कर्नाटक में मठ-मंदिरों का प्रभाव

कर्नाटक के मठ शैक्षणिक और सामाजिक कार्यों में अर्से से लगे हैं। बड़े-बड़े इंजीनियरिंग-मेडिकल कॉलेज से लेकर अस्पताल तक, मठों के ट्रस्ट से संचालित होते हैं। इस तरह लाखों परिवार इन मठों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं

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कर्नाटक में विधानसभा चुनाव की रणभेरी बजने के साथ ही वहां की चुनावी बिसात पर सियासत के मोहरों ने अपनी चाल तेज कर दी है। जनता-जनार्दन को अपने पाले में करने की जुगत भिड़ाई जाने लगी है और इसी क्रम में मठ-मंदिरों के दौरे कर साधु-संत-महंतों का आशीर्वाद पाने की नेताओं में मानों होड़-सी लग गयी है। गुजरात की तर्ज पर पार्टी के मुखिया राहुल गांधी मंदिर दर मंदिर पहुंचने लगे हैं। उधर बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने भी मठ-मंदिरों में जाकर मत्था टेकने और संतों से आशीर्वाद लेने का उपक्रम तेज कर दिया।

सूबे की सत्ता पर काबिज और सत्ता की दावेदार दो प्रमुख पार्टियों के प्रधानों द्वारा मठ परिक्रमा की रफ्तार तेज करने से इतना साफ हो गया है कि कर्नाटक की चुनावी जंग में धर्म इस बार सबसे बड़ा हथियार बनने जा रहा है। सुविचारित रणनीति के तहत भाजपा ने कर्नाटक के रण में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी उतार दिया है। चुनाव की घोषणा से पहले ही योगी जी दक्षिण भारत के द्वार कहे जाने वाले इस राज्य का दौरा कर चुके हैं और कुछ प्रमुख मठ के प्रधानों से मिल चुके हैं।

कर्नाटक के सामाजिक, शैक्षणिक और धार्मिक जीवन में मठ-मंदिरों की भूमिका बेहद अहम है। उत्तर भारत की तरह केवल पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों तक उनकी भूमिका सीमित नहीं है। कर्नाटक के मठ शैक्षणिक और सामाजिक कार्यों में अर्से से लगे हैं। बड़े-बड़े इंजीनियरिंग-मेडिकल कॉलेज से लेकर अस्पताल तक, मठों के ट्रस्ट से संचालित होते हैं। इस तरह लाखों परिवार इन मठों से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर जुड़े हुए हैं। एक आंकड़े के मुताबिक, अकेले मुरुघाराजेन्द्र मठ डेढ़ सौ से ज्यादा शैक्षणिक संस्थान चलाता है। सुत्तुर मठ के तीन सौ से ज्यादा संस्थान कर्नाटक, तमिलनाडु से लेकर उत्तर प्रदेश तक में फैले हैं। तुमकुर के सिद्धगंगा मठ और चित्रदुर्ग के शृृंगेरी मठ के स्कूल-कॉलेजों में 30-30 हजार बच्चे शिक्षा पाते हैं। कर्नाटक में मठों का वर्चस्व 80 दशक में शुरू हुआ। राजनीति में इनका दबदबा 1983 से बढ़ा, जब मठों ने आधुनिक तौर-तरीकों को अपनाने के साथ सामाजिक और शैक्षणिक कार्य शुरू किए।

राज्य के सभी 30 जिलों में मठों का जाल फैला हुआ है। जातीय समीकरण के लिहाज से मठों का अपना प्रभुत्व और दबदबा है, जो राजनैतिक दलों को उनकी ओर आकर्षित करता है। ऐसे में ये अकारण नहीं है कि विधानसभा चुनाव की घोषणा के काफी पहले से ही मंदिर और मठों में नेताओं की भीड़ जुटने शुरू हुई। कर्नाटक में 600 से ज्यादा मठ हैं, जो प्रभावी हैं। अकेले वीर शैव (लिंगायत) समुदाय के 400 मठ, वोक्कालिंगा समुदाय के 150 मठ और कुरबा समुदाय के 80 से ज्यादा मठ हैं। इन तीन समुदायों का राज्य में करीब 38 फीसदी वोट शेयर हैं और किसी भी पार्टी की सरकार बनवाने में इनकी अहम भूमिका होती है। इसीलिए बीजेपी-कांग्रेस और जेडीएस तीनों ही चुनाव में इनको साधने में जुटी हैं। तुमकुर का सिद्धगंगा मठ जहां लिंगायत बिरादरी का है, वही अदिचुंचनगिरि मठ वोक्कालिगा समुदाय का है। कनक गुरुपीठ को पिछड़े समुदाय का सबसे असरदार मठ माना जाता है। उडुपी के अष्टमठ का प्रभाव ब्राह्मण और दूसरी हिन्दू जातियों पर बहुत ज्यादा है। राज्य में लिंगायत की आबादी सबसे ज्यादा 17 फीसदी के करीब है। यही वजह है कि लगभग सभी राजनीतिक दल मठ दर्शन के जरिए लिंगायत वोटरों को साधने में लगे हैं। उडुपी के मठों की राजनीतिक में सीधी रुचि बहुत कम रही है। यहां के प्रसिद्ध पेजावर मठ के प्रमुख स्वामी विश्वेशतीर्थ जी महाराज विश्व हिन्दू परिषद की संस्थापना काल से जुड़े रहे हैं। संत समाज और संघ परिवार में उनकी बड़ी प्रतिष्ठा है। उमा भारती उनकी ही दीक्षित शिष्या हैं। ऐसे में उडुपी मठ का समर्थन भाजपा को स्वाभाविक तौर पर मिलता है। इस बार वहां के शिरुर मठ के प्रमुख लक्ष्मीवर तीर्थ स्वामी ने खुद ही चुनाव में खड़ा होने की घोषणा कर दी है। उन्होंने भाजपा से चुनाव लड़ने की इच्छा जतायी है। क्षेत्र में युवा स्वामी की अच्छी प्रतिष्ठा भी है। माना जा रहा है कि योगी आदित्यनाथ के यूपी की गद्दी पर बैठने के बाद से दक्षिण के कुछ साधु-संतों के मन में भी राजनीति के बीज अंकुरित होने लगे हैं।

