Monday 18 October 2021
- Advertisement -
HomeViewsArticleऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहूँ जिसे?

ऐसा कहाँ से लाऊँ कि तुझ सा कहूँ जिसे?

|

OBITमुफ़्ती मुहम्मद सईद का गुज़रना राष्ट्र का नुक़सान है जिसकी भरपाई नहीं की जा सकती। वो उन सिद्धांतों के संरक्षक थे जिनमें सहिष्णुता, सम्बन्ध और रिश्तों को निभाने की रिवायत थी। इस पीढ़ी के वो आख़िरी नेताओं में से थे जिन्हें नेहरूवादी कहा जाता है। मुफ़्ती साहब ख़ुद कहते थे कि मैं नेहरू के ज़माने का सियासत दां हूँ; इस से ये गुमान नहीं होना चाहिए कि उन्हें नेहरू की हर बात से इत्तिफ़ाक़ था बल्कि इस से उनकी मुराद सबको साथ लेकर चलना और सब का ख़्याल रखना, हर तबक़े की भागीदारी को सुनिश्चित करना, जनता के फ़ैसलों का स्वागत और अपनी सरकार में अंतर्विरोध को जगह देनी थी इस से उनके नीतिज्ञ अनुभवी राजनेता होने का इल्म होता है।

कई मर्तबा तो वो यकतरफ़ा ही संबंधों को निभाते हुए नज़र आते हैं। इस में उनके राजनैतिक मतविरोध रुकावट नहीं बनते। ये ख़ूबी नेहरू के इलावा अर्जुन सिंह, डाक्टर करन सिंह, बी जे पी के अटल बिहारी वाजपेयी, आडवाणी और मदनलाल ख़ुराना में भी दिखाई देती है। बी जे पी के साथ मिलकर जम्मू-कश्मीर में हुकूमत बनाना जनता के फ़ैसलों के स्वागत का ही नतीजा था।

पाँच दशक पहले मुफ़्ती सईद ने जब जम्मू-व-कश्मीर की सियासत में क़दम रखा, उस वक़्त शेख़ अबदुल्लाह की तूती बोलती थी। उनके बारे में कहा जाता था कि वो बिजली के खम्बे को भी मैनडेट दे दें तो वो जीतेगा। मुफ़्ती साहब ने अपनी सियासत कांग्रेस के साथ शुरू की थी। जम्मू-व-कश्मीर में उस वक़्त इस क़ौमी पार्टी से सम्बन्ध रखने वाले लोगों को समाजी बाईकॉट का सामना करना पड़ता था। शेख़ अबदुल्लाह कांग्रेस के लीडरान को सर-ए-आम गटर का कीड़ा कहा करते थे। कई दशकों तक मुफ़्ती साहब नैशनल कान्फ़्रैंस के मुक़ाबले में कोई इलैक्शन तो नहीं जीत सके लेकिन शेख़ अबदुल्लाह को चुनौती देते रहे। जब फ़ारूक़ अबदुल्लाह की हुकूमत गिरने के बाद कांग्रेस नैशनल कान्फ़्रैंस के 13 असंतुष्ट नेताओं के ज़रिए बनाई गई हुकूमत की हिमायत कर रही थी तब पार्टी को आर एस पूरा से अपने सदस्य को असैंबली से इस्तीफ़ा देने के लिए कहना पड़ा था ताकि वहां से पार्टी के सदर मुफ़्ती मुहम्मद सईद को असैंबली में भेजा जा सके।

कश्मीरी अवाम को भारत की मुख्यधारा से जोड़ने में मुफ़्ती सईद ने अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी। वो भारत के समर्थक होने के साथ रियासत की राजनैतिक पेचीदगियों को भी ख़ूब समझते थे। उन्हें मालूम था कि जम्मू, कश्मीर और लद्दाख अलग क़िस्म के हिस्से हैं। यहां की ज़बानें अलग-अलग हैं। यहां के खाने, लिबास ,रहन-सहन के तरीक़े अलग हैं। यहां तक कि इन इलाक़ों के इतिहास यहाँ की संस्कृतियाँ भी अलग-अलग हैं। ऐसे में तीनों को साथ लेकर चलना उनमें संतुलन क़ायम करना और सुनिश्चित करना कि सभी को इस का उचित अधिकार मिले काफ़ी संवेदनशील समस्याएँ हैं। 2014 में उन्होंने इस शक्ल को आसान करने के लिए बीजेपी के साथ मिलकर सरकार बनाई, जिसे देखकर सब चौंक गए थे। आम लोगों को यही लग रहा था कि ऐसा कैसे हो सकता है? या कैसे हो रहा है?

