रूस से संबंधों की एक और जंग जीत आए मोदी

मोदी की इस यात्रा से चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के निर्माण और इसके जरिए एशिया, अफ्रीका और यूरोप में कारोबार बढ़ाने की रणनीति को भी झटका लगना लगभग तय है

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कर्नाटक की सियासी जंग के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संबंधों की जंग जीतने रूस पहुंचे भी और लौट भी आए। यह यात्रा भले ही अल्पकालिक रही हो, लेकिन इसके प्रभाव दीर्घकालिक होंगे, इसमें कोई संदेह नहीं है। मेल-मिलाप से ढेरों भ्रांतियां दूर हो जाती हैं। नरेंद्र मोदी की यात्रा ने भी भारत और रूस के बीच संबंधों को मजबूती व मधुरता प्रदान की। अमेरिका से भारत की बढ़ती नजदीकी से रूस की दुष्चिंताओं का बहुत हद तक निवारण हुआ है कि भारत कल भी उसके साथ था, आज भी है और आगे भी रहेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोनों देशों के बीच की अटूट साझेदारी का जिक्र कर संबंधों पर दृढ़ विश्वास की मुहर भी लगाई है। इसमें संदेह नहीं कि अमेरिका और रूस के बीच छत्तीस के संबंध रहे हैं। लंबे समय से यह स्थिति है। रूस का स्पष्ट मानना है कि सोवियत संघ के विभाजन में अमेरिकी दुरभिसंधि ही बहुत हद तक जिम्मेदार रही है। ऐसे में उनसे संबंध रखने वाला देश तो खटकेगा ही। रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन को देर से ही सही, यह बात समझ में आ गई है कि भारत से कटे रहने या फिर उससे रंजिश रखने में रूस को कोई फायदा नहीं है।

शायद यही वजह रही कि शपथ लेने के दो सप्ताह बाद ही उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से संपर्क साधा और उन्हें रूस के सोची आने का न्यौता दिया। उनसे विभिन्न मुद्दों पर वार्ता की इच्छा जाहिर की। वे खुद भी भारत आना चाहते हैं। मतलब वार्ता का यह सिलसिला न केवल तेज होना है, बल्कि इस मंथन का श्रेष्ठ परिपाक भी प्राप्त करना है। मोदी और पुतिन की इस मुलाकात पर सबकी नजर रही है। इस यात्रा ने पाकिस्तान की पेशानी पर बल जरूर ला दिए हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस वार्ता का मजमून जानने के लिए उत्सुक हो रहे होंगे। चीन और रूस वैचारिक स्तर पर एक दूसरे के नजदीक हैं लेकिन भारत को लेकर जहां चीन का नजरिया परेशान करने वाला रहा है और अरुणाचल प्रदेश में उसकी निर्माण गतिविधियां आज भी भारत के लिए चिंता का सबब है, वहीं रूस भारत का पहले भी सहज सहयोगी था और आज भी है। भारत की अमेरिका से बढ़ती नजदीकी के मद्देनजर रूस अलबत्ते पाकिस्तान को कुछ ज्यादा ही भाव देने लगा था।

उसने तो उसके साथ युद्धाभ्यास भी किया था, लेकिन मोदी ने पुतिन से संबंधों को मजबूती देकर पाकिस्तान को एक बार फिर सहयोग की दुनिया से अलग कर दिया है। 27-28 अप्रैल को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बुहान में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से वार्ता की भी पूरी दुनिया में चर्चा हुई थी। भारत और रूस के शीर्ष नेताओं की इस मुलाकात से दोनों देशों का कारोबार तो बढ़ेगा ही, पाकिस्तान पर भी प्रभावी दबाव बनेगा। भारत-पाक संबंधों को सुधारने के लिहाज से जहां भारत ने आतंकवादियों के खिलाफ सैन्य कार्रवाई पर रोक लगा रखी है, वहीं पाकिस्तान उसकी सहिष्णुता का बेजा लाभ उठाते हुए निरंतर गोलीबारी कर रहा है। सैन्य चौकियों और नागरिक ठिकानों पर मोर्टार दाग रहा है। मोदी और पुतिन की यह यात्रा पाकिस्तान पर मानसिक दबाव डालने का काम करेगी, यह उम्मीद तो की ही जा सकती है। जुलाई 2015 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उफा में आयोजित सातवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन और शंघाई कोऑपरेशन ऑर्गेनाइजेशन में शिरकत की थी। दिसंबर 2015 में मोदी-पुतिन की 16वें भारत-रूस सम्मेलन में औपचारिक बातचीत हुई थी। दोनों देशों के बीच इस दौरान रक्षा और परमाणु समेत 16 समझौतों पर हस्ताक्षर भी हुए थे। जून 2017 में मोदी ने पाकिस्तान और आतंकवाद के मुद्दे पर पुतिन से बात की थी। मोदी और पुतिन की मुलाकात का लाभ दोनों देशों के कारोबार को भी हो सकता है। भारत और रूस के बीच पिछले साल तक 7.8 अरब डॉलर का कारोबार था। इसमें 2014 की तुलना में कमी आई। तब यह 10 अरब डॉलर था। दोनों देश 2022 तक व्यापार को 30 अरब डॉलर तक पहुंचाने की अवधारणा पर काम कर रहे हैं। यह एक सुखद संकेत है।

