लड़कियाँ हासिल न कर सकें, ऐसी कोई चीज़ नहीं

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[dropcap]ल[/dropcap]ड़कियाँ लड़कों से थोड़ी आगे हैं और यह तालीम की वजह से है। आज ऐसी कोई चीज़ नहीं जो लडकियाँ हासिल नहीं कर सकतीं। अगर वो सोच लें तो वो कर सकती हैं। राक्षसों को भी हरा सकती हैं। इन ख़्यालात का इज़हार यूनीसेफ की गुडविल सफ़ीर और मशहूर अदाकारा करीना कपूर ने किया। वो यूनीसेफ अंबेडकर यूनीवर्सिटी और हिंदुस्तान की मुशतर्का पहल के तहत लखनऊ में मुनाक़िदा प्रोग्राम महफ़ूज़ माहवारी बराए लडकियाँ व ख़वातीन में बोल रही थीं। उन्होंने कहा कि स्वच्छ माहवारी लड़कियों की ज़िंदगी से जुड़ा एक हस्सास मुद्दा है।

करीना कपूर ने अफ़सोस ज़ाहिर करते हुए कहा कि अभी भी लड़कियों को लानत समझा जाता है। समाज उन्हें कमतर मानता है जबकि हर मैदान में लड़कियों ने अपना लोहा मनवाया है। माहवारी के दौरान औरतों को मंदिर में जाने से रोकने पर करीना ने दुख का इज़हार करते हुए कहा कि पीरियड ऊपर वाले ने बनाए हैं, इस में लड़कियों का कोई दख़ल नहीं, बल्कि माहवारी ही लड़की को औरत में तबदील करती है। उन्होंने पूछा कि जिसकी वजह से औरत माँ बनती है वो गंदी कैसे हो सकती है। अगर भगवान को माँ के रूप में पूजा जा सकता है तो औरत को किसी भी हालत में इसके पास जाने से नहीं रोका जा सकता। करीना ने लड़कियों को मुख़ातब करके कहा कि आप अच्छे प्रोडक्ट, साफ़ टॉइलेट की मांग कीजिए ताकि आपके वो दिन आसान बनें। उन्होंने मर्दों से भी कहा कि इन अय्याम में वो उनको सपोर्ट करें; उनकी प्राईवेसी का ख़्याल रखें।

ये प्रोग्राम गरिमा मॉडल के तहत तीन अज़ला की लड़कियों का रवैय्या तबदील करने में मिली कामयाबी को सेलिब्रेट करने के लिए मुनाक़िद किया गया था। इस मौक़े पर रियासत में साफ़ सफ़ाई और महफ़ूज़ माहवारी को फ़रोग़ देने के लिए रोड मैप जारी किया गया। गरिमा प्रोजेक्ट में सती मार्ग को ख़ुसूसी अहमियत हासिल है। लडकियाँ-ओ-तालिबात तफ़रीह के साथ पढ़ाई और महफ़ूज़ माहवारी के बारे में खुल कर बातें करती हैं। इस प्रोग्राम के ज़रीए 1,21,000 लड़कियों को माहवारी के दौरान ख़्याल रखने वाली बातों से वाक़िफ़ कराया गया। उसने लड़कियों में “चुप्पी तोड़ो”, “संस्था बनाओ” जैसे प्रोग्रामों से जुड़ने का हौसला पैदा किया।

इस प्रोग्राम में मेहमान-ए-ख़सूसी के तौर पर शरीक हुई सांसद डिम्पल यादव ने कहा कि ये पहला मौक़ा है जब भारत में स्वच्छ माहवारी के मसले पर हम एक दूसरे से खुल कर बात कर रहे हैं। लोग इस मुद्दे पर अपनी बेटीयों से बात नहीं करते। मैंने देखा है कि माएं भी बात करने से कतराती हैं। जब तक बात नहीं करेंगे, उनको समझाएँगे नहीं, तब तक वो रोती रहेंगी। उन्होंने कहा कि इन अय्याम में 60% लडकियाँ स्कूल नहीं जातीं। सिर्फ 12% लडकियाँ और औरतें ऐसी हैं जो सेनेट्री नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं, 70% पुराने कपड़े और दूसरी चीज़ें काम में लाती हैं जो महफ़ूज़ नहीं हैं। उन्होंने कहा कि 86% लडकियाँ इस बाईलोजीकल तबदीली के लिए ज़हनी तौर पर तैयार नहीं होतीं और 90% को सेनेट्री नैपकिन के इलावा दूसरी चीज़ों के इस्तेमाल का उनकी सेहत पर क्या असर पड़ता है इस की वाक़फ़ियत नहीं होती। उनके लिए महफ़ूज़ टॉयलेट होने चाहिऐं। उन्होंने कहा कि इस मसले पर बात का न होना एक तरह की समाजी पाबंदी है।