पर मुफ़्ती साहब सोच समझ कर बहुत इत्मीनान से काम करने वाले लोगों में रहे हैं। उन्हें किसी भी मुआमले में जल्दी नहीं होती थी। इस मसले पर भी उनकी सोच साफ़ थी। उनका मानना था कि अवाम के फ़ैसले की पूरी इज़्ज़त होनी चाहीए। उन्हें शायद ये भी लगा होगा कि अगर भाजपा के साथ मिलकर सरकार नहीं बनाई गई तो द्वेष बढ़ सकता है और टकराव की सूरत बनी रहेगी जो रियासत के हक़ में मुनासिब नहीं होगा। हालांकि उनके लिए ये फ़ैसला आसान नहीं था। गठबंधन बनाना वो भी भाजपा जैसी पार्टी के साथ! जिनके बारे में वादी के लोगों के ज़हन में कई सारी बातें थीं। मेरा ये मानना है कि भाजपा-पीडीपी गठबंधन मुफ़्ती साहब जैसे खुले मन के राजनेता की वजह से ही संभव हो सका।

प्रखर राजनैतिक दूरदर्शिता के स्वामी मुफ़्ती मुहम्मद सईद को तरक़्क़ी-पसंद, लोक नेता, कश्मीर की सियासत में इन्क़िलाबी तबदीलियां लाने वाली शख़्सियत के तौर पर हमेशा याद रखा जायेगा। उन्होंने रियासत में कांग्रेस को मज़बूत बनाकर नैशनल कान्फ़्रैंस की तकलीफें बढ़ा दी थीं। ये काम उन्होंने उस ज़माने में किया जब कांग्रेस का नाम लेना गुनाह समझा जाता था। कांग्रेस हाइ कमान को ये लगने लगा था कि कांग्रेस को लोकप्रिय बनाने में मुफ़्ती साहब की कोशिश का नहीं बल्कि उनकी पालिसीयों और क़ौमी रहनुमाओं की लोकप्रियता का हाथ है। मुफ़्ती सईद को कांग्रेस हाइकमान का ये रवैय्या पसंद नहीं आया। उन्होंने कांग्रेस से किनारा किया और जनता दिल में शामिल हो गए।

राजीवगांधी की अवधि के बाद जब विश्वनाथ प्रताप सिंह को देश का बागडोर मिला तो उन्होंने मुफ़्ती सईद की सलाहियतों और कश्मीर में उनकी लोकप्रियता को देखते हुए मुल्क का गृह मंत्री बनाकर मुसलमानों का विश्वास हासिल किया। मुफ़्ती सईद को देश का पहला मुस्लिम होम मिनिस्टर बनने की विशिष्टता हासिल है, जो वी पी सिंह की बदौलत मुम्किन हुआ। उनकी हुकूमत गिरने के साथ ही मुफ़्ती सईद से ये मन्सब छिन गया। कांग्रेस जिसने मुसलमानों के वोटों की वजह से लंबे अर्से तक मुल्क पर अपना वर्चस्व बनाए रखा वो कभी इस कुर्सी पर किसी मुस्लमान को बिठाने की हिम्मत नहीं कर सकी।

बाबरी मस्जिद विवाद की वजह से पूरे मुल्क में साम्प्रदायिक दंगे भड़क उठे थे। उस वक़्त वो महाराष्ट्र के दौरे पर गए थे, वहां के लोगों के मुताबिक़ मुफ़्ती साहिब ने महाराष्ट्र के 19 ज़िलों के दौरे के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय पर होने वाले ज़ुल्मों के ख़िलाफ़ बेबाक अंदाज़ में सरकारी आफ़िसरान से जवाब तलब किया। और उन्हें फटकार लगाईं, वहीं मुस्लिम तबक़ा को भी अमन अमान क़ायम रखने की हिदायत देने से पीछे नहीं रहे। वो शुरू से ही अम्न पसंद, रोशन ख़्याल मिज़ाज के थे। शांतिपूर्ण परिवेश की स्थापना पर वो हमेशा ज़ोर देते थे।

