Sunday 24 October 2021
- Advertisement -
HomeViewsArticleजनप्रतिनिधियों को मोदी की नसीहत के मायने

जनप्रतिनिधियों को मोदी की नसीहत के मायने

नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री हैं, जो जनता से संवाद का एक भी मौका हाथ से जाने नहीं देते। ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उन्होंने हमेशा देश को आगे ले जाने की ही बात की है। अपनी विदेश यात्राओं के जरिए भी उन्होंने देश का नाम ही बढ़ाया है। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से विपक्ष की घबराहट स्वाभाविक भी है

|

किसी की भी आलोचना आसान है, लेकिन आलोचना का स्तर बनाए रखना बेहद कठिन है। आलोचना सबके बस की चीज नहीं है। यह व्यक्ति के विवेक, ज्ञान, संवेदनशीलता और धैर्य की परीक्षा है। इस कसौटी पर जो खुद को कस सके, वही आलोचना करने का वास्तविक अधिकारी है। यही सिद्धांत राष्ट्र और प्रदेश के हितों से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करने के मामले में भी लागू होता है। केंद्रीय राज्यमंत्री संतोष कुमार गंगवार ने कहा है कि इतने बड़े देश में दुष्कर्म की एक-दो घटनाएं अगर हो जाती हैं तो उसे बात का बतंगड़ नहीं बनाना चाहिए। देखा जाए तो उनकी राय गलत नहीं है, लेकिन मीडिया ने इसे आपत्तिजनक संदर्भों में देखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शब्दों में बलात्कार सिर्फ बलात्कार है। वह किसी भी स्वरूप में हो, किसी के साथ भी किया गया हो, निंदनीय है। बलात्कार को रोकने और खासकर छोटी बच्चियों के साथ दुष्कर्म को नियंत्रित करने के लिए पाॅक्सो एक्ट में संशोधन किया गया है। इसमें फांसी देने का प्रावधान किया गया है।

संसद की हरी झंडी के बाद राष्ट्रपति की ओर से भी पाॅक्सो एक्ट में संशोधन पर अपनी सहमति प्रदान कर दी है। मतलब सरकार को भी बच्चियों, युवतियों और महिलाओं की सुरक्षा की चिंता है। मीडिया को किसी मंत्री के बयान में आपत्तिजनक तलाशने की बजाय कानून के अनुपालन में अगर कोताही हो रही हो तो उस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। इस तरह की घटनाओं को नियंत्रित करने की दिशा में समाज को जागरूक करने का काम करना चाहिए। लेकिन मीडिया में ‘आसमान गिर रहा है’ की आशंका वाली खबरें जरूरत से अधिक स्थान पा रही हैं। इसे भी क्या आलोचना के गिरते स्तर के आलोक में देखा जाना चाहिए? शायद हां। प्रधानमंत्री केंद्र में अपनी सरकार बनने के दिन से महिलाओं के सम्मान को लेकर चिंतित हैं। गांव-गांव, शहर-शहर शौचालय बनाने की योजना का उद्देश्य स्वच्छता तो है ही, बहन-बेटियों और माताओं की सुरक्षा भी है। यह शायद पहली सरकार है, जिसने व्यापक स्तर पर शौचालय निर्माण के अभियान को गति दी है। लाल किले की प्राचीर से भी वे इस संबंध में चिंता जाहिर कर चुके हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 22 अप्रैल को ‘नमो एप’ के जरिए एक बार फिर चुनिंदा सांसदों और विधायकों से मिले। इससे पहले 11 अप्रैल को भी उन्होंने सांसदों और विधायकों से बात की थी। उन्होंने सांसदों विधायकों को जो नसीहत दी है, अगर उसपर अमल हो तो इस देश को बहुत आगे तक ले जाया जा सकता है।

नरेंद्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री हैं, जो जनता से संवाद का एक भी मौका हाथ से जाने नहीं देते। ‘मन की बात’ कार्यक्रम में उन्होंने हमेशा देश को आगे ले जाने की ही बात की है। अपनी विदेश यात्राओं के जरिए भी उन्होंने देश का नाम ही बढ़ाया है। उनकी बढ़ती लोकप्रियता से विपक्ष की घबराहट स्वाभाविक भी है। इधर उन्होंने अपने सांसदों, विधायकों और यहां तक की पार्टी पदाधिकारियों को देश और प्रदेश के मुद्दों पर अपनी राय देने से बचने की नसीहत भी दी है। विषय की मुकम्मल तैयारी न होने की वजह से भाजपा नेता बहक जाते हैं और मीडिया की आलोचना के आसान शिकार बन जाते हैं। विपक्ष को भी इस बहाने केंद्र सरकार को घेरने का अवसर मिल जाता है। इस लिहाज से देखा जाए तो प्रधानमंत्री की यह सलाह व्यावहारिक भी है। ‘सौ वक्ता एक चुप हरावै’ की इस देश में बहुत पुरानी कहावत है। ऐसे विषयों पर अगर जिम्मेदार लोग ही बोलें तो ज्यादा मुनासिब होता है। प्रधानमंत्री एक तरह से लोक शिक्षण ही नहीं, जनप्रतिनिधियों के भी शिक्षण का मौलिक कार्य कर रहे हैं। बातें बहुत छोटी हैं लेकिन उनका असर गंभीर होता है। इसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दूरदर्शी नेता हैं। भाजपा से जुड़े हैं, इस नाते भाजपा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता अधिक हो सकती है लेकिन जननेता होने के नाते जनता के हितों की चिंता उन्हें पार्टी से भी अधिक है। वे व्यवस्था के हर कील-कांटे दुरुस्त कर रहे हैं और ऐसा करने में समय तो लगता ही है। जब कोई सांसद उनसे यह जानना चाहता है कि कौशल विकास के जरिए आजीविका के साधन कैसे बढ़ सकते हैं तो वे महिलाओं के छोटे-छोटे उद्यमों के उदाहरण देते हैं।

