विपक्षी एकता के रास्ते में कील और कांटें

ममता दीदी कहती हैं कि कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा की पार्टी जेडीएस के साथ समझौता कर लिया होता, तो चुनाव परिणाम अलग होते। यह टिप्पणी लिखे जाने तक भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक में सरकार बनाने के करीब थी

0
81
कर्नाटक के ऊर्जा मंत्री डीके शिवकुमार कहते हैं कि हम पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी की रैलियों का पूरी तरह लाभ नहीं उठा पाये, इसलिए चुनाव हार गये। कांग्रेस संस्कृति में डीके शिवकुमार के बयान से किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए। वहां तो जीत का श्रेय हाइकमान को और हार की जिम्मेदारी राज्य और स्थानीय नेतृत्व के गले होती ही है। आश्चर्य तो नेशनल कांफ्रेंस नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्य मंत्री उमर अब्दुल्ला को है कि कांग्रेस चुनाव हार गई। हां ममता बनर्जी ने हार पर अफसोस जताने के साथ एक सलाह भी दे डाली है कि कांग्रेस लड़ाई जारी रखे। ममता दीदी कहती हैं कि कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा की पार्टी जेडीएस के साथ समझौता कर लिया होता, तो चुनाव परिणाम अलग होते। यह टिप्पणी लिखे जाने तक भारतीय जनता पार्टी कर्नाटक में सरकार बनाने के करीब थी। कयास लागाये जा रहे थे कि बीजेपी जरा भी चूकी, तो कांग्रेस जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी को सीएम पद का ऑफर देकर बाजी पलट सकती है। बहरहाल, ये कयास ही हैं। अभी तो कांग्रेस की हार के कारणों और मायनों पर विचार करना चाहिए। ध्यान रखना होगा कि बीजेपी को ही हराकर कांग्रेस सत्ता में आई थी। वह पांच साल सत्ता में रही।
सत्ता के नशे में चूर कांग्रेस कॉडर निर्माण को भूल जाया करती है। परिणाम यह कि सरकार विरोधी हवा के साथ पार्टी के अंदर कार्यकर्ता भी नाराज हो उठते हैं। दूसरी ओर अमित शाह की अगुवाई में भारतीय जनता पार्टी हर वक्त कॉडर का ख्याल रखती है। खासकर जहां चुनाव होने हैं, वहां केंद्रीय नेतृत्व का ध्यान कार्यकर्ताओं पर अधिक ही रहता है। ऐसे में नीचे के कार्यकर्ताओं का उत्साह बढ़ता है। कर्नाटक में यही हुआ, जिसका लाभ पार्टी को मिला। फिर कांग्रेस अपनी ही नीतियो का ढंग से प्रचार नहीं कर पाती। उलटे बीजेपी कांग्रेस की योजनाओं को भी बखूबी अपना बना लेती है। कर्नाटक में भी आधार चुनाव का एक कारण बना। प्रधानमंत्री मोदी मतदाताओं को समझाते रहे कि आधार कार्ड के जरिए उन्होंने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया है। कांग्रेस ने चुनाव लड़ने के जो दांव चले, उनसे लेने के देने पड़ गये। लिंगायतों को अलग अल्पसंख्यक धर्म का दर्जा देकर कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने इस वोट बैंक को कांग्रेस के हक में करने की कोशिश की थी। इस पर बीजेपी ने शुरू से ही कहना शुरू किया कि कांग्रेस हिंदू धर्म को बांट रही है। लोगों को यह बात समझ में आई। फिर कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की बदली शैली भी कारगर नहीं रही। वह प्रधानमंत्री मोदी के ही अंदाज में हमलावर रहे, पर भूल गये कि मोदी ने उन्हें कभी अपने बराबर का नेता माना ही नहीं। शुरू में राजनीतिक क्षेत्रों में लगा कि चुनाव राहुल बनाम मोदी हो गया है, पर बाद में सोनिया गांधी ने बेटे के लिए प्रचार मैदान में कूदकर अनजाने ही यह जता दिया कि राहुल गांधी कमजोर पड़ रहे हैं।
इसके अतिरिक्त पार्टी राज्य में सत्ता विरोधी लहर को थाम नहीं पाई। कांग्रेस चाहती तो केंद्र की कथित नाकामियों को यहां गिनाकर बीजेपी के खिलाफ हवा बना सकती थी। बहुत कुछ गुजरात में उसने ऐसा किया भी था। जेडीएस ने भी कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया। जेडीएस कांग्रेस की कीमत पर ही मजबूत हुई। कारण तो बहुत से हैं, गिन जा रहे हैं और आगे भी गिनाए जायेंगे। अब बात कर्नाटक चुनाव परिणाम के मायनों की। कांग्रेस अकेले कर्नाटक का किला फतह कर लेती, तो इसका लाभ राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के साथ 2019 के लोकसभा चुनाव पर भी पड़ सकता था। कर्नाटक में मजबूत होकर बीजेपी अब दक्षिण में और मजबूती के साथ आगे बढ़ेगी। कर्नाटक में कांग्रेस की हार का विपक्षी एकता पर भी असर पड़ेगा। क्षेत्रीय पार्टियां कांग्रेस पर हावी होने की कोशिश करेंगी। इससे विपक्ष की एकता कितनी मजबूत होगी, कुछ कह नहीं सकते। शायद विपक्षी एकता को ध्यान में रखते हुए ही कांग्रेस की ओर से जेडीएस नेता कुमारस्वामी को सीएम बनाने की सुगबुगाहट शुरू हुई। ममता बनर्जी और उमर अब्दुल्ला भी विपक्ष की दूरगामी नीतियों पर ही नजर रखकर बात कर रहे हैं। फिलहाल तो सभी को अहसास हो रहा है कि जिस रास्ते कांग्रेस चल रही है, वह कांटों भरा ही है।
हिन्दुस्थान समाचार/प्रभात ओझा