कश्मीर के अलाहिदगी पसंदों ने उनकी बेटी रूबिया सईद को 1989 में उनके गृह मंत्री रहते हुए अग़वा कर लिया था। शायद ये अपनी क़िस्म का पहला वाक़या होगा। इस के बाद ही कश्मीर में आतंकवाद के खेल ने ख़ूनी रंग इख़तियार किया। दहशतगर्दी के सबसे ख़राब दौर 1990 की शुरुआती दशक में उन्होंने जम्मू-कश्मीर के गांव-गांव में घूम कर लोगों को समझाया। वो आम नेताओं से अलग थे, उनका मानना था कि जो काम गोली से नहीं हो सकता वो बोली से हो सकता है। वादी-ए-कश्मीर में हर तबक़े से उनके रिश्ते अच्छे बने रहे।1999 में उन्होंने कांग्रेस से अलाहिदगी इख़तियार कर रियासती पार्टी पीडीपी क़ायम की। इसी के साथ एक नए मुफ़्ती मुहम्मद सईद का जन्म हुआ जिन्होंने सिर्फ अपने बलबूते पर कश्मीर में सियासत की और कश्मीर के सबसे महत्त्वपूर्ण राजनैतिक लीडरों में से एक बन गए। नैशनल कान्फ़्रैंस से नाराज़ लोगों की बड़ी तादाद उनके साथ आ गई। 2002 के चुनाव में 18 सीटें जीत कर कांग्रेस के मुक़ाबले वो पहली मर्तबा रियासत के मुख्यमंत्री बने।

मुफ़्ती सईद की सरकार के काल में अलगाववाद कभी बहुत बड़ा मसला नहीं रहा। उनकी छवि ऐसे गंभीर नेता की रही जो शिद्दत-पसंद राजनीति करने वाले अलगाववादी लीडरों से भी सद्भाव बना ले जाता था। 2002-05 के दौरान कांग्रेस के साथ गठबंधन में मुख्यमंत्री रहते हुए उनकी प्रशासनिक सक्षमता उभर कर सामने आई थी। मुक़ामी सियासत के साथ देश की राजनीति के साथ तालमेल बिठाने का उन्होंने बेहतरीन प्रदर्शन किया था। तब कितने ही बेगुनाह नौजवानों को रिहा कराकर सूबे में रोज़ी रोज़गार पैदा कर लोगों का यक़ीन जीता था। इस बार भी बीजेपी-पीडीपी सरकार बनी तो वज़ीर-ए-आला की हैसियत से उन्होंने कुछ ऐसे फ़ैसले लिए जिनसे उन पर अलगाववादियों के आगे झुकने का इल्ज़ाम लगा। लेकिन वो जानते थे कि रियासत के हक़ में क्या बेहतर है। इसलिए उन्होंने किसी की परवाह नहीं की। वो अपने फ़ैसलों पर क़ायम रहने वाले लोगों में रहे हैं। आम आदमी का पिछले लोक सभा और विधान सभा चुनावों में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लेना उन पर कश्मीरियों के भरोसे को ज़ाहिर करता है कि महज़ 16 बरसों में पीडीपी ने नैशनल कान्फ़्रैंस को आमने-सामने की टक्कर दी। 28 सीटें हासिल करके पीडीपी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी।

भारत-पाकिस्तान के बेहतर ताल्लुक़ात को वो रियासत की तरक़्क़ी के लिए ज़रूरी मानते थे। अटल जी दूरअंदेश कोशिशों से जब भारत-पाक के रिश्तों की बर्फ़ पिघली तो श्रीनगर मुज़फ़्फ़राबाद रोड खोलने का फ़ैसला हुआ। मुफ़्ती साहब ने श्रीनगर से मुज़फ़्फ़राबाद बस सर्विस को बहाल किया। 13 मार्च 2005 को जब उन्होंने अमन सेतु पर क़दम रखा तो उनकी ख़ुशी छुपाए नहीं छिप रही थी। 200 फुट लंबे इस पुल पर क़दम रखने वाले वो पहले सियासतदां थे। वो इस को कश्मीर के लिए नए दरवाज़े के आग़ाज़ के तौर पर देखते थे जिसमें भारत के साथ रहते हुए जम्मू-ओ-कश्मीर में सेल्फ-रूल (स्वराज) हो, जो न सिर्फ़ आज़ादी के जुनून को कम कर दे बल्कि जम्मू-व-कशमीर के विवाद के ख़ातमे का माध्यम बने। वो जहां ये मानते थे कि भारत पाक के रिश्तों का सुधरना जम्मू-व-कश्मीर के हक़ में है वहीं वो ये कहना भी नहीं भूलते थे कि जम्मू-व-कश्मीर को जो विशेष दर्जा भारत में है उसे कोई हानि नहीं पहुंचना चाहिए। अभी दफ़ा 370 को लेकर जो बहस चल रही थी उसमें उनकी राय साफ़ थी कि इस हक़ को छेड़ना उचित नहीं। बीजेपी के लीडरान कभी जोश में ऐसे बयान दे देते हैं जिससे बेवजह शक-ओ-शुबहात पैदा होते हैं। जम्मू-व-कश्मीर में मिली कामयाबी को वो अपना दायरा बढ़ाने के मौक़े की शक्ल में देखते हैं जबकि रियासत के हित में यही है कि वहां की मुक़ामी पार्टीयों को आगे रखा जाये।

