यही है कि आपके माता-पिता से अधिक आपको न ही कोई समझ सकता है और न ही समझा सकता है; केवल वे ही हैं जो आपकी मनोदशा का कोई फ़ायदा नहीं उठाएंगे और न ही उसका मज़ाक़ बनायेंगे। केवल वे ही आपकी भावनाओं की गोपनीयता को बनाये रखेंगे, और केवल वे ही हैं जो आपका केवल भला चाहेंगे, और इसीलिए आपको आपके लिये सबसे उपयुक्त सलाह भी देंगे।

रोचक बात तो यह है कि जब आप अपने माता-पिता के साथ अपनी उम्र की बातें शेयर करते हैं तो वे स्वयं भी उम्र के उस दौर में पहुँच जाते हैं जब वे इसी तरह के मनोभावों से गुज़र रहे थे। वे समझ पाते हैं कि उन्हें भी तो कभी ऐसे ही अनुभव हुए थे। वे इस उम्र की समस्याओं को समझते हैं और साथ ही ये भी समझते हैं कि अगर सही मार्गदर्शन न मिले तो यह उम्र कैसे भटका देती है। इसलिए उनपर विश्वास करें, उनसे अपनी भावनाओं को शेयर करें, और याद रखें कि मम्मी-पापा भी कभी आपकी ही उम्र के थे! है न?