Saturday 21 May 2022
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उड़ीसा का पूजा गांव — स्वच्छता की मिसाल

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[dropcap]उ[/dropcap]ड़ीसा के जगतसिंहपुर ज़िले का पूजा गांव पूरे मुल्क के लिए मिसाल बन गया है। इस गांव के लोगों ने वसीअ (बड़ी) मुहिम चला कर हर घर में बैत उल-ख़ला (शौचालय) बनाने में कामयाबी हासिल की है। गांव के लोगों ने स्मार्ट फ़ोन से टॉयलेट की तस्वीर सरकार की वेबसाइट पर भेजी। वाज़िह (ध्यान) रहे कि मर्कज़ की स्कीम के तहत 12 हज़ार रुपए टॉयलेट बनाने के लिए दिए जाते हैं, ये मिसाल तब क़ायम हुई जब उड़ीसा के देही (गाँव के) इलाक़ों में सैनिटेशन की हालत ख़स्ता है। आज भी क़रीब 88 फ़ीसद देही घरों में बैत उल-खुला नहीं है।

IMG_20160323_120900ज़िला हेडक्वार्टर से 12 कि०मी० दूर पूजा गांव में 74 ख़ानदान (परिवार) रहते हैं, कुछ वक़्त पहले तक यहां पक्के बैत उल-खुला नहीं थे। ज़्यादातर लोग खुले में रफ़ा हाजत को जाते थे (शौच करते थे)। झाड़खंड की तरह उड़ीसा में भी बैत उल-खुला का इस्तेमाल बहुत कम लोग करते हैं। खुले में रफ़ा हाजत यहां का मामूल का अमल (आम दिनचर्या) है। उसे समाज में बुरा भी नहीं समझा जाता था। आदिवासी इलाक़े में तो 90 फ़ीसद लोग खुले में रफ़ा हाजत करते हैं। उनकी सोच को बदलना आसान नहीं था। उड़ीसा में 1993-2011 में टॉयलेट कवरेज 1.4 से 14 फ़ीसद हुआ यानी 1.26 फ़ीसद सालाना। “स्वच्छ भारत” मुहिम के तहत गांव के सरपंच देवी प्रसाद महरना की अगुवाई में सभी घरों में टॉयलेट बनाने की मुहिम शुरू हुई, लोगों ने खुले में रफ़ा हाजत के नुक़्सानात को समझा और इस मुहिम का हिस्सा बने। रियासत से लेकर मर्कज़ तक इस कोशिश को सराहा गया।

1PC_8310पूजा गांव को खुले में रफ़ा हाजत के मसले से नजात (मुक्ति) दिलाने के बारे में सरपंच देवी प्रसाद का कहना था कि इस के लिए गांव में 40 मीटिंगें करनी पडीं। एक टॉयलेट को बनाने में 22 हज़ार रुपए का ख़र्च आया। इसमें से 12 हज़ार रूपए सरकार की सब्सीडी टॉयलेट की तस्वीर सरकार की वेबसाइट पर भेजने के बाद मिलनी थी। यहां 7-8 घर ऐसे थे जिन्होंने कहा कि हमारे पास पैसे नहीं हैं हम टॉयलेट नहीं बना सकते; उनका ब्रेन वाश करने में वक़्त लगा। गांव के लोगों ने सरपंच की निगरानी में कमेटी बनाई। कमेटी ने ये तय किया कि जो कोई भी टॉयलेट नहीं बना पाएगा कमेटी उस का बैत उल-ख़ला बनवा देगी और थोड़ा-थोड़ा करके कमेटी अपना पैसा वापिस ले लेगी। लेकिन इस की नौबत नहीं आई; सबने पैसों का इंतज़ाम करके टॉयलेट बनवा लिया। गांव के सबसे बुज़ुर्ग शख़्स दुर्योधन प्रधान का कहना था कि हम पीढ़ियों से खुले में रफ़ा हाजत कर रहे थे। लेकिन अब उनके दोनों बेटों के घरों में बैत उल-खुला है। लोगों की सोच बदल रही है। लोग अपने हुक़ूक़ के तईं बेदार (जागरूक) हुए हैं। दुर्योधन प्रधान के बेटे अशोक प्रधान ने बताया कि मेरी माँ और बीवी बाहर जाते थे; कई बार लोग इधर आते तो उन्हें उठना पड़ता। बाद में हमें मालूम हुआ कि इससे उन्हें कई तरह की बीमारियों का ख़तरा था।