दक्षिण कश्मीर के क़स्बा बज बहाड़ा के एक मज़हबी नेता मुफ़्ती ग़ुलाम मुहम्मद के घर में मुफ़्ती मुहम्मद सईद 12 जनवरी 1936 में पैदा हुए थे। मुफ़्ती ग़ुलाम मुहम्मद की आर्थिक हालत अच्छी नहीं थी न तो उनके पास ज़मीन जायदाद थी और न आमदनी का कोई माक़ूल ज़रीया। घर का ख़र्च उस रक़म से चलता था जो बच्चों को धार्मिक तालीम देने के बदले उनके वालिद को मिलती थी; इसलिए मुफ़्ती सईद को किसी कॉलेज या यूनीवर्सिटी में पढ़ने का ख़्याल भी दिल में लाना मुम्किन नहीं था, मगर उन को पढ़ने का शौक़ था। 1953 में उस वक़्त के मुख्यमंत्री बख़शी ग़ुलाम मुहम्मद से मिलकर उन्होंने तालीम हासिल करने के लिए स्कॉलरशिप दिए जाने की गुज़ारिश की, जिसको बख़शी साहब ने मंज़ूर कर लिया। उन्होंने अलीगढ़ मुस्लिम यूनीवर्सिटी से ग्रैजूएशन करने के बाद क़ानून की डिग्री हासिल की। लगभग इसी दौरान मुफ़्ती साहिब ने ये महसूस किया होगा कि कश्मीर में रह कर सिर्फ कश्मीर की बात न की जाये बल्कि सारे मुल्क की बात की जाये। इसी फ़िक्र ने उन्हें फ़र्श से अर्श पर पहुंचा दिया।

वो दाराशिकोह से प्रभावित थे; 17वीं सदी में दाराशिकोह ने बजबहाड़ा में बैठ कर उपनिषद् का तर्जुमा किया था। उसकी याद में वहां मुग़ल गार्डन बनाया गया था। मुफ़्ती साहब की ख़ाहिश थी कि इस गार्डन का पर्यटन स्थल के तौर पर विकास करें।

उन्हें ब्रिज खेलने का शौक़ था। जब भी दो-चार घंटे का वक़्त मिलता वो ब्रिज की टेबल पर जम जाते। ब्रिज खेलते वक़्त वो बहुत सुकून में रहते थे। इस दौरान सियासत की बात बिलकुल नहीं करते थे। वो ख़ूब गप्पे मारते, क़हवा पीते और कबाब खाते थे। आज के दौर में इस तरह के लोग बहुत कम रह गए हैं।

पीडीपी को खड़ा करने में महबूबा मुफ़्ती की ज़बरदस्त कोशिशें शामिल हैं। उन्होंने काफ़ी अरसे तक मुफ़्ती साहब के साथ काम किया है। पिछले कुछ बरसों से वो ज़्यादा व्यस्त रही हैं। उनका मुफ़्ती साहब से जुड़ाव भी गहरा रहा है। उम्मीद तो यही है कि वो रियासत में उन्हीं नीतियों को आगे बढ़ाएंगी। भाजपा-पीडीपी गठबंधन भी ज्यूँ का त्यूँ चलता रहेगा। अभी तक किसी भी सूत्र से इस के टूटने का इशारा नहीं मिला है। सूबे में राष्ट्रपति शासन जारी रहने से अभी गतिरोध बना हुआ है। सोनीया गांधी के मिलने और पीडीपी के मुज़फ़्फ़र हुसैन भट्ट के बयान से तबदीली के अनुमान लगाए जा रहे हैं; लेकिन हम तो यही उम्मीद करेंगे कि जो भी हो वो जम्मू-व-कश्मीर के अवाम के हक़ में बेहतर हो ताकि उनसे किए गए वाअदे पूरे हो सकें। जो भी करना है वो महबूबा मुफ़्ती को ही करना है क्योंकि मुफ़्ती मुहम्मद सईद जैसा अब दूसरा कहाँ मिलेगा?