उम्मत कुमार, प्रिंसिपल सैक्रेटरी वुज़रा रुत हैल्थ — उत्तरप्रदेश सरकार, ने कहा कि रियासत में किशोरी सुरक्षा योजना, टॉयलेट बनवाने और बच्चों में कुपोषण को रोकने जैसी स्कीमों में डिम्पल यादव की रहनुमाई हासिल रही है। अब गरिमा प्रोजेक्ट के तहत मिर्ज़ापुर, सोनभद्र और जौनपूर मैं लड़कियों को सेनेट्री नैपकिन तक़सीम किए गए हैं। उन्होंने बताया कि 2013 मैं स्वच्छ भारत मिशन के तहत उस की शुरूआत महोबा ज़िला से हुई थी। उन्होंने कहा कि 8 नैपकिन का पैकेट रु० 10 में फ़रहम किया था ताकि लडकियाँ आसानी से इस का इस्तेमाल कर सकें। उनके मुताबिक़ लड़कियों के 44 हाई स्कूल वानटर कॉलिजों में उसे मुतआरिफ़ किराया गया था। 2013 men महोबा में रही डी ऐम श्रीमती काजल से बात करने पर मालूम हुआ कि उन्होंने अनिल सेंगर को सस्ते नैपकिन बनाने के लिए तैयार किया था। उन्होंने बताया कि महोबा से लोग काम की तलाश में नक़्ल-ए-मकानी करते रहते हैं। वहां ज़्यादातर औरतें घरों में रहती हैं। ग़ैर-महफ़ूज़ कपड़े, रवैया दूसरी चीज़ें माहवारी के दौरान इस्तेमाल करने से वो बीमारी हो जाती थीं। उन्होंने कहा कि में एक डाक्टर हूँ, मुझे मालूम है कि उन्हें किस तरह बीमारियों से महफ़ूज़ रखा जा सकता था। इस लिए मैंने औरतों को रोज़गार फ़राहम करने के साथ महफ़ूज़ माहवारी के लिए बेदार किया। इस काम में हमारे साथ काम करने वालों का भी पूरा तआवुन रहा। आज अनिल सेंगर की दो यूनिटें काम कर रही हैं जिनमें बहुत सी औरतें काम करती हैं।

इस मौक़े पर अपने अपने इलाक़ों में समाजी बेदारी का काम करने वाले बच्चों, बच्चीयों, ग्राम प्रधानों और हेल्थ काउंसिलरस को इनामात से नवाज़ा गया था। उनमें से शिवांगी (मिर्ज़ापूर के भैना गांव की रहने वाली) ने बताया कि उनके गांव की आबादी 600-700 है। लोग सड़क के किनारे रफ़ा हाजत करते थे, जिनके घर में टॉयलेट बना हुआ था वो भी टॉयलेट इस्तेमाल नहीं करते थे। शीवानगी के साथ पढ़ने वाली लडकियाँ उस के गांव की गंदगी की वजह से नहीं आती थीं। शिवांगी ने खुले में रफ़ा हाजत करने वालों पर पानी फेंकना शुरू किया। इस में गांव के सरपंच ने भी मदद की। इस तरह उस का गांव आज इस मसले से नजात पा चुका है। इसी तरह शहज़ादी ने अपने गांव में कमसिन लड़की की शादी को रुकवाया। उसने गांव के बड़े लोगों की मदद ली और आख़िर में सरपंच को आगे आना पड़ा। शगुफ़्ता चार लड़कियों की काउंसलिंग कर चुकी है जबकि अंजू ने 2,321 लड़के लड़कियों की काउंसलिंग की है। गरिमा प्रोजेक्ट का उत्तरप्रदेश में 19-10 साल की 23.5 लाख लड़कियों को महफ़ूज़ माहवारी से जोड़ने का टार्गेट है। अभी पाँच लाख नैपकिन हर साल तक़सीम हो रहे हैं।

कमिशनर वज़ारत ज़राअत उत्तरप्रदेश ने बताया कि रियास्ती सरकार तमाम अवामी जगहों जैसे रोडवेज़ और बस अड्डों पर औरतों के लिए साफ़ और महफ़ूज़ बैत उल-खुला बना रही है। साथ ही सरकार यूनीसेफ की मदद से उन मुक़ामात पर वेंडिंग मशीन लगाएगी ताकि लड़कियों वाइ रुतों को नैपकिन के लिए सफ़र के दौरान परेशान ना होना पड़े। उन्हें इन मुक़ामात पर नैपकिन दस्तयाब हों। वहीं डाक्टरों का कहना है कि लड़कियों वाइ रुतों में बीमारियों की शुरूआत यूरीन इन्फ़ेक्शन से होती है। ज़्यादातर मुआमलों में ये इन्फ़ेक्शन माहवारी के दौरान पुराने कपड़े या ग़ैर महफ़ूज़ चीज़ों के इस्तेमाल से होता है। कभी कभी इन्फ़ेक्शन लड़कियों में बांझपन की वजह से भी बन जाता है। तमाम मज़ाहिब ने इन अय्याम में औरतों को ख़ुसूसी रियाइत दी हुई है। मसलन इस्लाम के मुताबिक़ माहवारी के अय्याम में औरतों को नमाज़, रोज़े में रियाइत है। इस दौरान अगर कोई शख़्स तलाक़ देना चाहे तो वो वाक़्य नहीं होती। इन अय्याम में मर्दों को औरतों से दूर रहने का हुक्म दिया गया है। हिंदू मज़हब में हालांकि पीरियड के दौरान औरतों को नापाक नहीं माना जाता, यह ज़रूर समझा जाता है कि इस दौरान जिस्मानी बद हवासी या परेशानी की वजह से भगवान् से औरत का ध्यान हट सकता है। शायद इसी लिए उन्हें मंदिरों में जाने की इजाज़त नहीं है। अलबत्ता माहवारी के दौरान लड़कियों-ओ-औरतों को पीठ, पेड़ू और टांगों में दर्द की जिस तकलीफ़ से गुज़रना पड़ता है, इस में उन्हें हिम्मत अफ़्ज़ाई या सपोर्ट की यक़ीनन ज़रूरत है। यूनीसेफ का ये क़दम इस लिहाज़ से अहम है कि इन ख़ास दिनों के लिए लडकियाँ ज़हनी तौर पर तैयार हों। वालदैन खासतौर पर माएं उनकी रहनुमाई करें ताकि वो स्वच्छ और महफ़ूज़ तरीक़े से अपने माहवारी के दिन गुज़ार सकें। लडकियाँ या माएं सेहतमंद होंगी तभी बच्चे सेहत मंद होंगे जिनसे एक अच्छे समाज की तामीर होती है।