IMG_20160323_110224सरीन राउ जो इसी गांव के रहने वाले हैं उन्होंने गांधियन स्टडीज़ में पोस्ट ग्रैजूएशन किया था और गांधीजी के पी ए महादेव देसाई के कॉलेज स्कूल आफ़ टोटल रेवलूशन गुजरात में पढ़ाते थे। अब पूजा गांव में रह कर खेती करते हैं। उन्होंने वो जगह दिखाई जहां गांव के लोग रफ़ा हाजत के लिए जाया करते थे। अब वहां पेड़ लगा कर स्मृति पार्क बनाया गया है। मर्दों के साथ औरतें भी इस मुहिम में बढ़ चढ़ कर हिस्सा ले रही हैं, इस मुहिम को कामयाब बनाने के लिए निगरानी कमेटी बनाई गई। सैनिटेशन मोटीवेटर नरवद बहरा ने बताया कि पहले लोगों को बेदार किया गया बाद में जुर्माना लगाने का इंतज़ाम, लेकिन किसी पर भी जुर्माना नहीं हुआ सबने इस काम में साथ दिया। उन्होंने बताया कि लोगों को जागरूक करने के लिए कई तरह की तकनीक का इस्तेमाल किया गया। जैसे रंगों से ज़मीन पर गांव का नक़्शा बना कर इस में घर, सड़क, खेत, पेड़ और मैदान दिखाते हैं फिर जगह जगह मिट्टी के छोटे छोटे ढेर बना देते हैं और बताते हैं कि इन्सान जो फुज़ला ख़ारिज (शौच) करता है वो इसी तरह जा-ब-जा (जगह-जगह) फैल कर गांव की पूरी ख़ूबसूरती बर्बाद कर देता है। इसी तरह गिलास में साफ़ पानी लिया जाता है और कहा जाता है कि इस पानी को हम सब पी सकते हैं। फिर बाल पाख़ाने में लगा कर इस पानी में घोल देते हैं फिर पूछते हैं कि क्या इस पानी को कोई पी सकता है? सब मना करते हैं हम बताते हैं कि मक्खियों के पैर उन्हीं बालों की तरह होते हैं वो गंदगी पर बैठती हैं फिर हमारे खाने या पानी पर। इस तरह गंदगी हमारे अंदर चली जाती है और वो बीमारी पैदा करती है। खुले में पड़े पाख़ाने से मक्खीयों के ज़रीए बीमारी फैलने का सबसे ज़्यादा ख़तरा होता है। उन्होंने कहा कि अब धीर धीरे लोग समझ रहे हैं और टॉयलेट बनाने-ओ-इस्तेमाल करने को तैयार हो जाते हैं।

1PC_8357गांव की निगरानी कमेटी सेल्फ हेल्प् ग्रुप के तौर पर काम करती है। वो ये देखती है कि गांव में साफ़ सफ़ाई ठीक तरह से हो रही है या नहीं। वो गांव के विकास में भी हाथ बटाती है। गांव के दाख़िला पर एक छोटा सा मंदिर बनाया गया है उसे गरामोदेवती कहते हैं यानी गांव देवता या रखवाला। इस से थोड़ी दूर पर कूड़ेदान रखा गया था। इस पर लिखा था कूड़े की जगह गांव के बाहर है। गांव के रास्ते बहुत साफ़ सुथरे थे। कच्चे पक्के मकानों की दीवार पर उड़िया ज़बान में स्लोगन लिखे हुए थे जिनका मतलब मिलकर रहना, साफ़ रखना, बुरा ना सोचना, सब का ख़्याल रखना वग़ैरा बताया गया। ये भी मालूम हुआ कि सरपंच का नारा है “स्वच्छता से एकता, एकता से इक़तिसादी (आर्थिक) तरक़्क़ी” सरपंच देवी प्रसाद से इस बारे में पूछने पर पता चला कि साफ़ सफ़ाई रहेगी तो बीमारी नहीं आएगी इस से दवा, डाक्टर पर ख़र्च होने वाले पैसे बचेंगे। दूसरे काम का नागा नहीं होगा इस से आमदनी में इज़ाफ़ा होगा (वृद्धि होगी)। माह में दो दिन सफ़ाई के लिए रखे जाते हैं जिसमें नाली सड़क जंगल झाड़ी सबको साफ़ किया जाता है। जब से ये सिलसिला शुरू किया है तब से मच्छर भी नहीं लगते। उन्होंने ये भी बताया कि इस गांव में पिछले पचास सालों से कोई ऐसा झगड़ा नहीं हुआ जिसके लिए पुलिस या अदालत के पास जाना पड़ा हो। उन्होंने एक गीत गा कर सुनाया जिसका मतलब था कि अगर कोई झगड़ा होगा तो हम आपस में मिलकर सुलझा लेंगे, हम मिल-जुल कर रहेंगे।