مفتی سعیدکاگزرنا ایک قومی خسارہ ہے جس کی تلافی نہیں کی جاسکتی۔ وہ ان قدروں کے امین تھے جن میں رواداری، تعلقات اور رشتوں کو نبھانے کی روایت تھی۔اس پیڑھی کے وہ آخری رہنما ؤں میں سے تھے جنہیں نہرو وادی کہا جاتاہے ۔ مفتی صاحب خود کہتے تھے کہ ’’میں نہرو کے زمانے کا سیاست داں ہوں‘‘ اس سے یہ گمان نہیں ہونا چاہئے کہ انہیں نہرو کی ہربات سے اتفاق تھا بلکہ اس سے ان کی مراد سب کو ساتھ لے کر چلنا اور سب کا خیال رکھنا، ہر طبقہ کی بھاگیداری کو یقینی بنانا۔ عوامی فیصلوں کا احترام اوراپنی سرکار میں گوناگوںآرا کو جگہ دینی تھی اس سے ان کے مدبرو تجربہ کار سیاست داں ہونے کا علم ہوتا ہے۔

کئی مرتبہ تووہ یک طرفہ ہی مراسم کو نبھاتے ہوئے نظرآتے ہیں۔ اس میں ان کے سیاسی اختلاف روکاٹ نہیں بنتے۔ یہ خوبی نہرو کے علاوہ ارجن سنگھ، ڈاکٹر کرن سنگھ بی جے پی کے اٹل بہاری واجپیی، اڈوانی اور مدن لال کھورانہ میں بھی دکھائی دیتی ہے۔ بی جے پی کے ساتھ مل کر جموں کشمیر میں حکومت بنانا عوامی فیصلوں کے احترام کا ہی نتیجہ تھا۔

پانچ دہائی قبل مفتی سعید نے جب جموں وکشمیر کی سیاست میں قدم رکھا اس وقت شیخ عبداللہ کی طوطی بولتی تھی۔ ان کے بارے میں کہا جاتاتھا کہ وہ بجلی کے کھمبے کو بھی منڈیٹ دے دیں تووہ جیتے گا۔ مفتی صاحب نے اپنی سیاست کانگریس کے ساتھ شروع کی تھی۔ جموں وکشمیر میں اس وقت اس قومی پارٹی سے وابستہ افراد کو سماجی بائیکاٹ کا سامنا کرناپڑتا تھا۔ شیخ عبداللہ کانگریس کے لیڈران کو سرعام گٹرکا کیڑا کہاکرتے تھے۔ کئی دہائیوں تک مفتی صاحب نیشنل کانفرنس کے مقابلے میں کوئی الیکشن تونہیں جیت سکے لیکن شیخ عبداللہ کو چنوتی دیتے رہے۔ جب فاروق عبداللہ کی حکومت گرنے کے بعد کانگریس نیشنل کانفرنس کے 13باغیوں کے ذریعہ بنائی گئی حکومت کی حمایت کررہی تھی تب پارٹی کو آر ایس پورہ سے اپنے رکن اسمبلی کو استعفیٰ دینے کیلئے کہنا پڑاتھا تاکہ وہاں سے پارٹی کے صدر مفتی محمد سعید کو اسمبلی میں بھیجاجاسکے۔

کشمیری عوام کو بھارت کی مین اسٹریم سے جوڑنے میں مفتی سعید نے اپنی پوری زندگی لگادی۔ وہ بھارت کے حامی ہونے کے ساتھ ریاست کی سیاسی پیچیدگیوں کو بھی خوب سمجھتے تھے۔ انہیں معلوم تھا کہ جموں،کشمیر اورلداخ الگ قسم کے حصے ہیں۔ یہاں کی زبانیں الگ الگ ہیں۔ یہاں کے کھانے، لباس ،رہن سہن کے طریقہ الگ ہیں۔ یہاں تک کہ ان علاقوں کی تاریخ وتہذیب بھی الگ الگ ہے ۔ایسے میں تینوں کو ساتھ لے کر چلنا ان میں توازن قائم کرنا اوریہ یقینی بناناکہ سبھی کو اس کا مناسب حق ملے کافی حساس مسئلہ ہے۔2014میں انہوں نے اس شکل کو آسان کرنے کیلئے بی جے پی کے ساتھ مل کر سرکار بنائی، جسے دیکھ کر سب حیرت زدہ تھے۔ عام لوگوں کو یہی لگ رہا تھا کہ ایسا کیسے ہوسکتا ہے؟ یا کیسے ہو رہا ہے ۔مفتی صاحب سوچ سمجھ کر بہت اطمینان سے کام کرنے والے لوگوں میں رہے ہیں۔ انہیں کسی بھی معاملے میں جلدی نہیں ہوتی تھی۔ اس مسئلہ پر بھی ان کی سوچ صاف تھی۔ ان کا ماننا تھا کہ عوام کے فیصلے کی پوری عزت ہونی چاہئے۔ انہیں شاید یہ بھی لگاہوگا کہ اگر بھاجپا کے ساتھ مل کر سرکار نہیں بنائی گئی تو تلخی بڑھ سکتی ہے اورٹکراؤ کی صورت بنی رہے گی جو ریاست کے حق میں مناسب نہیں ہوگا۔ حالانکہ ان کے لئے یہ فیصلہ آسان نہیں تھا۔ گٹھ بندھن بنانا وہ بھی بھاجپا جیسی پارٹی کے ساتھ۔ جن کے بارے میں وادی کے لوگوں کے ذہن میں کئی ساری باتیں تھیں۔ میرا یہ ماننا ہے کہ بھاجپا۔پی ڈی پی گٹھ بندھن مفتی صاحب جیسے کھلے ذہن کے سیاست داں کی وجہ سے ہی ممکن ہوسکا۔

