यह भारत की विदेश नीति में आई गतिशीलता का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 21 मई को एक अनौपचारिक शिखर वार्ता के लिए रूस के तटवर्तीय नगर सोची गये। राजनय की इस नई शैली की शुरूआत पिछले महीने हुई थी जब चीन के वुहान शहर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एक अनौपचारिक वार्ता के लिए मिले थे।

राष्ट्रपति पुतिन ने हाल ही में चौथी बार रूस के राष्ट्रपति का दायित्व ग्रहण किया है हालांकि अगले कुछ दिनों में कई बार मोदी और पुतिन की भेंट होने वाली है। कुछ महीने में पुतिन वार्षिक शिखर वार्ता के लिए भारत आने वाले हैं। उससे पहले और कई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर दोनों नेताओं की भेंट होने वाली है। इसके बावजूद यह आवश्यक समझा गया कि बदलती अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में परस्पर दृष्टिकोण समझने के लिए दोनों नेता अनौपचारिक शिखर वार्ता करें।

भारत और रूस के बीच रणनीतिक सहयोग के सिलसिले में पिछले दो महीने में कई बार बात हुई है। इस संबंध में राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल और विदेश सचिव विजय गोखले की अपने समकक्ष रूसी अधिकारियों से रूस में वार्ताएं हुई थीं। उन्हीं वार्ताओं के दौरान मोदी और पुतिन के बीच एक अनौपचारिक शिखर वार्ता का प्रस्ताव आया और राष्ट्रपति पुतिन के निमंत्रण पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के सोची नगर जाना स्वीकार कर लिया।

इस शिखर वार्ता की पृष्ठभूमि में अमेरिका द्वारा रूस की उन कंपनियों पर लगाए गए आर्थिक प्रतिबंध हैं जिनसे हम अपनी रक्षा सामग्री खरीदते हैं। पिछले महीने छह अप्रैल को अमेरिका ने रूस की 39 कंपनियों के विरुद्ध कार्रवाई करते हुए उनके साथ किसी तरह के सहयोग और लेनदेन पर पाबंदी लगा दी थी। इनमें रूस सरकार की हथियार निर्यात करने वाली कंपनी रोजो बोरोन एक्सपोर्ट भी शामिल है जिसने भारत से कई रक्षा सौदे कर रखे हैं। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण यह सौदे खटाई में पड़ सकते हैं क्योंकि जिन बैंकों और वित्तीय संस्थाओं का अमेरिका में कारोबार है, वे रूस को प्रतिबंधों के कारण भुगतान में हिचकिचाहट दिखा रही हैं।

भारत अपनी रक्षा जरूरतों की काफी खरीद रूस से करता है। पिछले कुछ समय से उसने अमेरिका सहित अन्य कई देशों से भी हथियार खरीदने शुरू किए हैं। फिर भी वह अपनी पुरानी खरीद के कल-पुर्जों के लिए और अत्याधुनिक हथियारों के लिए रूस पर निर्भर है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण पांच एस 400 ट्रियंफ एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम की खरीद है। यह चार सौ किलोमीटर के दायरे में शत्रुओं की तरफ आने वाले अदृश्य लड़ाकू जहाजों, मिसाइलों और द्रोण को आकाश में ही समाप्त करने में समर्थ है। भारत साढ़े पांच अरब डाॅलर खर्च करके ये हथियार रूस से खरीद रहा है और इसके लिए बातचीत अंतिम चरण में है।

इसी तरह भारत रूस से चार अरब डाॅलर कीमत की अदृश्य बनी रहने वाली चार फ्रिगेट खरीद रहा है। एक अरब डाॅलर के दो सौ कामोव टी हल्के हेलीकाॅप्टर खरीदने और फिर उनका संयुक्त उत्पादन करने पर भी बात आगे बढ़ी है।

भारत रूस से डेढ़ अरब डाॅलर की नाभिकीय क्षमता से संपन्न पनडुब्बी आईएनएस चक्र पाने की कोशिश भी कर रहा है। रूस की कंपनियों पर अमेरिका द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का भारत की रक्षा तैयारी पर जो प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, उसकी स्वयं अमेरिका में भी आलोचना हो रही है। उसके अनेक राजनीतिज्ञों और रक्षा विशेषज्ञों ने कहा है कि एक तरफ अमेरिका भारत को अपना रणनैतिक सहयोगी घोषित कर रहा है और चीन की सामरिक शक्ति को संतुलित करने में उसकी महत्वपूर्ण भूमिका देखता है; दूसरी तरफ वह अपने कामों से उसकी सामरिक तैयारी में बाधाएं खड़ी कर रहा है। ठीक यही विचार अमेरिका के रक्षामंत्री जिम माटिस ने व्यक्त किए हैं। उन्होंने कहा है कि अमेरिकी प्रतिबंधों से भारत जैसे देशों को छूट दी जानी चाहिए। अगर अमेरिका ऐसा नहीं करता तो वह अपना ही नुकसान कर रहा होगा। भारत ने भी अपने राजनयिक सूत्रों से अमेरिका पर दबाव डालने की कोशिश की है। लेकिन अगर अमेरिकी निर्णय नहीं बदलता तो उसे ऐसे अन्य तरीके खोजने होंगे जिनसे भारत और रूस के बीच के रक्षा सौदों पर आंच न आए।

नरेंद्र मोदी सरकार भारत की रक्षा तैयारी को लेकर कोई ढील नहीं देना चाहती। इसलिए रूस के साथ मिलकर वैकल्पिक रणनीति पर उच्चस्तरीय बात की जा रही है।

