Wednesday 25 May 2022
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पानी बिन जीवन कैसा?

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[dropcap]म[/dropcap]छली जल की रानी है जीवन उस का पानी है, यानी पानी होगा तभी ज़िंदगी बाक़ी रहेगी। पानी, पानी, पानी का हाहाकार है। क़ौमी मीडीया की गुफ़्तगू का मौज़ू (विषय) बना हुआ है। पानी है कि हाथ से फिसल कर आँख से छलकने को बेताब है। कहते हैं कि पानी अपना रास्ता ख़ुद बना लेता है। पत्थरों को फोड़ कर, पहाड़ का सीना चीर कर निकल जाता है। लेकिन इस का इन्सान पर कोई असर नहीं होता। पानी उस को सेराब तो करता है (भिगोता है) मगर इस में नमी नहीं पैदा करता। इन्सान को ही उस की ज़रूरत है, फिर भी वो पानी को समझना नहीं चाहता। या यूं कहा जाये कि पानी उस की अक़ल पर पड़ा हुआ है। तभी तो वो पानी को फ़रामोश करता है (भूल जाता है)। पानी के धुतकारने पर वो बुलबुला जाता है। इस का नज़ारा आजकल मुल्क के कई हिस्सों में देखने को मिल रहा है।

तक़रीबन आधा मुल्क क़हत (अकाल), ख़ुश्कसाली (सूखा) या पानी की कमी से जूझ रहा है। इस की वजह क्या लगातार दो साल में 12 से 14 फ़ीसद मानसून में आई गिरावट है? नहीं। माहौल में पैदा हो रही लगातार तबदीली और ज़ेर-ए-ज़मीन (भूतल) पानी की सतह में आई कमी से हालात ख़राब हुए हैं। बेलगाम सनतकारी (औद्योगीकरण) ने आलूदगी (प्रदूषण) को जन्म दिया। पेड़ कटने से जंगलात सिकुड़ गए। नदियाँ, फ़ैक्ट्रियों की गंदगी से ज़हरीली और उथली हो गईं। तालाब पाट कर बिल्डिंगें खड़ी कर दी गईं, सरकारों की अनदेखी से उसे बढ़ावा मिला। नतीजा पानी का बोहरान (स्तर में गिरावट), बाढ़ और सूनामी की शक्ल में सामने आ रहा है। पहले बस अड्डे डूबते थे अब एयरपोर्ट डूब रहे हैं। पिछले दो सालों में रबी की फ़सल ख़राब होने से किसानों की ख़ुदकुशी के वाक़ियात में इज़ाफ़ा हुआ। बेवक़्त ओले, बारिश और तेज़ हवाएं भी नेचर का तवाज़ुन (संतुलन) बिगड़ने की तरफ़ इशारा करते हैं।

वज़ारत बराए आबी वसाइल और तरक़्क़ी (जल संसाधन विकास मंत्रालय) ने इस बार के वाटर वीक में पानी की कमी से निपटने के लिए इसराईल को पार्टनर बनाया। साथ ही पानी की क़िल्लत से जूझ रही पाँच रियासतों गुजरात, कर्नाटक, महाराष्ट्र, राजस्थान और तेलंगाना को सरगर्म साझेदार। इस मौक़े पर ये बात भी सामने आई कि मुल्क के 600 में से 300 से ज़्यादा अज़ला सूखे की ज़द में हैं। ये हालात धीरे धीरे कर के बने हैं और आइन्दा और बदतर हो जाएंगे। आदाद-ओ-शुमार के मुताबिक़ 1951 में 4177 क्यूबिक मीटर फ़ी शख़्स पीने लायक़ पानी मौजूद था जो 2011 मैं घट कर 1150 क्यूबिक मीटर रह गया। इस में कुछ दख़ल मौसमों में आ रही तबदीली का भी हो सकता है लेकिन जो फ़िल्म हम देख रहे हैं वो हमारी ही तैयार करदा है। ज़मीनी पानी के इस्तेमाल में जैसी लापरवाई हमने पिछले 50 बरसों में बरती है इस का नतीजा उस के सिवा कुछ हो ही नहीं सकता था। पानी को हवा, रोशनी जैसी चीज़ मान कर ज़मीन के नीचे से इस को अंधाधुंद खेंचते गए। ऐसे इलाक़े जिनके बारे में कहा जाता था पग-पग रोटी डग डग नय्यर ‘मावा’ भी सूखे की चपेट में है। 25 हज़ार बरसों में बने पानी के भंडार चित्रकूट जैसे इलाक़ों के पानी को भी सिरे से ख़त्म कर दिया। जहां ऐसा नहीं कर पाए वहां मोटे मोटे पाइपों से कारख़ानों का कचरा ठोंस कर उन्हें ज़हर यल्ला बना दिया। दरअसल पीने लायक़ साफ़ पानी को बर्बाद करके ही बोतल बंद पानी के धंदे को बढ़ावा दिया गया है।

