एनपीए के फंदे में फंसी मुद्रा योजना

मुद्रा योजना अच्छी जरूर है, लेकिन कर्ज की ये राशि एनपीए न हो जाये, इसपर सरकार को विशेष ध्यान देना होगा

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केंद्र सरकार के चार साल पूरा होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी सरकार की तमाम सफलताओं का उल्लेख कर रहे हैं। इस क्रम में पिछले हफ्ते उन्होंने बहुचर्चित मुद्रा योजना के बारे में भी जानकारी दी। प्रधानमंत्री के मुताबिक अभी तक 12.78 करोड़ परिवारों को इस योजना के तहत छह लाख करोड़ रुपए का लोन दिया गया है। सबसे बड़ी बात ये है इन 12 करोड़ लोगों में से सवा तीन करोड़ लोग ऐसे हैं, जिन्होंने व्यवसाय करने के लिए पहली बार कर्ज लिया है। देखा जाए तो रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में केंद्र सरकार का ये एक बड़ा कदम है। इस योजना के तहत लोगों को सरकारी मदद से अपना उद्यम खड़ा करने का अवसर मिल रहा है। 2015 में जब इस योजना की शुरुआत की गई थी, तब बताया गया था की यह योजना रोजगार का एक प्रमुख विकल्प बनगी। जो आंकड़े अभी नजर आते हैं, उनसे भी यही पता चलता है की केंद्र सरकार को इस दिशा में बड़ी सफलता मिली है। लेकिन, अगर गहराई में जाकर इसका विश्लेषण किया जाये, तो पता चलता है की ये योजना अपेक्षित परिणाम तक नहीं पहुंच सकी है।

जो खबरें आ रही हैं, उसके मुताबिक अभी तक मुद्रा योजना के तहत दिये गये कर्ज में से 14,358 करोड रुपये एनपीए के रूप में तब्दील हो चुके हैं। यानी बैंकों की ओर से दी गयी इतनी बड़ी राशि के वापस आने की संभावना काफी कम हो गई है। मौजूदा समय में देश के अधिकांश बैंक वित्तीय जटिलताओं का सामना कर रहे हैं। गैर निष्पादित परिसंपत्तियां (एनपीए) बैंकों के लिए बड़ा सिरदर्द बनी हुई हैं। केंद्र सरकार लगातार एनपीए को न्यूनतम स्तर तक पहुंचाने की कोशिश कर रही है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) भी बैंकों को एनपीए को दो फीसदी के स्तर तक लाने का निर्देश देता रहा है। इस दिशा में काम भी हो रहा है और सरकार को कुछ सफलताएं भी मिली हैं। लेकिन, मुद्रा योजना के तहत हुआ 14,358 करोड रुपए का एनपीए इस समस्या को और बढ़ाने वाला है। यह इस बात का भी संकेत है कि बेरोजगारों को रोजगार उपलब्ध कराने वाली सरकार की यह महत्वाकांक्षी योजना बैंकों के लिए एक बड़ा सिरदर्द बनने जा रही है। एनपीए बढ़ने का एक असर ये भी हो सकता है कि आने वाले दिनों में बैंक इस योजना के तहत आवेदकों को कर्ज की राशि मुहैया कराने में आनाकानी शुरू कर दें। मुद्रा योजना के तहत हुए इस एनपीए के आंकड़े ने आरबीआई और वित्त मंत्रालय दोनों के समक्ष एक बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।

बैंकों की ओर से आरबीआई को बताया जा चुका है की एनपीए में अभी और बढ़ोतरी हो सकती है। परेशानी सिर्फ एनपीए की ही नहीं है। इससे स्वरोजगार का मसला भी जुड़ा हुआ है। लोगों को बैंकों से रियायती दर पर ऋण इसलिए दिया जा रहा है, ताकि वे स्वरोजगार योजना के तहत अपना उद्यम शुरू कर सकें, जिससे न केवल उन्हें रोजगार मिले, बल्कि वे खुद भी कुछ लोगों को रोजगार दे पाने में सक्षम हो सकें। इस योजना को तीन श्रेणियों में बांटा गया है। पहली शिशु श्रेणी के तहत पचास हजार रुपये तक का कर्ज दिया जाता है, दूसरी किशोर श्रेणी के तहत पांच लाख रुपये तक का और तीसरी तरुण श्रेणी के तहत पांच से दस लाख रुपये तक का कर्ज दिया जाता है। कुछ दिन पहले आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक तरुण श्रेणी में महज 1.3 फीसदी लोगों को ही पांच लाख या उससे अधिक की राशि का ऋण दिया गया है। शिशु श्रेणी के तहत इस योजना में सर्वाधिक 92 फीसदी लोगों को ऋण दिया गया है। स्वाभाविक रूप से पूछा जा सकता है कि पचास हजार रुपये तक के ऋण से आज के समय में कौन सा उद्यम खड़ा किया जा सकता है। इस राशि से ठेलियां जरूर लगाई जा सकती हैं। ये राशि फल और सब्जी का व्यवसाय करने के लिए या फिर पान या चाय दुकान आदि के लिए भी ठीक है, लेकिन ऐसे उद्यमों से स्वरोजगार प्राप्त करने वाला व्यक्ति किसी और को कैसे रोजगार दे सकेगा।