IMG_20160323_103226यक्म (1 या एक) अप्रैल 2015 को पूजा गांव राज्य का पहला ओडीएफ़ (open defecation free) यानी खुले में रफ़ा हाजत से नजात पाने वाला गांव बना, यक्म अप्रैल 1936 को उड़ीसा रियासत बनी थी। उस दिन उड़ीसा दिवस मनाया जाता है पूजा गांव में जनवरी 2015 में पक्के टॉयलेट बनाने की मुहिम शुरू हुई थी जो यक्म अप्रैल को मुकम्मल (पूरी) हुई यानी महज़ तीन माह में ये गांव ओडीएफ़ बन गया। ख़वातीन ने इस में बहुत अहम रोल अदा किया। निगरानी कमेटी की मैंबर शकुन्तला नाविक कहती हैं कि हमें नहीं मालूम था कि हमने कोई इतना बड़ा काम किया है। जैसे दिल्ली से लोग देखने आएं। उन्होंने इस गांव को मॉडल गांव बनाने की उम्मीद ज़ाहिर की। जहां हर शख़्स पढ़ा लिखा हो। कोई बेकार न हो सब के पास काम हो। हर घर में पीने का साफ़ पानी और बिजली हो।

1PC_8395सरकार के स्वच्छ भारत मिशन के साथ यूनीसेफ़ तआवुन (सहयोग) कर रहा है। उड़ीसा सरकार ने 2015 में रियासत के 532 गांव और 42 ग्राम पंचायतों को बनाने का ऐलान किया था। उनमें से 325 गांव और 12 ग्राम पंचायतों में यूनीसेफ़ की मदद से काम हो रहा है। 2012 के MDWS (Ministry of Drinking Water & Sanitation) डाटा के मुताबिक़ 79, 81, 980 हाऊसहोल्डस में टॉयलेट नहीं थे। 2015 के आदाद-ओ-शुमार (सर्वेक्षण) के मुताबिक़ सूरत-ए-हाल में 8.9 फ़ीसद टॉयलेट के इज़ाफ़ा के साथ तबदीली (बदलाव) रिकार्ड की गई जो पहले 1.26 फ़ीसद थी। इस इज़ाफ़े में सैनीटेशन मोटिवेटर्स की मेहनत शामिल है। 250 ख़ानदानों पर एक मोटिवेटर मुक़र्रर है। उसे हर टॉयलेट के बनने पर 150 रूपए इंसेंटिव तीन क़िस्तों में मिलता है। सरकार का 2019 तक पूरी रियासत को खुले में रफ़ा हाजत (ODF) से नजात दिलाने का मन्सूबा है। इस के लिए 17, 78, 624 टॉयलेट सालाना 1, 48, 219 माहाना 4941 हर दिन, 206 टॉयलेट हर घंटे और चार हर मिनट में बनाने होंगे। जो मुम्किन तो नहीं लगता लेकिन उम्मीद बाक़ी है। उसी सिलसिले में यूनीसेफ़ की रीजनल डायरेक्टर क्रेन हलशोफ़ ने रियासत का दौरा किया और वज़ीर-ए-आला नवीन पटनायक से मुलाक़ात की।



اڑیسہ کے جگت سنگھ پور ضلع کا پوجا گاؤں پورے ملک کیلئے مثال بن گیا ہے ،اس گاؤں کے لوگوں نے وسیع مہم چلا کر ہر گھرمیں بیت الخلاء بنانے میں کامیابی حاصل کی ہے ۔گاؤں کے لوگوں نے اسمارٹ فون سے ٹوائلیٹ کی تصویر سرکار کی ویب سائٹ پر بھیجی ۔واضح رہے کہ مرکز کی اسکیم کے تحت 12ہزار روپے ٹوائلیٹ بنانے کیلئے دےئے جاتے ہیں ،یہ مثال تب قائم ہوئی جب اڑیسہ کے دیہی علاقوں میں سینی ٹینشن کی حالت خستہ ہے ۔آج بھی قریب 88فیصد دیہی گھروں میں بیت الخلاء نہیں ہے ۔


