असम में बांग्लादेशी घुसपैठ का मुद्दा एक बार फिर से राज्य में भावनात्मक लहर पैदा करता दिखाई दे रहा है। मूलतः ब्रह्मपुत्र और बराक घाटियों में बंटे राज्य में केंद्र सरकार के “नागरिकता संशोधन विधेयक-2016” को लेकर संग्राम छिड़ा हुआ है। इस विधेयक का जहां ब्रह्मपुत्र घाटी में बड़े पैमाने पर विरोध हो रहा है, वहीं बराक घाटी में स्थानीय जनता पूरी तरह से समर्थन में लामबंद दिखाई दे रही है। केंद्र सरकार ने इस विधेयक के जरिए देश के विभिन्न हिस्सों में शरणार्थीके रूप में रह रहे गैर मुस्लिम नागरिकों को भारत की नागरिकता देने की कानूनी औपचारिकताएं पूरी करने की तैयारी की है। पड़ोसी देश अफगानिस्तान,पाकिस्तान और बांग्लादेश से आर्थिक और धार्मिक आधार पर प्रताड़ित होकर हिंदू, क्रिस्चियन, बौद्ध, जैन, पंजाबी, सिंधी आदि धर्मों के लोग भारत में लंबे समय से शरण लिए हुए हैं।

संसद में विधेयक के पेश होने के बाद विधेयक को संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) का गठन कर इसकी खामियों को दूर करने के लिए सौंप दिया गया था। विधेयक को लेकर असम में भारी विरोध हो रहा है। वहीं कुछ संगठन इसके समर्थन में भी दिखाई दे रहे हैं। पिछले दिनों नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर राज्यवासियों का मन टटोलने के लिए असम व मेघालय के दौरे पर जेपीसी के अध्यक्ष राजेंद्र अग्रवाल की अगुवाई में 16 सदस्यीय टीम गुवाहाटी पहुंची थी। समिति में असम से चार सांसद- भुवनेश्वर कलिता (कांग्रेस), सुस्मिता देव (कांग्रेस), रमेन डेका (भाजपा) और कामाख्या प्रसाद तासा (भाजपा) शामिल हैं। समिति के सदस्यों के गुवाहाटी पहुंचने से पहले ही असम में एक माहौल तैयार कर इसका विरोध प्रदर्शन शुरू किया गया। राजधानी गुवाहाटी में जेपीसी के सामने सुनवाई के लिए ब्रह्मपुत्र घाटी के राजनीतिक पार्टियों समेत कुल 127 संगठनों ने जेपीसी के सामने विधेयक का विरोध करते हुए अपना ज्ञापन सौंपा। वहीं बराक घाटी के सिलचर शहर में जेपीसी के सामने 329 से अधिक संगठनों ने समर्थन में ज्ञापन सौंपा। विवादास्पद कानून आईएमडीटी को सुप्रीम कोर्ट के जरिए समाप्त कराने में महती भूमिका निभाने वाले मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल को जातीय नायक के रूप में जाना जाता है। लेकिन विधेयक को लेकर मुख्यमंत्री पर असमिया समाज के साथ खड़ा नहीं होने के आरोप लग रहे हैं। इन आरोपों से आहत मुख्यमंत्री ने कहा है कि असम और असमिया के हितों से बढ़कर मेरे लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी नहीं है।

उन्होंने भरोसा दिया कि असमिया समाज के हितों के साथ मैं कभी भी समझौता नहीं करूंगा। भाजपा के कई शीर्ष नेता विधेयक के समर्थन में यह दलील दे रहे हैं कि असमिया समाज को हिंदुओं से खतरा नहीं है, असमिया संस्कृति, इतिहास को खतरा बांग्लादेश से घुसपैठ कर आए बांग्लादेशी मुसलमानों से है। विधेयक का विरोध करने वालों का तर्क है कि केंद्र सरकार इस विधेयक को कानून का रूप देकर असम में बड़े पैमाने पर हिंदू बांग्लादेशियों को बसाना चाहती है। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि राज्य में हिंदू बांग्लादेशियों की तादाद बढ़ गई तो असमिया संस्कृति, भाषा, इतिहास पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। उल्लेखनीय है कि अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों को भगाने के लिए असम छात्र संघ (आसू) के नेतृत्व में 80 के दशक में 5 साल तक चले लंबे आंदोलन के बाद केंद्र, राज्य सरकार और आसू के बीच 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की मौजूदगी में असम समझौता हुआ था।