सवाल सिर्फ कर्ज लेकर नए कारोबार को शुरू करने का ही नहीं, बल्कि कारोबार को लगातार चलाते रहने का भी है। पचास हजार की कार्यशील पूंजी से कारोबार की शुरुआत तो की जा सकती है, लेकिन कारोबार को लंबे समय तक चलाने के लिए पूंजी की आवश्यकता हमेशा बनी रहती है। साफ है कि शिशु श्रेणी के तहत दिये गये पचास हजार रुपये तक के कर्ज से दीर्घकालिक उद्यम की स्थापना नहीं की जा सकती है। इसके लिए किशोर श्रेणी (पांच लाख तक) या तरुण श्रेणी के तहत दिये गये कर्ज ही महत्वपूर्ण हैं। एक बड़ी बात इस योजना के क्रियान्वयन में अनियमितताओं की भी है। मुद्रा योजना पूरी तरह से बैंकों के भरोसे छोड़ दी गई है। इस योजना के तहत कुछ बैंक कर्मचारियों की रिश्वतखोरी की बात अगर छोड़ भी दी जाये, तब भी लोन बांटने में भी काफी अनियमितता होने की बात सामने आ रही है। आरोप लगाया जा रहा है कि बड़े पैमाने पर बैंककर्मी अपने परिचितों को लोन बांट रहे हैं, जबकि जरूरतमंदों को टरकाया जा रहा है। इस योजना के तहत अगर ढंग से काम हो, तो भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले देश में बेरोजगारी की समस्या पर काफी काफी हद तक काबू पाया जा सकता है।

सरकार ने जिन 12.78 करोड़ लोगों को इस योजना के तहत ऋण दिया है, अगर वही अपना रोजगार चलाने में सफल हो जाएं, तो देश की लगभग 40 फीसदी आबादी लाभान्वित होगी। आने वाले दिनों में योजना अगर ठीक से चलती है तो यह भी कहा जा सकता है कि भारत में बेरोजगारी की समस्या का एक कारगर हल मिल गया है और धीरे-धीरे देश इस समस्या से पूरी तरह से मुक्त हो जाएगा। सरकार की नीयत साफ है, इस बारे में कोई शक नहीं है। कर्ज पाने वाले 12.78 करोड़ लोगों में से लगभग 9 करोड़ लाभार्थी महिलाएं हैं। यह अपने में बहुत उल्लेखनीय बात है। इसी तरह इस योजना में दिये गये कुल छह लाख करोड रुपए के कर्ज में 55 फीसदी कर्ज अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ा वर्ग के लोगों को दिये गये हैं। यह एक ऐसी योजना है, जो पिछड़े समाज को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता प्राप्त कर सकती है। इसमें कागजी प्रक्रिया भी काफी आसान रखी गयी है, ताकि लोग आसानी से कर्ज प्राप्त कर अपना व्यवसाय शुरू कर सकें।

परेशानी इस बात की है की इस योजना पर भी बेईमानों की नजर पड़ चुकी है। इस बेईमानी का ही नतीजा है कि इस राशि के तहत दिये गये कुल कर्ज का ढाई फीसदी यानी 14,358 करोड रुपया एनपीए हो चुका है। हालांकि ये भी कहा जा रहा है की छह लाख करोड़ में 14,358 करोड़ रुपये का एनपीए होना कोई बड़ी बात नहीं है। यदि बैंकों की कुल पूंजी और सकल एनपीए का अनुपात देखा जाए, तो उस हिसाब से मुद्रा लोन के एनपीए को बहुत बड़ा सिरदर्द नहीं कहा जा सकता। लेकिन, ये एनपीए ही इस बात का सबूत है की बड़ी संख्या में लोग इस राशि को चुकाने को लेकर गंभीरता नहीं दिखा रहे हैं या फिर उनका इस राशि को लौट आने का कोई इरादा ही नहीं है। एक बड़ी बात ये भी है कि सरकार के पास इस बात का कोई पुष्ट आंकड़ा भी नहीं है कि इस योजना के तहत कितने लोगों को रोजगार मिला। अभी यही माना जा रहा है कि जितने लोगों ने इस योजना के तहत कर्ज प्राप्त किया है, उतने लोगों को रोजगार मिल चुका है। लेकिन एक सच्चाई ये भी है कि सरकार की ओर से बैंकों को मुद्रा योजना के तहत कर्ज बांटने का टार्गेट दिया गया है। इस टार्गेट को पूरा करने के लिए कई बैंककर्मी अपने परिचितों को भी लोन दे रहे हैं। लोन की ऐसी राशि के एनपीए होने का खतरा अधिक होता है। और अगर ऐसा हुआ, तो ये बात बैंकों के लिए परेशानी की एक बड़ी वजह बन जायेगी। मुद्रा योजना अच्छी जरूर है, लेकिन कर्ज की ये राशि एनपीए न हो जाये, इसपर सरकार को विशेष ध्यान देना होगा।

SOURCEहिन्दुस्थान समाचार/ योगिता पाठक
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