ضلع ہیڈ کواٹر سے 12کلو میٹر دور پوجا گاؤں میں 74خاندان رہتے ہیں ،کچھ وقت پہلے تک یہاں پکے بیت الخلاء نہیں تھے ۔زیادہ تر لوگ کھلے میں رفع حاجت کو جاتے تھے ۔جھاڑکھنڈ کی طرح اڑیسہ میں بھی بیت الخلاء کا استعمال بہت کم لوگ کرتے ہیں ۔کھلے میں رفع حاجت یہاں کا معمول کاعمل ہے۔اسے سماج میں برا بھی نہیں سمجھا جاتا تھا ۔آد ی واسی علاقے میں تو90فیصد لوگ کھلے میں رفع حاجت کرتے ہیں ۔ان کی سوچ کو بدلنا آسان نہیں تھا۔اڑیسہ میں 1993 ۔2011میں ٹوائیلیٹ کوریج 1.4سے 14فیصد ہوا یعنی1.26فیصد سالانہ ۔سوچھ بھارت مہم کے تحت گاؤں کے سرپنچ دیوی پرسادمہرنہ کی اگوائی میں سبھی گھروں میں ٹوائلیٹ بنانے کی مہم شروع ہوئی ،لوگوں نے کھلے میں رفع حاجت کے نقصانات کو سمجھا اور اس مہم کا حصہ بنے۔ریاست سے لے کر مرکز تک اس کوشش کو سراہا گیا۔


پوجا گاؤں کو کھلے میں رفع حاجت کے مسئلے سے نجات دلانے کے بارے میں سرپنچ دیوی پرساد کا کہنا تھا کہ اس کیلئے گاؤں میں 40میٹنگیں کرنی پڑیں۔ایک ٹوائلیٹ کو بنانے میں 22ہزار روپے کا خرچ آیا۔اس میں سے 12ہزار روپئے سرکار کی سبسیڈی ٹوائیلیٹ کی تصویر سرکار کی ویب سائٹ پر بھجنے کے بعد ملنی تھی ۔یہاں سات آٹھ گھر ایسے تھے جنہوں نے کہا کہ ہمارے پاس پیسے نہیں ہیں ہم ٹوائلیٹ نہیں بنا سکتے ان کا برین واش کرنے میں وقت لگا ۔گاؤں کے لوگوں نے سرپنچ کی نگرانی میں کمیٹی بنائی ۔کمیٹی نے یہ طے کیا کہ جو کوئی بھی ٹوائلیٹ نہیں بنا پائے گا کمیٹی اس کا بیت الخلاء بنوا دے گی اور تھوڑا تھوڑا کرکے کمیٹی اپنا پیسہ واپس لے لیگی ۔لیکن اس کی نوبت نہیں آئی سب نے پیسوں کاانتظام کرکے ٹوائلیٹ بنوا لیا ۔گاؤں کے سب سے بزرگ شخص در یودھن پردھان کا کہنا تھا کہ ہم پیڑھیوں سے کھلے میں رفع حاجت کر رہے تھے ۔لیکن اب ان کے دونوں بیٹوں کے گھروں میں بیت الخلاء ہے ۔لوگوں کی سوچ بد ل رہی ہے ۔لوگ اپنے حقوق کے تئیں بیدار ہوئے ہیں ۔دریودھن پردھان کے بیٹے اشوک پردھان نے بتایا کہ میری ماں اور بیوی باہر جاتے تھے کئی بار لوگ ادھر آتے تو انہیں اٹھنا پڑتا ۔بعد میں ہمیں معلوم ہوا کہ اس سے انہیں کئی طرح کی بیماریوں کا خطرہ تھا۔


