रमज़ान का पाक महीना और पाक समर्थित “भटके हुए नौजवानों” के लिए भारतीय सेना का युद्धविराम अभी-अभी ख़त्म हुआ है। इस ‘पाक’ में उस पाक के नापाक कुकर्मों के प्रति हमारा यह एकतरफ़ा प्रेम संसार भर में बिरला है। यदि हम नाग-पंचमी का भी उदाहरण लें तो उसमें भी ज़हरीले नागों को केवल दूध पिलाया जाता है, अपने घर में घुसकर डसने देने की आजादी तो आपको इसी जगह मिलेगी। गंगा-जमनी तहज़ीब और कश्मीरियत से लबरेज़ इस मौसम में न तो बहता हुआ ख़ून दिखाई देता है और न ही मासूमों की चीख़ें सुनाई देती हैं। बस, हर तरफ़ मुहब्बत, अमन, भाईचारा!

अनायास ही एक कहानी याद आ गई। उस साधु की कहानी जो नदी पार कर रहा था जब उसे एक बिच्छू बहता हुआ दिखा। उसने बिच्छू को बचाने के इरादे से अपनी हथेली पर उठाया और बिच्छू ने अपने स्वभाव के अनुसार साधु को डस लिया। दर्द के कारण साधु के हाथ से बिच्छू गिर गया और साधु ने दयाभाव से बिच्छू को फिर से उठा लिया। बिच्छू ने उसे फिर से डसा। यह सिलसिला लगातार चलता रहा। एक प्रत्यक्षदर्शी ने पूछा तो साधु ने कहा — डसना बिच्छू की प्रवृति है और दया करना मेरी। जब यह जान का खतरा होते हुए भी अपनी प्रवृति नहीं छोड़ सकता, तो मैं थोड़े से दर्द के कारण अपनी प्रवृति कैसे छोड़ दूँ?

ऐसा प्रतीत हो रहा है कि राज्य और केंद्र सरकार उसी साधु के प्रसंग से प्रेरित हैं। पर शायद हम ये बात भूल रहे हैं कि सरकार कि भूमिका वैराग्य धारण किए सन्यासी की नहीं है। उसकी भूमिका उस पिता की है जिसपर अपने बच्चों की सुरक्षा का भी दायित्व है। उस राजा की है जिसपर बाहरी अतिक्रमणकारी शक्तियों और आंतरिक षडयंत्रों — दोनों का ही सर कुचलने का दायित्व है। पर आज की सरकारों से दायित्व और जवाबदेही जैसी अपेक्षाएँ रखना थोड़ा ज्यादा नहीं हो जाएगा? और हाँ, न ही कोई सेना को साधु समझने की भूल करे। उसकी लाठी में आवाज भी होती है, और दर्द भी!

पर आज हम उसपर प्रकाश डालते हैं जिसके लिए यह युद्धविराम लगाया गया है। सरकार का कहना था कि यह एकतरफ़ा युद्धविराम उन शांतिप्रिय कश्मीरियों के लिए लगाया गया है जो अमन चाहते हैं — ताकि वो शांति से रोज़े कर सकें। अब क्योंकि ये युद्धविराम एकतरफ़ा था, इससे सिद्ध होता है कि रोज़े की शांति केवल भारतीय सेना द्वारा चली गोलियों से ही भंग होती है। यदि गोलियां आतंकियों की बंदूकों से निकलें तो उससे रोज़ा नहीं टूटता। और अगर आतंकियों की हलाल गोलियों से जो ख़ून बहा वो काफिर ख़ून हो तो रोज़ा मुकम्मल हो जाता है। इसलिए अमरनाथ के श्रद्धालु हों या काफिर सैनिक, उनका ख़ून बहने से इबादत में ख़लल नहीं पड़ता।

न ही मस्जिदों से भारत-विरोधी फ़रमान जारी होने से रोज़े में ख़लल पड़ता है और न ही रमज़ान में नमाज़ के बाद CRPF की जीप पर पत्थर फेंकने से। ख़लल पड़ता है पत्थरबाज के जीप के नीचे आ जाने से। एक तो ये जन्नतनशीं करने का नया तरीक़ा निकाला है सेना ने। यह अभी तक स्पष्ट नहीं है कि इसे बाक़ी सड़क दुर्घटनाओं की तरह एक्सिडेंट माना जाए या शहादत! एक वायरल विडियो जिसमें सुरक्षा-बल आतंकी के परिवार को समझाने की कोशिश कर रहे हैं, उसमें परिवार का मानना है कि, “जब वो (आतंकी) हथियार उठाएगा ये साबित करेगा कि ‘मैं अल्लाह के रास्ते पर हूँ’; तभी तो अल्लाह को लगेगा कि उसने शहादत दी है।” अब सभी कश्मीर मामले के विशेषज्ञ सकते में हैं कि पत्थर को हथियार और जीप के नीचे आने को शहादत माना जाए या नहीं!

ख़ैर, युद्धविराम में शांति बदस्तूर जारी रही, और जाते-जाते राइज़िंग कश्मीर के संपादक पत्रकार शुजात बुखारी को भी साथ ले गई। पूरे देश में इस दुर्घटना पर शोक कि लहर दौड़ गई, विशेषकर नेताओं और मीडिया में। हाँ, वैसे उनके दो निजी सुरक्षा अधिकारी (PSO) भी बलिदान हुए हैं, पर समाचार चैनलों और ट्विटर बुद्धि (पर)जीवियों को उनके नाम अभी पता नहीं चल पाए हैं। जैसे ही पता चलते हैं, उनको भी यथासंभव श्रद्धांजलि दे दी जाएगी।