भारत की दूसरी चिंता अमेरिका द्वारा ईरान से 2015 में हुए नाभिकीय समझौते से अपने हाथ खींच लेना है। इस समझौते में ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, रूस और चीन भी शामिल थे। अब तक अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के इस निर्णय की सभी ने आलोचना की है। अमेरिका को छोड़कर अन्य सभी देश इस समझौते को जारी रखना चाहते हैं। समझौते से हाथ खींचने के बाद अमेरिका ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंधों की घोषणा करने वाला है। उससे भारत पर भी बहुत प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। ईरान हमारी खनिज तेल संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने वाला तीसरा बड़ा देश है।

इसके अलावा भी ईरान और भारत के बीच महत्वपूर्ण रणनीतिक सहयोग है। भारत ने हाल ही में ईरान की चाबहार बंदरगाह के एक बड़े हिस्से का निर्माण पूरा किया है। चाबहार बंदरगाह हमारे लिए अफगानिस्तान का द्वार है। इसके अलावा भी वह मध्य-पूर्व और मध्य-एशिया में हमारी पहुंच आसान बनाने का माध्यम है। भारत चाबहार क्षेत्र में एक औद्योगिक तंत्र खड़ा कर रहा है। इस औद्योगिक क्षेत्र में भारत की अनेक बड़ी कंपनियां साझीदार हैं। इस सिलसिले में भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच तो त्रिपक्षीय समझौते हुए ही हैं।

भारत, ईरान और रूस परस्पर सहयोग से एक उत्तर-दक्षिण गलियारे के विकास में लगे हैं। इस योजना के अंतर्गत ईरान और अफगानिस्तान से लगाकर उत्तरी यूरोप तक यातायात के आधुनिक तंत्र का विकास किया जा रहा है। इस परियोजना का काफी काम पूरा हो चुका है। यह परियोजना इस क्षेत्र में व्यापार की संभावनाएं काफी बढ़ा देगी। लेकिन अगर अमेरिका ईरान पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध लगाता है तो यह सभी परियोजनाएं प्रभावित होंगी। इन सब परिस्थितियों को लेकर भारत और रूस की चिंताएं समान हैं। मध्य-पूर्व की राजनीति में यों भी रूस ईरान का साथ दे रहा है। भारत बिना मध्य-पूर्व की राजनीति में पड़े अपने हितों की रक्षा चाहता है। पिछले दिनों रूस की विदेश नीति में जो परिवर्तन हुए हैं, उन्हें लेकर भी भारत में कुछ चिंता रही है। तेल के अंतरराष्ट्रीय दामों में कमी का असर रूस की अर्थव्यवस्था पर पड़ा था क्योंकि वह तेल और हथियारों के निर्यात पर काफी निर्भर रहती है।

इस बीच चीन और रूस की निकटता बढ़ी और चीन ने रूस से हथियारों की काफी खरीद की। भारत जिस मिसाइल कवच को रूस से पाने की कोशिश कर रहा है, उसे चीन कई वर्ष पहले खरीद चुका है। चीन के प्रभाव में रूस ने पाकिस्तान से भी कुछ निकटता बढ़ाई। यद्यपि वह निरंतर यह कहता रहा है कि भारत से उसके संबंध बहुत गहरे हैं और उन पर किसी तरह की आंच नहीं आने दी जाएगी। लेकिन इस पूरे क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान से उसका बढ़ता सहयोग भारत के लिए कुछ असुविधा पैदा करता रहा है। इसके साथ ही साथ मध्य-पूर्व की राजनीति दो स्पष्ट खेमों में विभाजित होती जा रही है। रूस जिस तरह सीरिया के राष्ट्रपति असद की पीठ पर हाथ रखे हुए है और सऊदी अरब और ईरान की प्रतिद्वंद्विता में खुलकर ईरान का साथ दे रहा है, उससे इस पूरे क्षेत्र में ध्रुवीकरण और तनाव बढ़ता जा रहा है। उसके कारण भी ट्रम्प प्रशासन अधिक आक्रामक मुद्रा अपनाने के लिए मजबूर हुआ है।

अगर मध्य-पूर्व में ध्रुवीकरण और टकराव बढ़ता है तो उस का काफी प्रतिकूल असर भारत पर पड़ने वाला है। भारत अपनी ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं के लिए काफी कुछ इस क्षेत्र पर निर्भर है। साथ ही यह टकराव बढ़ता है, तो इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की आपूर्ति प्रभावित होगी और उससे तेल के दाम और बढ़ेंगे। उसका भी भारतीय अर्थव्यवस्था पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। भारत जानता है कि इन उलझती जा रही परिस्थितियों का कोई आसान हल नहीं है। एक तरफ भारत और अमेरिका के बीच सहयोग बढ़ा है; दूसरी तरफ इस पूरे क्षेत्र में भारत रूस के साथ अपने रणनीतिक हितों की भी उपेक्षा नहीं कर सकता। अभी केवल इतना ही किया जा सकता है कि सहयोगी देश एक-दूसरे के रणनैतिक दृष्टिकोण को समझें और अपनी विदेश नीति स्थिर करते समय यथासंभव एक-दूसरे के राष्ट्रीय हितों का ध्यान रखें।

इन सब पर बात करने का सबसे अच्छा तरीका एक अनौपचारिक शिखर वार्ता ही हो सकता था क्योंकि उसमें कोई औपचारिक समझौते नहीं किए जाते। केवल एक-दूसरे के दृष्टिकोण को समझा जाता है। रूस हमारा पुराना सहयोगी है और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत और रूस एक-दूसरे के महत्व को जानते हैं। इसलिए इस शिखर वार्ता का महत्व कम करके नहीं आंका जा सकता।