سرین راؤ جو اسی گاؤں کے رہنے والے ہیں انہوں نے گاندھین اسٹڈیز میں پوسٹ گریجویشن کیا تھا ا ور گاندھی جی کے پی اے مہا دیو دیسائی کے کالج اسکول آف ٹو ٹل ریولوشن گجرات میں پڑھاتے تھے۔اب پوجا گاؤں میں رہ کر کھیتی کرتے ہیں ۔انہوں نے وہ جگہ دکھائی جہاں گاؤں کے لوگ رفع حاجت کیلئے جایا کرتے تھے ۔اب وہاں پیڑ لگا کر اسمرتی پارک بنایا گیا ہے ۔ مردوں کے ساتھ عورتیں بھی اس مہم میں بڑھ چڑھ کر حصہ لے رہی ہیں،اس مہم کو کامیاب بنانے کیلئے نگرانی کمیٹی بنائی گئی ۔سینی ٹینشن موٹی ویٹر نرود بہرا نے بتایا کہ پہلے لوگوں کو بیدار کیا گیا بعد میں جرمانہ لگانے کا انتظام لیکن کسی پر بھی جرمانہ نہیں ہوا سب نے اس کام میں ساتھ دیا ۔انہوں نے بتایا کہ لوگوں کو جاگرک کرنے کیلئے کئی طرح کی تکنیک کا استعمال کیا گیا۔ جسے رنگوں سے زمین پر گاؤں کا نقشہ بنا کر اس میں گھر،سڑک،کھیت،پیڑ اور میدان دکھاتے ہیں پھر جگہ جگہ مٹی کے چھوٹے چھوٹے ڈھیر بنا دیتے ہیں اور بتاتے ہیں کہ انسان جو فضلہ خارج کرتا ہے وہ اسی طرح جا بجا پھیل کر گاؤں کی پوری خوبصورتی برباد کر دیتا ہے ۔اسی طرح گلاس میں صاف پانی لیا جاتا ہے اور کہا جاتا ہے کہ اس پانی کو ہم سب پی سکتے ہیں ۔پھر بال پاخانے میں لگا کر اس پانی میں گھول دیتے ہیں پھر پوچھتے ہیں کہ کیا اس پانی کو کوئی پی سکتا ہے سب منع کرتے ہیں ہم بتاتے ہیں کہ مکھیوں کے پیر انہیں بالوں کی طرح ہوتے ہیں وہ گندگی پر بیٹھتی ہیں پھر ہمارے کھانے یا پانی پر ۔اس طرح گندگی ہمارے اندر چلی جاتی ہے اور وہ بیماری پیدا کرتی ہے ۔کھلے میں پڑے پاخانے سے مکھیوں کے ذریعہ بیماری پھیلنے کا سب سے زیادہ خطرہ ہوتا ہے۔ انہوں نے کہا کہ اب دھیر دھیرے لوگ سمجھ رہے ہیں اور ٹوائلیٹ بنانے و استعمال کرنے کو تیار ہوجاتے ہیں۔


گاؤں کی نگرانی کمیٹی سیلف ہیلپ گروپ کے طور پر کام کرتی ہے ۔ وہ یہ دیکھتی ہے کہ گاؤں میں صاف صفائی ٹھیک طرح سے ہورہی ہے یا نہیں۔ وہ گاؤں کے ڈولپمنٹ میں بھی ہاتھ بٹاتی ہے ۔ گاؤں کے داخلہ پر ایک چھوٹا سا مندر بنایا گیا ہے اسے گرامودیوتی کہتے ہیں یعنی گاؤں دیوتا یا رکھوالا ۔ اس سے تھوڑی دور پر کوڑے دان رکھا گیا تھا ۔ اس پر لکھا تھا کوڑے کی جگہ گاؤں کے باہر ہے ۔ گاؤں کے راستے بہت صاف ستھرے تھے ۔ کچے پکے مکانوں کی دیوار پر اڑیہ زبان میں سلوگن لکھے ہوئے تھے جن کا مطلب مل کر رہنا ، صاف رکھنا ، برا نہ سوچنا ، سب کا خیال رکھنا وغیرہ بتایا گیا ۔ یہ بھی معلوم ہوا کہ سرپنچ کا نعرہ ہے ’’ سوچھتا سے ایکتا ، ایکتا سے اقتصادی ترقی ‘‘ سرپنچ دیوی پرساد سے اس بارے میں پوچھنے پر پتا چلا کہ صاف صفائی رہے گی تو بیماری نہیں آئے گی اس سے دوا ، ڈاکٹر پر خرچ ہونے والے پیسے بچیں گے ۔ دوسرے کام کا ناغا نہیں ہوگا اس سے آمدنی میں اضافہ ہوگا ۔ماہ میں دو دن صفائی کیلئے رکھے جاتے ہیں جس میں نالی سڑک جنگل جھاڑی سب کو صاف کیا جاتا ہے ۔ جب سے یہ سلسلہ شروع کیا ہے تب سے مچھر بھی نہیں لگتے ۔ انہوں نے یہ بھی بتایا کہ اس گاؤں میں پچھلے پچاس سالوں سے کوئی ایسا جھگڑا نہیں ہوا جس کیلئے پولس یاعدالت کے پاس جانا پڑا ہو۔ انہوں نے ایک گیت گا کر سنایا جس کا مطلب تھا کہ اگر کوئی جھگڑا ہوگا تو ہم آپس میں مل کر سلجھا لیں گے ۔ ہم مل جل کر رہیں گے۔