पहले पानी बेचा नहीं जाता था क्योंकि पानी को तालाबों, नदियों में संजोने की रिवायत थी। अब पानी हम ख़रीदने लगे हैं, इस का मतलब है कि पानी पैदा नहीं करते, जमा भी नहीं करते। सदर जम्हूरिया (राष्ट्रपति) प्रणव मुखर्जी ने वाटर वीक (भारत जल सप्ताह) में इस बात पर तशवीश का इज़हार किया (चिंता व्यक्त की) कि दुनिया में सनतकारी की वजह से पानी की खपत तो बढ़ी है लेकिन पानी का तहफ़्फ़ुज़ (संरक्षण) नहीं हो पा रहा । उन्होंने कहा कि भारत में दुनिया की 17 फ़ीसद आबादी रहती है लेकिन पानी की दस्तयाबी (उपलब्धता) सिर्फ 4 फ़ीसद है। पानी का तेज़ रफ़्तारी से ग़लत इस्तेमाल हो रहा है जिसकी वजह से ज़मीन में पानी की सतह में कमी आ रही है। उन्होंने पानी के मुंसिफ़ाना तक़सीम (न्यायसम्मत आवंटन) और मुनासिब (उचित) इस्तेमाल की ज़रूरत पर ज़ोर दिया। सदर जम्हूरिया ने कहा कि ज़राअत (कृषि) आब-ए-पाशी (सिंचाई) पर मुनहसिर (निर्भरशील) है और किसान को मुसलसल (लगातार) तरक़्क़ी के लिए ज़मीन में पानी के ज़ख़ाइर (भंडार) की ज़रूरत है। इस लिए ज़मीन के अंदर पानी की सतह बढ़ाने पर सबको ख़ुसूसी तवज्जा (विशेष ध्यान) देनी चाहिए।

भारत में 263 नदियाँ हैं। जो भी नदी एक से ज़्यादा सूबों से गुज़रती है वो रियास्तों में आपसी इख़तिलाफ़ (टकराव) का सबब बनती है। मसलन पंजाब हरियाणा के बीच सतलुज वयास यमुना लिंक की लड़ाई बहुत पुरानी है। मसला अदालत में है। दिल्ली हरियाणा के बीच यमुना को लेकर कहा सुनी होती रहती है। दिल्ली को 215 एमजी डी पानी यमुना से और 240 एमजी डी गंगा से मिलता है। कावेरी को लेकर कर्नाटक और तमिलनाडू में रोज़ हंगामा होता है। वजह साफ़ है एक तरफ़ आबादी और नीचाई के इलाक़ों में बढ़ोतरी हो रही है, दूसरी तरफ़ नद्दियों में पानी की कमी। पानी के बटवारे को लेकर तो रियासतें बरसर-ए-पैकार (तैयार) रहती हैं लेकिन नदी की हालत को सुधारने की ज़िम्मेदारी नहीं निभातीं।