योगी आदित्यनाथ ने भी पिछले दिनों मंगलुरू के कदाली मठ का दौरा किया था, जिसे योगेश्वर मठ के नाम से भी जाना जाता है। प्रदेश में नाथ संप्रदाय का यह सबसे बड़ा केंद्र है। बेंगलुरु रैली के दौरान योगी ने अदिचुंचनगिरि मठ में उसके प्रधान निर्मलानंदनाथ स्वामीजी के साथ पूजा की थी और मठ में ही रात्रि विश्राम किया था। यह मठ वोक्कालिगा समुदाय का है। भाजपा के लिए वोक्कालिगा समुदाय के वोटरों को लुभाने के लिए इससे आसान और बेहतर जरिया कुछ और नहीं हो सकता था। यही कारण है कि पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह भी स्वामीजी से मिल चुके हैं।

कर्नाटक के तटीय इलाके में नाथ संप्रदाय के अनुयायियों की ज्यादा संख्या है। पूरे राज्य में इस संप्रदाय के 80 से ज्यादा मठ हैं। जाहिर है बीजेपी योगी आदित्यनाथ का इस्तेमाल दक्षिण कन्नड़ और उडुपी इलाके में वोटरों को लुभाने के लिए कर सकती है। कर्नाटक में इस संप्रदाय की जड़ें गहरी हैं। नाथ संप्रदाय के लोग अपने प्रधान को महादेव का अवतार मानते हैं। इसी बात को ध्यान में रखते हुए पार्टी ने योगी को कर्नाटक के चुनाव में उतारा है। हालिया उपचुनाव में गोरखपुर की सीट गंवा देने के बावजूद भाजपा को इस इलाके में योगी से ढेर सारी उम्मीदें हैं। मठों से आम जनता की बेपनाह श्रद्धा जुड़ी रहने के चलते इनके वोट आसानी से संबंधित पार्टियों में शिफ्ट हो जाते हैं और पार्टियां इसे उपहार के तौर पर समझती हैं।

3 अप्रैल को भी राहुल गांधी और अमित शाह चुनावी जनसभाओं के अलावा मठों में पहुंचे। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह कनक गुरुपीठ गए, जो मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की बिरादरी का है। हालांकि उनको गुरुपीठ के मुख्य स्वामी श्री निरंजनानंद पुरी से आशीर्वाद नहीं मिल पाया, जबकि राहुल गांधी पहले हाजिरी लगाने के चलते आशीर्वाद पाने में कामयाब हो गये। राजनीतिक क्षेत्रों में इस मुलाकात के होने और ना होने के मायने निकाले जा रहे हैं।

दरअसल, जिस वीएस येदुरप्पा को भाजपा ने इस बार सीएम पद के लिए उम्मीदवार घोषित किया है वह बहुसंख्यक लिंगायत बिरादरी से आते हैं। सन 1990 के दशक से ही ये बिरादरी कांग्रेस से नाराज हैं, जब वीरेन्द्र पाटिल को राजीव गांधी ने मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटा दिया था। अब उसी बिरादरी में सेंधमारी के लिए कांग्रेस ने धार्मिक अल्पसंख्यक वाला दांव खेला है। कर्नाटक की राजनीति के बड़े कद्दावर नेता देवेगौड़ा और उनके बेटे एचडी कुमारस्वामी दूसरी बड़ी बिरादरी वोक्कालिगा से आते हैं। जबकि सिद्धारमैया पिछड़ी जाति से हैं।

कांग्रेस जहां अपनी सरकार बचाने की कोशिश में है, वहीं भाजपा दक्षिण के इस प्रवेश द्वार पर कमल खिलाकर ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ के संकल्प के नजदीक जाने की फिराक में है। अब सवाल उठता है कि क्या मठ-मंदिरों की परिक्रमा के जरिये ही पार्टियां कर्नाटक के किले को फतह कर लेना चाहती हैं या जनता के सवालों और समस्याओं को भी चुनावी मुद्दा बनाना चाहती हैं। फिलहाल तो यही लगता है कि किसानों की आत्महत्या, बिजली-पानी का संकट और प्रशासनिक भ्रष्टाचार जैसे सवाल चुनावी परिदृश्य से ओझल हो गये हैं जिसे लेकर कर्नाटक की जनता लगातार उद्वेलित रही है।

हिन्दुस्थान समाचार/पुखराज