یکم اپریل 2015 کو پوجا گاؤںریاست کا پہلا اوڈی ایف (open defecation free) یعنی کھلے میں رفع حاجت سے نجات پانے والا گاؤں بنا ، یکم اپریل 1936 کو اڑیسہ ریاست بنی تھی ۔ اس دن اڑیسہ دیوس منایا جاتا ہے پوجا گاؤں میں جنوری 2015 میں پکے ٹوائلیٹ بنانے کی مہم شروع ہوئی تھی جو یکم اپریل کو مکمل ہوئی یعنی محض تین ماہ میں یہ گاؤں او ڈی ایف بن گیا ۔ خواتین نے اس میں بہت اہم رول ادا کیا ۔ نگرانی کمیٹی کی ممبر شکنتلا نائک کہتی ہیں کہ ہمیں نہیں معلوم تھا کہ ہم نے کوئی اتنا بڑا کام کیا ہے ۔ جیسے دہلی سے لوگ دیکھنے آئیں۔ انہوں نے اس گاؤں کو ماڈ ل گاؤں بنانے کی امید ظاہر کی ۔ جہاں ہر شخص پڑھا لکھا ہو ۔ کوئی بیکار نہ ہو سب کے پاس کام ہو۔ ہر گھر میں پینے کا صاف پانی اور بجلی ہو۔


سرکار کے سوچھ بھارت مشن کے ساتھ یونیسیف تعاون کررہا ہے ۔ اڑیسہ سرکار نے 2015 میں ریاست کے 532 گاؤں اور 42گرام پنچایتوں کو ODFبنانے کا اعلان کیا تھا ۔ ان میں سے 325 گاؤں اور 12 گرام پنچایتوں میں یونیسیف کی مدد سے کام ہورہا ہے ۔ 2012 کے MDWSڈاٹا کے مطابق 79,81,980 ہاؤس ہولڈس میں ٹوائلیٹ نہیں تھے ۔ 2015 کے اعداد و شمار کے مطابق صورتحال میں 8.9 فیصد ٹوائلیٹ کے اضافہ کے ساتھ تبدیلی ریکارڈ کی گئی جو پہلے 1.26 فیصد تھی ۔ اس اضافہ میں سینی ٹیشن موٹیو یٹرز کی محنت شامل ہے ۔ 250 خاندانوں پر ایک موٹیو یٹرمقرر ہے ۔ اسے ہر ٹوائلیٹ کے بننے پر 150 روپے نسینٹیو تین قسطوں میں ملتا ہے ۔ سرکار کا 2019 تک پوری ریاست کو کھلے میں رفع حاجت (ODF )سے نجات دلانے کا منصوبہ ہے ۔ اس کیلئے 17,78,624 ٹوائلیٹ سالانہ 1,48,219 ماہانہ 4941 ہر دن ، 206 ٹوائلیٹ ہر گھنٹے اور چار ہرمنٹ میں بنانے ہوں گے۔ جو ممکن تو نہیں لگتا لیکن امید باقی ہے ۔ اسی سلسلے میں یونیسیف کی ریجنل ڈائرکٹر کرین ہلشوف نے ریاست کادورہ کیا اور وزیر اعلیٰ نوین پٹنایک سے ملاقات کی۔

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Muzaffar Husain Ghazali
Muzaffar Husain Ghazali
Lawyer by training, associate editor at Daily Urdu Net and editor at UNN India

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