कहा जाता है कि अगस्त्य ऋषि ने पूरा समुंद्र पी लिया था। हम भी कुछ कम नहीं हैं अलग अलग रियासतों के लोग अलग अलग नदियों को पी चुके हैं। दिल्ली की बात की जाये तो दिल्ली वाले यमुना के बाद गंगा का बड़ा हिस्सा पी चुके हैं अब भागीरथी का पानी पी रहे हैं। रीड़ो का जी से पानी लाने की बात चल रही है ये दिल्ली वालों के लिए आख़िरी ज़रीया होगा। सवाल ये है कि क्या दिल्ली की हालत शुरू से ऐसी है या दिल्ली वालों ने ख़ुद तबाही मोल ली है। दस्तावेज़ों से मालूम होता है कि दिल्ली में 800 तालाब और कई बावलियाँ थीं। नदियाँ भी थीं जो अरावली से निकल कर दिल्ली में कई मुक़ामात (जगहों) से गुज़रकर यमुना में मिल जाती थीं। कई मुहल्ले तो आज भी तालाबों के नाम पर ही हैं जैसे हौज़ ख़ास, हौज़ क़ाज़ी, हौज़ रानी वग़ैरा। निज़ाम उद्दीन औलिया की बावड़ी के नाम पर ये मुहल्ला निज़ाम उद्दीन बन गया। आज जहां चाँदनी-चौक है कभी वहां चांदनी नदी बहती थी। लोधी गार्डन में एक पुल है उस के नीचे से कभी नदी गुज़रती थी जो पुराने क़िले की खाई में मिल जाती थी उस का इज़ाफ़ी पानी यमुना में चला जाता था। आज दिल्ली में 70 फ़ीट पर भी अच्छा पानी नहीं है।

ख़बर है कि 13 मार्च को मग़रिबी बंगाल के एन टी पी सी को बंद करना पड़ा। मशीनों को ठंडा रखने वाली फरक़्का फ़ीडर नहर में पानी कम हो गया था। इस से 38 हज़ार ख़ानदानों को बिजली की क़िल्लत से दो-चार होना पड़ा। गंगा में नाव की आवाजाही को भी रोकना पड़ा। वहां कोयले से लदी 13 नावें कम पानी में धँस गई थीं इस से ज़ाहिर होता है कि गंगा भी धीरे धीरे उथली होती जा रही है।

महाराष्ट्र के लातूर समेत कई अज़ला (ज़िले) पानी की शदीद (अत्यधिक) क़िल्लत का सामना कर रहे हैं, कई अस्पतालों में ऑपरेशन बंद कर दिए गए हैं। 6,000 लीटर पानी का जो टैंकर 500 रुपए में मिलता था अब वो हज़ार-बारह सौ रुपए में मिल रहा है। ग़रीब लोगों को कई कई किलोमीटर दूर से पानी लाना पड़ रहा है। शोबा मौसमियात (मौसम विभाग) ने पहले ही बारिश कम होने और सूखे के हालात पैदा होने की बात कही थी, फिर भी सरकार ने इस को संजीदगी से नहीं लिया। मुंबई हाईकोर्ट ने लोक सत्ता आंदोलन की पिटीशन पर सुनवाई के दौरान सरकार से उन हालात पर पूछा था कि आई पी ईल ज़रूरी हैं या अवाम। स्वराज अभियान की पिटीशन पर समाअत (सुनवाई) के दौरान सुप्रीमकोर्ट ने मर्कज़ी हुकूमत (केंद्र सरकार) से जवाब मांगा था कि वो सूखे से निमटने के लिए क्या कर रही है और मनरेगा में काम करने वाले मज़दूरों के पैसे क्यों बाक़ी हैं।

