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प्याज़ के आँसू न रोएँ — महंगाई से किसान, उपभोक्ता दोनों को फ़ायदा

जिस अल्प मुद्रास्फीति की वजह से लोग सरकार से बहुत खुश थे, उसी 1.38 प्रतिशत की खाद्यान्न मुद्रास्फीति के कारण किसानों को अपने पैदावार के लिए समुचित मूल्य नहीं मिल रहे थे

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नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा किए गए कई उपायों के बावजूद प्याज़ का भाव उपभोक्ताओं को सता रहा है। सितंबर के अंत से सालाना लगभग $ 500 करोड़ के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। व्यापार पर भण्डारण की सीमाएं बाँध दी गई हैं, जैसे थोक व्यापारी 25 टन और खुदरा विक्रेता 5 टन से अधिक नहीं रख सकते। राज्य के स्वामित्व वाली MMTC लिमिटेड ने एक लाख टन आयात करने का आदेश दिया है और निर्यात के नियमों में ढील दी गई है, जैसे कीट और बीमारी के ख़िलाफ़ धूमन की पाबंदी पर छूट है। आयकर विभाग व्यापारियों द्वारा बेहिसाब प्याज़ स्टॉक किए जाने की आशंका में देशव्यापी छापेमारी कर रहा है। फिर भी पिछले दो महीनों में खुदरा प्याज़ की क़ीमतें दोगुने से 100 रुपये प्रति किलोग्राम के स्तर तक पहुँच गई हैं। अतः यह स्पष्ट है कि वर्तमान कीमतों के लिए जमाख़ोरी ज़िम्मेदार नहीं है, समस्या उत्पादन की है।

इस बार ख़रीफ़ प्याज की बुवाई जुलाई के अंत तक कम मॉनसून वर्षा से प्रभावित थी। यहां तक ​​कि जो फ़सल लगाई गई थी, उसे सितंबर से नवंबर तक की अतिरिक्त बारिश से नुक़सान हुआ। नतीजतन कुल ख़रीफ़ और देर-ख़रीफ़ प्याज़ का उत्पादन आधिकारिक तौर पर लगभग 18 लाख टन या 26 प्रतिशत कम हुआ। वास्तविक गिरावट और अधिक हो सकती है।

लेकिन इसका असर सिर्फ़ प्याज़ पर नहीं पड़ा। इस वर्ष के शुरुआती मौसम के सूखे और कटाई के समय लंबे समय तक बेमौसम बारिश के असामान्य संयोग के कारण तमाम ख़रीफ़ फ़सलों पर भारी असर पड़ा है। फिर भी दलहन, सोयाबीन और मक्का पिछले साल की तुलना में काफ़ी अधिक कारोबार कर रहे हैं। दूध की क़ीमत बढ़ गई है, यहां तक ​​कि डेयरी फ़ार्म भी दूध कम ख़रीद रहे हैं। हालांकि गाय, भैंस, बकरी, ऊँट इत्यादि स्तनपायी जानवर आमतौर पर अक्टूबर के बाद अधिक उत्पादन करते हैं, अतिरिक्त मानसून से भी बाज़ार बाधित हुआ है। साथ ही इसके संरचनात्मक कारण भी हो सकते हैं।

पिछले तीन-चार वर्षों में डेयरी व्यापार में मंदी ने किसानों को मवेशियों, विशेष रूप से बछड़ों और गर्भवती व स्तनपान कराने वाली मादाओं, की संख्या कम करने के लिए मजबूर किया है। इसके प्रभाव अब दिख रहे हैं जब स्किम्ड मिल्क पाउडर की दर एक साल पहले के रु० 140-150 से बढ़कर रु० 300 प्रति किलोग्राम पार कर गई है। शहरी नागरिकों को यह अहसास करवाना ज़रूरी है कि जिस अल्प मुद्रास्फीति की वजह से वे सरकार से बहुत खुश थे, उसी 1.38 प्रतिशत की खाद्यान्न मुद्रास्फीति के कारण किसानों को अपने अनाज व अन्य पैदावार के लिए समुचित मूल्य नहीं मिल रहे थे। उन्हें यह समझना होगा कि सितंबर 2016 से अगस्त 2019 तक की साल-दर-साल औसतन असामान्य रूप से कम मुद्रास्फीति की अवधि समाप्त हो गई है।

ज़रूरी नहीं कि यह बुरी ख़बर है। यदि उत्पादकों का विनिवेश किया जाए तो अस्वाभाविक रूप से कम मुद्रास्फीति टिकाऊ या उपभोक्ता हित में नहीं है। मौसम की दुर्दशा या प्याज़ के मूल्य को संभालने के लिए विशिष्ट कारकों में दी गई छूट के बावजूद वर्तमान मूल्यवृद्धि को हमारी अर्थव्यवस्था में एक सुधार के रूप में देखा जाना चाहिए। विगत पच्चीस वर्षों में सर्वश्रेष्ठ मानसून की बारिश के साथ संयुक्त रूप से सभी प्रमुख जलाशयों और पर्याप्त रूप से रिचार्ज किए गए भूजल तालिकाओं के साथ मूल्य वसूली चल रहे रबी वृक्षारोपण को बढ़ावा देगी। यही कारण है कि आने वाली ज़बरदस्त फ़सल किसी भी ख़रीफ़ की कमी की क्षतिपूर्ति तो करेगा ही बल्कि किसानों और उपभोक्ताओं के लिए लाभदायक भी होगा। ग्रामीण आय बढ़े, अर्थव्यवस्था के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता है। अस्थायी कमी के कारण मूल्यों में वृद्धि पर रोक लगाने के लिए जल्दबाज़ी की नीति अपनाना उचित नहीं। नरेन्द्र मोदी सरकार को उन समस्याओं पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो प्याज़ से कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण हैं।

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