मोदी की सोची यात्रा के और भी बहुत सारे राजनीतिक और कूटनीतिक मायने हैं। समझा जा सकता है कि इस मुलाकात में रूस और भारत के ईरान से संबंधों पर भी विमर्श हुआ है। बकौल नरेंद्र मोदी, राष्ट्रपति पुतिन ने द्विपक्षीय संबंधों में वार्ता के नए पहलू को जोड़ा है। यह भरोसा कायम करने का बड़ा अवसर है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और राष्ट्रपति पुतिन ने 2001 में सामरिक साझेदारी का जो बीज बोया था, आज वह विशेषाधिकार प्राप्त सामरिक साझेदारी में बदल गया है। आठ देशों के शंघाई को-ऑपरेशन आर्गेनाइजेशन में भारत को स्थायी सदस्यता दिलाने में रूस के सहयोग के प्रति भी उन्होंने ब्लादिमिर पुतिन का आभार माना है। दूसरी ओर, पुतिन ने भी इस बात को स्वीकार किया है कि मोदी के दौरे से दोनों देशों के संबंधों में नया उत्साह आया है। भारत और रूस ने हमेशा उच्च स्तरीय सामरिक साझेदारी बरकरार रखी है।

मोदी की इस यात्रा से चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के निर्माण और इसके जरिए एशिया, अफ्रीका और यूरोप में कारोबार बढ़ाने की रणनीति को भी झटका लगना लगभग तय है। इसके विपरीत भारत-रूस समेत कई देश 7200 किलोमीटर लंबे इंटरनेशनल नॉर्थ साउथ ट्रांसपॉर्ट कॉरिडोर पर काम कर रहे हैं। यह जलपोत, रेल और सड़क मार्ग का नेटवर्क है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ईरान परमाणु करार से पीछे हटने के बाद हालात बदले हैं। ईरान पर प्रतिबंध लगा तो वह निर्यात रोक सकता है। इससे भारत को फारस की खाड़ी से होने वाला निर्यात प्रभावित होगा। चाबहार पोर्ट का काम भी प्रभावित होगा। रूस चाहे तो ट्रंप पर इस बावत दबाव बना सकता है। रूस और भारत के मैत्री संबंधों को भारत में रूस के सहयोग से बन रहे कुडनकुलम में 6 परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के रूप में देखा जा सकता है। 2030 तक रूस की मदद से भारत में इस तरह के 18 संयंत्र लगने हैं। अमेरिका और चीन के बाद भारत तेल और गैस का सबसे अधिक आयात करता है। रूस से भी उसे तेल और गैस का निर्यात होता है। रूस, भारत को वायु प्रतिरक्षा मिसाइल प्रणाली दे रहा है। रूस से परमाणु पनडुब्बी लीज पर लेने की भी भारत की चाहत है। रूस से 40 हजार करोड़ रुपए की लागत पर वायु प्रतिरक्षा मिसाइल प्रणाली भी खरीदने का करार किया है। रूस, भारत को कम कीमत में ही सुखोई टी-50 लड़ाकू जेट देने की पेशकश कर चुका है। ऐसे रूस को नाराज कर और गलतफहमी का मौका देना अपने पैर में कुल्हाड़ी मारने जैसा ही है। दुनिया में आज ताकत के दो ध्रुव बन गए हैं, एक जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका। दूसरा- चीन, रूस, सीरिया और ईरान। भारत को इन दोनों ध्रवों के बीच संतुलन बनाना है। उसे किसी से भी उलझना नहीं है बल्कि सबके साथ और सबके विकास की अपनी परंपरा को आगे बढ़ाना है। जिस दिन नरेंद्र मोदी रूस के सोची के लिए रवाना हुए थे, उसी दिन भारत ने रूस के सहयोग से बनी ब्रह्मोस मिसाइल का एक और कामयाब परीक्षण किया था। भारत में विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्रा पर सवाल उठा सकता है, उस पर होने वाले खर्च पर तंज कस सकता है लेकिन इस यात्रा के दूरगामी लाभ से इनकार नहीं किया जा सकता। रूस, अमेरिका और चीन को साध कर ही सीमा की चुनौतियों से निपटा जा सकता है, नरेंद्र मोदी इसके लिए निरंतर प्रयासरत है। देर सबेर, इसके सकारात्मक नतीजे देखने को तो मिलेंगे ही।

हिन्दुस्थान समाचार/सियाराम पांडेय ‘शांत’

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