भारत के 36 फ़ीसद बड़े बांध महाराष्ट्र में हैं। यानी 5,174 बाँधों में से 1,845 इस के बावजूद महाराष्ट्र की 5.15 फ़ीसद खेती के लायक़ ज़मीन की ही सिंचाई हो सकी है। पिछली एक दहाई में सींचे गए रकबा में कोई तबदीली नहीं आई है। मौजूदा सरकार सिंचाई घोटाले को मुद्दा बना कर ही इक़तिदार में आई थी। लेकिन ये सरकार भी मर्कज़ से आए पैसे को उन्हीं स्कीमों में लगा रही है जिनसे बड़े ठेकेदारों की लॉबी को ही फ़ायदा हो। लातूर की ख़ुश्कसाली में भी पानी के ठेकेदारों की ही चांदी हुई है ये 5 से 7 लीटर पानी 2 से 3 रुपए में फ़रोख्त़ कर रहे हैं (बेच रहे हैं) एक अंदाज़े के मुताबिक़ हर-रोज़ 50,00,000 रुपए का पानी फ़रोख्त़ हो रहा है। ये उस वक़्त है जब लातूर निगम और रज़ाकार तन्ज़ीमों (स्वयंसेवक संस्थाओं) के 150 टैंकर मुफ़्त पानी तक़सीम कर रहे हैं (बाँट रहे हैं)।

लातूर की ख़ुश्कसाली ने ये बता दिया है कि पानी के बिना ज़िंदगी का तसव्वुर मुम्किन नहीं (जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती)। राजस्थान के जैसलमेर और दूसरे इलाक़ों से सीखने की ज़रूरत है जहां बारिश की बूँदों को तो बहुत इज्जत-ओ-एहतराम के साथ इकट्ठा किया जाता है जो साल भर उनकी प्यास बुझाती हैं। हमें ये सोचना होगा कि तरक़्क़ी चाहिए या पानी। अगर पानी चाहिए तो तरक़्क़ी के बारे में पानी को सामने रखकर ग़ौर करने की ज़रूरत है। पेड़ उगाने, तालाब बनाने होंगे। नदियों को ज़िंदगी देने के लिए सबको मिलकर काम करना होगा। तब ही ये नज़्म गुनगुना सकेंगे। मछली जल की रानी है जीवन उस का पानी है यानी पानी होगा तभी ज़िंदगी बाक़ी रहेगी।


’’مچھلی جل کی رانی ہے جیون اس کا پانی ہے‘‘ یعنی پانی ہوگا تبھی زندگی باقی رہے گی۔

پانی، پانی، پانی کی ہاہاکارہے۔ قومی میڈیا کی گفتگو کا موضوع بناہوا ہے۔ پانی ہے کہ ہاتھ سے پھسل کر آنکھ سے چھلکنے کوبے تاب ہے۔ کہتے ہیں کہ پانی اپنا راستہ خود بنالیتا ہے۔ پتھروں کو پھوڑ کر، پہاڑ کا سینہ چیر کر نکل جاتاہے۔ لیکن اس کا انسان پر کوئی اثر نہیں ہوتا۔ پانی اس کو سیراب تو کرتا ہے مگر اس میںنمی نہیںپیدا کرتا۔انسان کو ہی اس کی ضرورت ہے پھر بھی وہ پانی کو سمجھنا نہیں چاہتا۔ یایوں کہاجائے کہ پانی اس کی عقل پر پڑاہوا ہے۔ تبھی تو وہ پانی کو فراموش کرتا ہے۔ پانی کے دھتکارنے پر وہ بلبلاجاتاہے۔ اس کانظارہ آج کل ملک کے کئی حصوںمیں دیکھنے کو مل رہا ہے۔
تقریباً آدھا ملک قحط، خشک سالی یا پانی کی کمی سے جوجھ رہا ہے۔ اس کی وجہ کیالگاتار دوسال میں ۱۲؍سے ۱۴؍فیصد مانسون میں آئی گراوٹ ہے؟ نہیں۔ ماحول میں پیدا ہورہی لگاتار تبدیلی اور زیرزمین پانی کی سطح میں آئی کمی سے حالات خراب ہوئے ہیں۔ بے لگام صنعت کاری نے آلودگی کو جنم دیا۔ پیڑکٹنے سے جنگلات سکڑگئے۔ندیاں، فیکٹریوں کی گندگی سے زہریلی اور اتھلی ہوگئیں۔ تالاب پاٹ کر بلڈنگیں کھڑی کردی گئیں، سرکاروں کی اندیکھی سے اسے بڑھاوا ملا۔ نتیجہ پانی کا بحران، باڑھ اورسونامی کی شکل میں سامنے آرہا ہے۔پہلے بس اڈے ڈوبتے تھے اب ایئر پورٹ ڈوب رہے ہیں ۔ پچھلے دوسالوںمیں ربیع کی فصل خراب ہونے سے کسانوں کی خودکشی کے واقعات میں اضافہ ہوا ۔ بے وقت اولے، بارش اور تیز ہوائیں بھی نیچر کا توازن بگڑنے کی طرف اشارہ کرتے ہیں۔

