अब बैंकों से लगेगा ईएमआई का झटका

ऐसे में आरबीआई के लिए पास कर्ज के उठान को कम करने के लिए नीतिगत दरों में बढ़ोतरी करने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था

0

पहले से ही अनुमान था कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) इस बार नीतिगत दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। और जैसा अनुमान था वही हुआ। बीते 6 जून को आरबीआई ने महंगाई बढ़ने की चिंता को देखते हुए नीतिगत दरों में 25 बेसिस प्वाइंट्स की बढ़ोतरी कर दी। इस फैसले के साथ ही नीतिगत दरों में 0.25% की बढ़ोतरी हो गयी। अब रिपो रेट बढ़कर 6.25% हो गई है, जबकि रिवर्स रिपो रेट बढ़कर 6% हो गयी है। केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद पिछले चार वर्षों में यह पहला अवसर है, जब आरबीआई ने नीतिगत दरों में बढ़ोतरी की है। इसके पहले पिछली बार जनवरी 2014 में दरें बढ़ायी गयीं थी। नीतिगत दरों में बढ़ोतरी के साथ ही स्पष्ट हो गया है कि अब कर्ज महंगे हो जाएंगे और होम लोन या कार लोन जैसे आम जरूरत के कर्ज पर तुलनात्मक रूप से ज्यादा ईएमआई का भुगतान करना पड़ेगा। आरबीआई ने मौद्रिक नीति की घोषणा में 2018-19 की पहली छमाही के लिए खुदरा मुद्रास्फीति दर के अनुमान को भी संशोधित कर 4.8 से 4.9% कर दिया है, जबकि दूसरी छमाही के लिए खुदरा मुद्रास्फीति की दर का अनुमान 4.7% आंका गया है, वहीं जीडीपी ग्रोथ का अनुमान 7.4% पर बरकरार रखा गया है। साफ है कि शीर्ष बैंक ने मौद्रिक नीति की घोषणा करने में अर्थव्यवस्था के तमाम संकेतकों को गहराई से परखने की कोशिश की है और उसके मुताबिक ही नीतिगत दरों में बढ़ोतरी करने का निर्णय लिया है।

देश की अर्थव्यवस्था के संकेतकों को देखा जाए, तो पिछले छह महीने की अवधि में मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की क्षमता बढ़ी है, इसके साथ ही ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में खपत और बिक्री भी बढ़ी है। मौसम के भी अच्छा रहने का अनुमान है। इसलिए अगले खरीफ तथा रबी सीजन में पैदावार भी अच्छी होने की उम्मीद है। इसके बावजूद कच्चे तेल की कीमत में आयी उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डाल सकती है। इसकी वजह से महंगाई का बढ़ना तय माना जा रहा है और ऐसे में आरबीआई के पास बाजार में मुद्रा प्रवाह और मुद्रा की मांग को कम करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने के अलावा कोई दूसरा उपाय नहीं था। मनी फ्लो और डिमांड पर अंकुश लगाने के लिए कर्ज के उठान को नियंत्रित करना जरूरी था और इसीलिए शीर्ष बैंक ने मौद्रिक नीति में 25 बेसिस प्वाइंट्स की बढ़ोतरी की है। बेसिस प्वाइंट्स में बढ़ोतरी होने के साथ ही अब बैंकों के लिए कर्ज महंगा करने का रास्ता भी साफ हो गया है। हाल ही में कुछ बैंकों ने कर्ज को पहले ही महंगा कर दिया है। अब बेसिस प्वाइंट्स की आड़ में उनके लिए कर्ज को और महंगा करना आसान हो जाएगा। एसबीआई इस साल अपने ब्याज दर में दो बार बढ़ोतरी कर चुका है। इसी तरह पीएनबी ने भी हाल में ही कर्ज की दर में बढ़ोतरी करने का ऐलान किया है। सार्वजनिक क्षेत्र के कई और बैंक भी इस साल अपने कर्ज की दर में बढ़ोतरी कर चुके हैं। इसका प्रत्यक्ष असर पहले से ही परेशानियों का सामना कर रहे रियल्टी सेक्टर पर पड़ेगा और उसकी रफ्तार और भी मंद पड़ सकती है। लगभग पूरे देश में इस सेक्टर को मंदी का सामना करना पड़ रहा है। अब ईएमआई बढ़ने की आशंका मंदी को और बढ़ा सकती है।