اعلیٰ سیاسی بصیرت کے حامل مفتی محمد سعید کو ترقی پسند عوامی رہنما، کشمیر کی سیاست میں انقلابی تبدیلیاں لانے والی شخصیت کے طورپر ہمیشہ یادرکھاجائے گا۔ انہوں نے ریاست میں کانگریس کو مضبوط بناکر نیشنل کانفرنس کیلئے شدید مشکلات کھڑی کی تھیں۔ یہ کام اس زمانے میں کیا جب کانگریس کا نام لینا گناہ سمجھا جاتا تھا۔ کانگریس قیادت کو یہ لگنے لگا کہ کانگریس کو مقبول بنانے میں مفتی صاحب کی کوشش کا نہیں بلکہ ان کی پالیسیوں اورقومی رہنماؤں کی مقبولیت کا ہاتھ ہے۔مفتی سعید کو کانگریس ہائی کمان کا یہ رویہ پسندنہیںآیا۔ انہوں نے کانگریس سے کنارہ کیا اور جنتا دل میں شامل ہوگئے۔ راجیوگاندھی کے زوال کے بعد جب وشوناتھ پرتاپ سنگھ کو ملک کا اقتدارملا توانہوں نے مفتی سعید کی صلاحیتوں اورکشمیرمیں ان کی مقبولیت کو دیکھتے ہوئے ملک کا وزیرداخلہ بناکر مسلمانوں کا اعتماد حاصل کیا۔ مفتی سعید کو ملک کا پہلا مسلم ہوم منسٹر بننے کا اعزاز حاصل ہے،جو وی پی سنگھ کی بدولت ممکن ہوا۔ ان کی حکومت گرنے کے ساتھ ہی مفتی سعید سے یہ منصب چھن گیا۔ کانگریس جو مسلمانوں کے ووٹوں کی وجہ سے لمبے عرصے تک ملک کے اقتدار پر قابض رہی وہ کبھی اس کرسی پر کسی مسلمان کو بٹھانے کی ہمت نہیں کرسکی۔

بابری مسجد تنازعہ کی وجہ سے پورے ملک میں فرقہ وارانہ فسادات رونما ہوئے تھے۔ اس وقت وہ مہاراشٹر کے دورے پر گئے تھے، وہاں کے لوگوں ے مطابق مفتی صاحب نے مہاراشٹر کے 19اضلاع کے دورے کے دوران اقلیتی فرقہ پر ہونے والے مظالم کے خلاف بے باکانہ انداز میں سرکاری افسران سے باز پرس کی۔اور ان کی سرزنش کی وہیں مسلم طبقہ کو بھی امن امان قائم رکھنے کی تلقین کر نے سے پیچھے نہیں رہے۔ وہ شروع سے ہی امن پسند، روشن خیال مزاج کے تھے۔ قیام امن ہمیشہ ان کی ترجیحات میں شامل رہا۔ کشمیر کے علاحدگی پسندوں نے ان کی بیٹی روبیہ سعید کو9 198میں ان کے وزیرداخلہ رہتے ہوئے اغواکرلیا تھا۔ شاید یہ اپنی نوعیت کا پہلا واقعہ ہوگا۔ اس کے بعد ہی کشمیر میں دہشت گردی کے کھیل نے خونین رنگ اختیارکیا۔ دہشت گردی کے سب سے خراب دور1990کی شروعاتی دہائی میں انہوں نے جموں کشمیر کے گاؤں گاؤں میں گھوم کر لوگوں کو سمجھایا۔ وہ روایتی رہنماؤں سے الگ تھے، ان کا ماننا تھا کہ جو کام گولی سے نہیں ہوسکتا وہ بولی سے ہوسکتا ہے۔ وادی کشمیر میں ہرطبقہ سے ان کے رشتے اچھے بنے رہے۔1999میں انہوں نے کانگریس سے علاحدگی اختیار کرریاستی پارٹی پی ڈی پی قائم کی۔ اسی کے ساتھ ایک نئے مفتی محمد سعید کا جنم ہوا، جنہوں نے صرف اپنے بل بوتے پر کشمیر میں سیاست کی اور کشمیر کے اہم ترین سیاسی لیڈروں میں سے ایک بن گئے۔ نیشنل کانفرنس سے ناراض افراد کی بڑی تعداد ان کے ساتھ آگئی۔2002کے انتخاب میں 18سیٹیں جیت کر کانگریس کے تعاون سے وہ پہلی مرتبہ ریاست کے وزیراعلیٰ بنے۔