जिसमें यह साफ तौर पर उल्लेख किया गया था कि 24 मार्च, 1971 के बाद राज्य में आए किसी भी धर्म के लोगों को रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी। हालांकि इस समझौते को हुए चार दशक से अधिक का समय बीत जाने के बाद भी यह क्रियान्वित नहीं हुआ। वर्तमान दौर में इस समझौते की प्रासंगिकता को लेकर भी उंगलियां उठने लगी हैं। असम आंदोलन का नेतृत्व करने वाले संगठन आसू और आंदोलन की गोद से पैदा हुई असम गण परिषद (अगप) हर हालत में असम समझौते को लागू कराने को लेकर अड़ी हुई हैं। यह अलग बात है कि अगप दो बार असम की सत्ता में रहने के बावजूद असम समझौते को क्रियान्वित कराने में विफल रही। आसू राज्य भर में अपनी सक्रियता दिखाते हुए लोगों को एकजुट करने के लिए इसे असमिया समाज के अस्तित्व के साथ जोड़ दिया है। असम में राजनीतिक रूप से वामपंथ की कोई पहचान नहीं है। बावजूद विधेयक के जरिए ब्रह्मपुत्र घाटी में लोगों को लामबंद करने में जुटी हुई है। वामपंथ के पैरोकार व किसानों के नामपर आंदोलनों की राजनीति करने वाली कृषक मुक्ति संग्राम समिति के नेता अखिल गोगोई गैर राजनीतिक संगठनों को एकजुट कर लोगों की भावनाओं को भड़काने में जुटे हुए हैं। अखिल ने दावा किया है कि भाजपा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ राज्य में डेढ़ करोड़ बांग्लादेशियों को बसाने की फिराक में है। अगर भाजपा इसमें सफल होती है तो असमिया लोगों का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा। अखिल इसके लिए त्रिपुरा का उदाहरण देते हैं। हालांकि अखिल के आंकड़ों के पीछे कोई तर्क नहीं है। विधेयक के विरोध में भाजपानीत गठबंधन सरकार में शामिल क्षेत्रीयतावाद की पैरोकार अगप भी खड़ी है।

अगप ने राज्यव्यापी (ब्रह्मपुत्र घाटी) में विधेयक के विरोध में हस्ताक्षर अभियान छेड़ा हुआ है। ब्रह्मपुत्र घाटी में काफी संख्या में संगठन विधेयक के विरोध में आंदोलन कर रहे हैं। इस मुद्दे पर कांग्रेस की सबसे बुरी हालत है। ब्रह्मपुत्र घाटी में जहां कांग्रेस विधेयक का विरोध कर रही है, वहीं बराक घाटी के कांग्रेसी नेता इसके समर्थन में आवाज उठा रहे हैं। जिसके चलते कांग्रेस पर दोहरी भूमिका निभाने का आरोप लग रहा है। मुस्लिमों की रहनुमाई करने वाली ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट(एआईयूडीएफ) भी मुखर होकर इसका विरोध कर रही है। वहीं राज्य के मुसलमान भी कांग्रेस वाली स्थिति अपनाए हुए हैं। बराक घाटी के मुसलमान जहां समर्थन कर रहे हैं, वहीं ब्रह्मपुत्र घाटी में इसका विरोध कर रहे हैं। सत्ताधारी पार्टी भाजपा ने विधानसभा चुनाव में यह आश्वासन दिया था कि सत्ता में आने पर बांग्लादेश से धार्मिक और आर्थिक रुप से प्रताड़ित होकर भारत में शरण लेने आए नागरिकों के मुद्दे पर काम करेगी। भाजपा आज भी अपने उस बयान पर कायम दिखाई देती है। यही कारण है कि राज्य में भाजपा को इस विधेयक के जरिए विपक्षी पार्टियां घेरने में जुटी हुई हैं।

हिन्दुस्थान समाचार/अरविंद कुमार राय

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