وزارت برائے آبی وسائل اور ترقی نے اس بار کے واٹرویک میں پانی کی کمی سے نپٹنے کیلئے اسرائیل کو پارٹنربنایا۔ ساتھ ہی پانی کی قلت سے جوجھ رہی پانچ ریاستوں گجرات، کرناٹک، مہاراشٹر، راجستھان اور تلنگانہ کو سرگرم ساجھیدار۔ اس موقع پر یہ بات بھی سامنے آئی کہ ملک کے۶۰۰؍میں سے۳۰۰؍سے زیادہ اضلاع سوکھے کی زد میں ہیں۔ یہ حالات دھیرے دھیرے کرکے بنے ہیں اور آئندہ اور بدتر ہو جائیںگے۔ اعدادوشمار کے مطابق ۱۹۵۱؍میں ۵۱۷۷؍کیوبک میٹر فی شخص پینے لائق پانی موجود تھاجو ۲۰۱۱؍میں گھٹ کر ۱۱۵۰؍کیوبک میٹر رہ گیا۔ اس میں کچھ دخل موسموں میں آرہی تبدیلی کا بھی ہو سکتا ہے لیکن جو فلم ہم دیکھ رہے ہیں وہ ہماری ہی تیار کردہ ہے۔ زمینی پانی کے استعمال میں جیسی لاپروائی ہم نے پچھلے ۵۰؍رسوںمیں برتی ہے اس کا نتیجہ اس کے سوا کچھ ہوہی نہیں سکتا تھا۔ پانی کو ہوا، روشنی جیسی چیز مان کر زمین کے نیچے سے اس کو اندھا دھند کھینچتے گئے۔ ایسے علاقے جن کے بارے میں کہا جاتا تھا پگ پگ روٹی ڈگ ڈگ نیر ’’ماوا‘‘ بھی سوکھے کی چپیٹ میں ہے۔ ۲۵؍ہزار برسوں میں بنے پانی کے بھنڈار چتر کوٹ جیسے علاقوں کے پانی کو بھی سر ے سے ختم کردیا۔ جہاں ایسانہیں کرپائے وہاں موٹے موٹے پائپوں سے کارخانوں کا کچرا ٹھونس کر انہیں زہر یلابنادیا۔ دراصل پینے لائق صاف پانی کو برباد کرکے ہی بوتل بند پانی کے دھندے کو بڑھاوا دیا گیا ہے۔

پہلے پانی بیچانہیں جاتاتھا کیونکہ پانی کو تالابوں،ندیوں میں سنجونے کی روایت تھی۔ اب پانی ہم خریدنے لگے ہیں اس کا مطلب ہے کہ پانی پیدا نہیں کرتے جمع بھی نہیں کرتے۔ صدر جمہوریہ پرنب مکھرجی نے واٹر ویک (بھارت جل سپتاہ)میں اس بات پر تشویش کااظہار کیا کہ دنیا میں صنعت کاری کی وجہ سے پانی کی کھپت توبڑھی ہے لیکن پانی کا تحفظ نہیںہوپارہا ۔ انہوںنے کہاکہ بھارت میں دنیا کی۱۷؍فیصد آبادی رہتی ہے لیکن پانی کی دستیابی صرف ۴؍فیصد ہے۔ پانی کا تیز رفتاری سے غلط استعمال ہورہا ہے جس کی وجہ سے زمین میں پانی کی سطح میں کمی آرہی ہے۔ انہوںنے پانی کے منصفانہ تقسیم اور مناسب استعمال کی ضرورت پر زور دیا۔ صدر جمہوریہ نے کہا کہ زراعت آب پاشی پر منحصر ہے اور کسان کو مسلسل ترقی کیلئے زمین میں پانی کے ذخائر کی ضرورت ہے۔اس لئے زمین کے اندر پانی کی سطح بڑھانے پر سب کو خصوصی توجہ دینی چاہئے۔