बाजार में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की बिक्री भी प्रभावित हो सकती है साथ ही बैंक से कर्ज लेकर किये जाने वाले निजी निवेश में भी सुस्ती आ सकती है। निश्चित रूप से आरबीआई के इस कदम से अर्थव्यवस्था के कई मोर्चों पर नकारात्मक असर पड़ेगा, लेकिन डॉलर की मजबूती, बढ़ती मुद्रास्फीति और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के बढ़ते दाम के मद्देनजर आरबीआई के पास बाजार का हाथ तंग करने के अलावा कोई और चारा भी नहीं था। अच्छी बात ये हुई है कि कर्ज की दरों को लेकर बाजार में बनी अनिश्चितता छंट गई है। इसके साथ ही आरबीआई की ओर ये यह कहा जाना कि रेट बढ़ने का सिलसिला लगातार जारी रहने की संभावना काफी कम है, एक उम्मीद की किरण जगाता है। आरबीआई ने ये आश्वासन इसीलिए दिया है, क्योंकि उसे अर्थव्यवस्था में लगातार सुधार के संकेत मिल रहे हैं और इसमें आगे भी सुधार होने की उम्मीद बनी हुई है। इसके साथ ही मकान के खरीदारों के लिए भी एक अच्छी बात ये है कि रिजर्व बैंक ने सस्ते मकानों के लिए सस्ते कर्ज की सीमा भी बढ़ा दी है। दस लाख से अधिक आबादी वाले मेट्रोपॉलिटन शहरों में प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग के तहत 45 लाख तक के फ्लैट के लिए होम लोन को की सीमा 28 लाख से बढ़ाकर 35 लाख कर दी गयी है। इसी तरह अन्य जगहों पर 30 लाख तक के फ्लैट के लिए प्रायोरिटी सेक्टर लेंडिंग के तहत होम लोन की सीमा 20 से बढ़ाकर 25 लाख कर दी गयी है। इस व्यवस्था के तहत सरकार होम लोन के ब्याज पर ग्राहकों को सब्सिडी देती है।

आरबीआई ने इसके साथ ही कोऑपरेटिव बैंक के लिए कर्ज देना आसान करके एक और बेहतर काम किया है। गांवों और कस्बों में ज्यादा से ज्यादा लोगों तक फाइनेंस की सुविधा पहुंचाने के लिए आरबीआई ने शहरी कोऑपरेटिव बैंकों को जरूरत के हिसाब से स्मॉल फाइनेंस बैंक स्थापित करने की अनुमति दे दी है। इससे कस्बाई और ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए कर्ज पाना ज्यादा आसान हो जायेगा। इसमें कोई शक नहीं है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने कर्ज के उठान पर शुरू से ही विशेष ध्यान दिया और इसके तहत ही सरकार ने हमेशा आरबीआई को मौद्रिक नीति संतुलित बनाए रखने का आग्रह किया। संयोग से अर्थव्यवस्था के संकेतक भी काबू में रहे, जिसके परिणामस्वरूप पिछले चार सालों तक शीर्ष बैंक मौद्रिक नीति में नरमी का रुख अपनाता रहा। इसमें एक अच्छी बात आयात बिल के कम होने की भी रही। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत में लगातार होने वाली कमी ने सरकार के आयात बिल को हमेशा ही नियंत्रण में रखा और इसके कारण महंगाई भी नियंत्रित रही। सब्जी और दाल जैसी कुछ चीजों पर स्थानीय कारणों से महंगाई का असर जरूर पड़ा, लेकिन खुदरा महंगाई दर और थोक महंगाई दर दोनों ही पूर्ववर्ती यूपीए की सरकार के कार्यकाल की तुलना में काफी नीचे पहुंच गयीं।

महंगाई दर काबू में आने की वजह से जहां आरबीआई के लिए बाजार में मुद्रा की उपलब्धता करना ज्यादा आसान हुआ, वहीं नोटबंदी की वजह से भी बाजार में मुद्रा प्रवाह में काफी बढ़ोतरी हुई। इसी वजह से मौद्रिक नीति में केंद्रीय बैंक को कभी भी नीतिगत दरों को बढ़ाने की जरूरत महसूस नहीं हुई, बल्कि कई मौकों पर नीतिगत दरों में कटौती भी की गयी। जिससे होम लोन और कार लोन जैसे आम जरूरत के कर्जों के उठान में बढ़ोतरी भी हुई और इनकी ईएमआई भी उपभोक्ताओं के पहुंच में ही रही। लेकिन अब हालात बदलने लगे हैं। वैश्विक परिस्थितियों की वजह से जहां आयात बिल के बढ़ने की आशंका बन गयी है, वहीं व्यापार घाटा बढ़ने की भी आशंका है। इससे मुद्रास्फीति में भी बढ़ोतरी होना तय माना जा रहा है। ऐसे में आरबीआई के लिए पास कर्ज के उठान को कम करने के लिए नीतिगत दरों में बढ़ोतरी करने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा था। यह ठीक है कि नीतिगत दरों में हुई बढ़ोतरी से ईएमआई में बढ़ोतरी जरूर होगी, लेकिन उपभोक्ताओं पर प्रतिवर्ष अधिकतम छह से सात हजार रुपए तक का भार पड़ेगा।

SOURCEहिन्दुस्थान समाचार/योगिता पाठक
Previous articleमध्य प्रदेश में 60 लाख फ़र्ज़ी मतदाता होने का कांग्रेस का दावा ग़लत ― चुनाव आयोग
Next articleआम किसान से बांध निर्माता बनने का सफर

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.