مفتی سعید کے دور حکومت میں علیحدگی پسندی کبھی بہت بڑا مسئلہ نہیں رہا۔ ان کی شبیہ ایسے سنجیدہ رہنما کی رہی جو شدت پسند سیاست کرنے والے علیحدگی پسند لیڈروں سے بھی رابطہ بنالے جاتا تھا۔2002-05کے دوران کانگریس کے ساتھ گٹھ بندھن میں وزیراعلیٰ رہتے ہوئے ان کی انتظامی صلاحیت ابھرکرسامنے آئی تھی۔ مقامی سیاست کے ساتھ ملک کی راج نیتی کے ساتھ تال میل بٹھانے کا انہوں نے بہترین مظاہرہ کیا تھا۔ تب کتنے ہی بے گناہ نوجوانوں کو رہا کراکر صوبے میں روزی روزگار پیدا کرلوگوں کا یقین جیتا تھا۔ اس بار بھی بی جے پی۔ پی ڈی پی سرکار بنی تووزیراعلیٰ کی حیثیت سے انہوں نے کچھ ایسے فیصلے لئے جن سے ان پر علیحدگی پسندوں کے آگے جھکنے کا الزام لگا۔ لیکن وہ جانتے تھے کہ ریاست کے حق میں کیا بہتر ہے۔ اس لئے انہوں نے کسی کی پرواہ نہیں کی۔ وہ اپنے فیصلوں پر قائم رہنے والے لوگوں میں رہے ہیں۔ عام آدمی کا پچھلے لوک سبھا اور ودھان سبھا انتخابات میں بڑھ چڑھ کر حصہ لینا ان پر کشمیریوں کے اعتماد کو ظاہر کرتاہے کہ محض16برسوں میں پی ڈی پی نے نیشنل کانفرنس کو آمنے سامنے کی ٹکر دی۔28سیٹیں حاصل کرکے پی ڈی پی سب سے بڑی پارٹی بن کر ابھری۔

بھارت پاک کے بہترتعلقات کو وہ ریاست کی ترقی کیلئے ضروری مانتے تھے۔ اٹل جی دوراندیش کوششوں سے جب بھارت پاک کے رشتوں کی برف پگھلی تو سری نگر مظفرآباد روڈ کھولنے کا فیصلہ ہوا۔ مفتی صاحب نے سری نگر سے مظفرآباد بس سروس کو بحال کیا۔ 13مارچ2005کو جب انہوں نے امن سیتو پر قدم رکھا تو ان کی خوشی چھپائے نہیں چھپ رہی تھی۔ 200فٹ لمبے اس پل پر قدم رکھنے والے وہ پہلے سیاستداں تھے۔ وہ اس کو کشمیر کے لئے نئے باب کے آغاز کے طورپر دیکھتے تھے جس میں بھارت کے ساتھ رہتے ہوئے جموں و کشمیر میں’’سیلف رول‘‘(خودحکمرانی)ہو ۔ جونہ صرف آزادی کے جنون کو کم کردے بلکہ جموں وکشمیر کے تنازعہ کے خاتمے کا باعث بنے۔ وہ جہاں یہ مانتے تھے کہ بھارت پاک کے رشتوں کا سدھرنا جموں وکشمیر کے حق میں ہے وہیں وہ یہ کہنا بھی نہیں بھولتے تھے کہ جموں وکشمیر کوجو خصوصی درجہ بھارت میں ہے اسے کوئی نقصان نہیں پہنچناچاہئے۔ ابھی دفعہ370کو لے کر جو بحث چل رہی تھی اس میں ان کی رائے صاف تھی کہ اس حق کو چھیڑنا مناسب نہیں۔ بی جے پی کے لیڈران کبھی جوش میں ایسے بیان دے دیتے ہیں جس سے بے وجہ شک وشبہات پیدا ہوتے ہیں۔ جموں وکشمیر میں ملی کامیابی کو وہ اپنا دائرہ بڑھانے کے موقع کی شکل میں دیکھتے ہیں جبکہ ریاست کے ہت(مفاد) میں یہی ہے کہ وہاں کی مقامی پارٹیوں کوآگے رکھاجائے۔