उनका मानना है कि अपने उद्यम लगाकर स्वावलंबी बना जा सकता है और अपने जैसे कई लोगों को रोजगार भी दिया जा सकता है। पिछले दिनों पकौड़ा तलने और बेचने को भी रोजगार की संज्ञा देने के उनके भाषण को मीडिया ने भी सतही तौर पर लिया था और कई राजनीतिक दलों ने तो इसके विरोध में पकौड़ा भी तला, लेकिन पकौड़े तलकर या बेचकर अपना परिवार चलाने वाले कारोबारियों की ओर किसी का ध्यान नहीं गया। उत्तर प्रदेश सरकार ‘एक जिला-एक उत्पाद योजना’ को प्रोत्साहित कर रही है। उसका मकसद कुटीर उद्योग को बढ़ावा देना है। जो कुटीर उद्योग यहां के लोगों की हीन भावना के शिकार हो गए और उस पर चंद पूंजीपतियों ने रणनीतिपूर्वक कब्जा कर लिया, उन्हीं कुटीर उद्योगों को नए सिरे से स्थापित करना साहस का काम तो है ही। नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने सांसदों और मंत्रियों से अपील की कि वे एक गांव को गोद लें। उसे विकसित कर माॅडल गांव बनाएं। उन्होंने सांसदों, मंत्रियों और विधायकों को क्षेत्र में जाने, लोगों को सरकारी योजनाओं के प्रति जागरूक करने की भी सलाह दी। इस शासन में कम से कम इतना तो हुआ ही है कि शासकीय योजनाएं पत्रावलियों तक ही सिमटकर नहीं रह रही हैं। जनता को उनके बारे में पता भी चल रहा है। यह अलग बात है कि जिस तेजी से यह काम होना चाहिए था, वैसा अभी नहीं हुआ है। इसमें और अधिक तेजी लाने की जरूरत है। सांसदों से बातचीत के क्रम में उन्होंने मातृशक्ति से जुड़ने की जरूरत पर बल दिया है। वह छोटे-छोटे समूह बनाती हैं। कुछ महिलाएं जो स्वयं सहायता समूह चलाती हैं, वह छोटे-छोटे काम कर आत्मनिर्भर बनती हैं। उन्होंने सांसदों को सलाह दी कि वे क्षेत्र के कौशल विकास पर जोर दें जिससे महिलाएं आत्मनिर्भर बनें। बच्चों के लिए पढ़ाई, युवाओं के लिए कमाई, बुजुर्गों के लिए दवाई की चिंता भी उन्होंने की। गरीब आदमी बैंक का पैसा नहीं रखता है वह समय पर लौटाता है,यह कहकर उन्होंने गरीबों का मान भी बढ़ाया है। गरीबों को बैंक ऋण देने में तमाम नखरेबाजी करते हैं। बैंकों का पैसा तो पूंजीपति ही मारते हैं। इस पर प्रधानमंत्री की चिंता बैंकों को भी अपनी सोच बदलने पर विवश करेगी, इसमें कहीं कोई संदेह नहीं है।

प्रधानमंत्री की इस बात में दम है कि किसान भाषण देने से से नहीं बदलता, वह देखकर बदलता है। सांसदों और विधायकों को किसानों के बीच जाना चाहिए और उन्हें खेती-किसानी की नई तकनीकी से अवगत कराना चाहिए। उसे कार्यशाला में बताएं कि खेती से आमदनी कैसे बढ़ सकती है। गांव के जो बच्चे कृषि की पढ़ाई कर रहे हैं वे छुट्टियों में किसानों को खेती के नए तौर-तरीके बताएं। सांसद-विधायक भी किसानों के बीच यह प्रचार करें कि भारत सरकार ने स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट को लागू कर दिया है। इससे किसानों को उनकी उपज का सही मूल्य मिल सकेगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सोच हमेशा इस बात की रही है कि जनता के बीच जाकर ही हम उनकी समस्याओं को जान सकते हैं और उनके निदान की रणनीति बना सकते हैं। प्रधानमंत्री की नसीहत को विपक्ष 2019 की तैयारियों के क्रम में भी देख सकता है लेकिन इससे पूर्व इस तरह की सोच को गति देने का काम किसी भी सरकार के स्तर पर नहीं हुआ, इस बात को तो स्वीकारना ही होगा।

हिन्दुस्थान समाचार/सियाराम पांडेय ‘शांत’

Sirf News needs to recruit journalists in large numbers to increase the volume of its reports and articles to at least 100 a day, which will make us mainstream, which is necessary to challenge the anti-India discourse by established media houses. Besides there are monthly liabilities like the subscription fees of news agencies, the cost of a dedicated server, office maintenance, marketing expenses, etc. Donation is our only source of income. Please serve the cause of the nation by donating generously.

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

- Advertisment -

Now

Columns

[prisna-google-website-translator]