بھارت میں۲۶۳؍ندیاں ہیں۔ جوبھی ندی ایک سے زیادہ صوبوں سے گزرتی ہے وہ ریاستوں میں آپسی اختلاف کا سبب بنتی ہے۔ مثلاً پنجاب ہریانہ کے بیچ ستلج ویاس یمنا، لنک کی لڑائی بہت پرانی ہے۔ مسئلہ عدالت میں ہے۔ دہلی ہریانہ کے بیچ یمنا کو لے کر کہا سنی ہوتی رہتی ہے۔ دہلی کو۲۱۵؍ایم جی ڈی پانی یمنا سے اور۲۴۰؍ایم جی ڈی گنگا سے ملتا ہے۔ کاویری کولے کر کرناٹک اور تمل ناڈو میں روز ہنگامہ ہوتا ہے۔ وجہ صاف ہے ایک طرف آبادی اور نیچائی کے علاقوں میں بڑھوتری ہورہی ہے، دوسری طرف ندیوں میں پانی کی کمی۔ پانی کے بٹوارے کو لے کر توریاستیں برسر پیکار رہتی ہیں لیکن ندی کی حالت کو سدھارنے کی ذمہ داری نہیں نبھاتیں۔

کہا جاتاہے کہ اگستیہ منی نے پورا سمندر پی لیاتھا۔ ہم بھی کچھ کم نہیں ہیں الگ الگ ریاستوں کے لوگ الگ الگ ندیوں کو پی چکے ہیں۔ دہلی کی بات کی جائے تو دہلی والے یمنا کے بعد گنگا کا بڑا حصہ پی چکے ہیں اب بھاگیرتھی کا پانی پی رہے ہیں۔ ریڑو کا جی سے پانی لانے کی بات چل رہی ہے یہ دہلی والوں کیلئے آخری ذریعہ ہوگا۔ سوال یہ ہے کہ کیا دہلی کی حالت شروع سے ایسی ہے یا دہلی والوںنے خود تباہی مول لی ہے۔ دستاویزوں سے معلوم ہوتا ہے کہ دہلی میں ۸۰۰؍تالاب اور کئی باوڑیاں تھیں۔ ندیاں بھی تھیں جو اراولی سے نکل کر دہلی میں کئی مقامات سے گزرکر یمنا میں مل جاتی تھیں۔ کئی محلے تو آج بھی تالابوں کے نام پر ہی ہیں جیسے حوض خاص، حوض قاضی، حوض رانی وغیرہ۔ نظام الدین اولیا کی باوڑی کے نام پر یہ محلہ نظام الدین بن گیا۔ آج جہاں چاندنی چوک ہے کبھی وہاں چاندنی ندی بہتی تھی۔ لودھی گارڈن میں ایک پل ہے اس کے نیچے سے کبھی ندی گزرتی تھی جو پرانے قلعہ کی کھائی میں مل جاتی تھی اس کا اضافی پانی یمنا میں چلا جاتا تھا۔ آج دہلی میں ۷۰؍فٹ پر بھی اچھا پانی نہیں ہے۔