جنوبی کشمیر کے قصبہ بج بہاڑہ کے ایک مذہبی رہنما مفتی غلام محمد کے گھر میں مفتی محمدسعید12جنوری1936میں پیدا ہوئے تھے۔ مفتی غلام محمد کی مالی حالت اچھی نہیں تھی نہ توان کے پاس زمین جائیداد تھی اورنہ آمدنی کا کوئی معقول ذریعہ۔ گھرکا خرچ اس رقم سے چلتا تھا جو بچوں کو دینی تعلیم دینے کے عوض میں ان کے والد کو ملتی تھی اس لئے مفتی سعید کو کسی کالج یا یونیورسٹی میں پڑھنے کا خیال بھی دل میں لانا ممکن نہیں تھا مگران کو پڑھنے کا شوق تھا۔1953میں اس وقت کے وزیراعلیٰ بخشی غلام محمد سے مل کر انہوں نے تعلیم حاصل کرنے کیلئے وظیفہ دےئے جانے کی گزارش کی جس کو بخشی صاحب نے منظور کرلیا۔ انہوں نے علی گڑھ مسلم یونیورسٹی سے گریجویشن کرنے کے بعدقانون کی ڈگری حاصل کی۔ غالباً اسی دوران مفتی صاحب نے یہ محسوس کیاہوگاکہ کشمیر میں رہ کر صرف کشمیر کی بات نہ کی جائے بلکہ سارے ملک کی بات کی جائے۔ اسی فکر نے انہیں فرش سے عرش پر پہنچادیا۔

وہ داراشکوہ سے متاثر تھے 17 صدی میں داراشکوہ نے بجبہاڑا میں بیٹھ کر اوپنشد کا ترجمہ کیا تھا ۔اس کی یاد میں وہاں مغل گارڈن بنایا گیا تھا مفتی صاحب کی خواہش تھی کہ اس گارڈن کو ٹوریسٹ پلیس کے طور پر ڈیولپ کریں ۔

انہیں برج کھیلنے کا شوق تھا۔ جب بھی دوچار گھنٹے کا وقت ملتا وہ برج کی ٹیبل پر جم جاتے۔ برج کھیلتے وقت وہ بہت سکون میں رہتے تھے۔ اس دوران سیاست کی بات بالکل نہیں کرتے تھے۔ وہ خوب گپے مارتے قہوا پیتے اورکباب کھاتے تھے۔ آج کے دور میں اس طرح کے لوگ بہت کم رہ گئے ہیں۔

پی ڈی پی کو کھڑا کرنے میں محبوبہ مفتی کی زبردست کوششیں شامل ہیں۔انہوں نے کافی عرصہ تک مفتی صاحب کے ساتھ کام کیا ہے۔ پچھلے کچھ برسوں سے وہ زیادہ سرگرم رہی ہیں۔ ان کا مفتی صاحب سے جڑاؤبھی گہرا رہا ہے۔ امید تویہی ہے کہ وہ ریاست میں انہیں نیتیوں کوآگے بڑھائیں گی۔ بھاجپا۔ پی ڈی پی گٹھ بندھن بھی جوں کا توں چلتا رہے گا۔ ابھی تک کسی بھی جانب سے اس کے ٹوٹنے کا اشارہ نہیں ملا ہے۔  صوبہ میں صدرراج جاری رہنے سے ابھی تعطل بناہوا ہے۔ سونیا گاندھی کے ملنے اور پی ڈی پی کے مظفرحسین کے بیان سے تبدیلی کی قیاس آرائیاں ہورہی ہیں لیکن ہم تویہی امید کریں گے کہ جو بھی ہو وہ جموں وکشمیر کے عوام کے حق میں بہتر ہو تاکہ ان سے کئے گئے وعدے پورے ہوسکیں۔ جو بھی کرنا ہے وہ محبوبہ مفتی کوہی کرنا ہے کیوں کہ مفتی محمد سعید جیسا اب دوسرا کہاں ملے گا-

X communalismX JammuX KashmirX Mehbooba MuftiX Mufti Mohammad SayeedX PakistanX peaceX separatismX terrorism

OBITUARY: One wishes follows in her father’s footsteps in governing Jammu & Kashmir

Sirf News needs to recruit journalists in large numbers to increase the volume of its reports and articles to at least 100 a day, which will make us mainstream, which is necessary to challenge the anti-India discourse by established media houses. Besides there are monthly liabilities like the subscription fees of news agencies, the cost of a dedicated server, office maintenance, marketing expenses, etc. Donation is our only source of income. Please serve the cause of the nation by donating generously.

Muzaffar Husain Ghazali
Lawyer by training, associate editor at Daily Urdu Net and editor at UNN India

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

- Advertisment -

Now

Columns

[prisna-google-website-translator]