خبر ہے کہ ۱۳؍مارچ کو مغربی بنگال کے این ٹی پی سی کو بند کرناپڑا۔ مشینوں کو ٹھنڈا رکھنے والی فرککا فیڈر نہر میں پانی کم ہوگیاتھا۔ اس سے۳۸؍ہزار خاندانوں کو بجلی کی قلت سے دوچار ہونا پڑا۔ گنگا میں نائو کی آواجاہی کو بھی روکنا پڑا۔ وہاںکوئلے سے لدی۱۳؍ناویں کم پانی میں دھنس گئی تھیں اس سے ظاہر ہوتا ہے کہ گنگا بھی دھیرے دھیرے اتھلی ہوتی جارہی ہے۔
مہاراشٹر کے لاتور سمیت کئی اضلاع پانی کی شدید قلت کا سامنا کررہے ہیں، کئی اسپتالوں میںآپریشن بند کردئے گئے ہیں۔۶۰۰۰؍لیٹر پانی کا جو ٹینکر۵۰۰؍روپے میں ملتا تھا اب وہ ہزار بارہ سو روپے میں مل رہا ہے۔ غریب لوگوں کو کئی کئی کلو میٹر دور سے پانی لانا پڑرہا ہے۔ شعبہ موسمیات نے پہلے ہی بارش کم ہونے اور سوکھے کے حالات پیدا ہونے کی بات کہی تھی پھر بھی سرکارنے اس کو سنجیدگی سے نہیں لیا۔ ممبئی ہائی کورٹ نے لوک ستاآندولن کی پٹیشن پر سنوائی کے دوران سرکار سے ان حالات پر پوچھا تھا کہ آئی پی ایل ضروری ہیں یا عوام۔ سوراج ابھیان کی پٹیشن پر سماعت کے دوران سپریم کورٹ نے مرکزی حکومت سے جواب مانگا تھا کہ وہ سوکھے سے نمٹنے کیلئے کیا کررہی ہے اور من ریگا میں کام کرنے والے مزدوروں کے پیسے کیوںباقی ہیں۔

بھارت کے ۳۶؍فیصد بڑے باندھ مہاراشٹر میں ہیں۔ یعنی ۵۱۷۴؍باندھوں میں سے ۱۸۴۵؍اس کے باوجودمہاراشٹر کی ۵ء۱۵؍فیصد کھیتی کے لائق زمین کی ہی سینچائی ہوسکی ہے۔ پچھلی ایک دہائی میں سینچے گئے رقبہ میںکوئی تبدیلی نہیں آئی ہے۔ موجودہ سرکار سینچائی گھوٹالے کو مدعا بناکرہی اقتدار میں آئی تھی۔ لیکن یہ سرکار بھی مرکز سے آ ئے پیسے کو انہیں اسکیموںمیں لگارہی ہے جن سے بڑے ٹھیکیداروںکی لابی کو ہی فائدہ ہو۔ لاتور کی خشک سالی میں بھی پانی کے ٹھیکیداروں کی ہی چاندی ہوئی ہے یہ پانچ سے سات لیٹر پانی دو سے تین روپے میں فروخت کررہے ہیں ایک اندازے کے مطابق ہر روز پچاس لاکھ روپے کا پانی فروخت ہورہا ہے۔ یہ اس وقت ہے جب لاتور نگم اور رضاکار تنظیموں کے ڈیڑھ سو ٹینکر مفت پانی تقسیم کررہے ہیں۔

لاتور کی خشک سالی نے یہ بتادیا ہے کہ پانی کے بنا زندگی کا تصور ممکن نہیں۔ راجستھان کے جیسلمیر اور دوسرے علاقوں سے سیکھنے کی ضرورت ہے جہاں بارش کی بوندوںکو تو بہت عزت واحترام کے ساتھ اکٹھا کیاجاتاہے جو سال بھر ان کی پیاس بجھاتی ہیں۔ ہمیں یہ سوچنا ہوگاکہ ترقی چاہئے یا پانی۔ اگر پانی چاہئے تو ترقی کے بارے میں پانی کو سامنے رکھ کر غورکرنے کی ضرورت ہے ۔ پیڑ اگانے، تالاب بنانے ہوںگے۔ ندیوں کو زندگی دینے کیلئے سب کو مل کر کام کرنا ہوگا۔ تب ہی یہ نظم گنگنا سکیںگے۔ ’’مچھلی جل کی رانی ہے جیون اس کا پانی ہے‘‘ یعنی پانی ہوگا تبھی زندگی باقی رہے گی۔

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Muzaffar Husain Ghazali
Muzaffar Husain Ghazali
Lawyer by training, associate editor at Daily Urdu Net and editor at UNN India

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