नरेन्द्र मोदी सरकार ने धारा 370 को ख़त्म कर पिछले छह महीने से बन रहे पाकिस्तानी हथकंडों पर पानी फेर दिया है।

एक खामोशी के बाद कश्मीर में भारत और पाकिस्तान के बीच की वास्तविक सीमा रेखा (नियंत्रण रेखा) पर तनाव बढ़ गया। भारतीय सेना के अनुसार एलओसी पर पिछले सप्ताह पड़ोसियों के बीच 2003 के संघर्ष विराम समझौते के उल्लंघन में वृद्धि देखी गई। पाकिस्तान द्वारा गोलीबारी के कारण कई भारतीय नागरिक मारे गए।

फरवरी में बालाकोट में एक आतंकवादी प्रशिक्षण शिविर पर भारतीय हवाई हमले के बाद सीमा पार से गोलीबारी की घटनाओं में उछाल देखा गया था क्योंकि पाकिस्तान कश्मीर में आतंकवादियों को घुसपैठ करवाने का प्रयास कर रहा था। अप्रैल में लगभग दो महीने तक की अवधि थी जब नियंत्रण रेखा अपेक्षाकृत शांत थी। यह स्थिति हाल में बदल गई।

पिछले हफ्ते भारतीय सेना ने पाकिस्तानी बॉर्डर एक्शन टीम (BAT) के एक हमले को रद्द कर दिया जिसमें एलओसी पर गश्त पर भारतीय सैनिकों को निशाना बनाने के उद्देश्य से पाकिस्तानी सैनिकों और आतंकवादियों को शामिल किया गया था। पाकिस्तानियों को बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ी जब भारतीय सेना की तरफ से उनसे कहा गया कि वे भारत द्वारा मार गिराए गए उनके सैनिकों के शव वापस ले जा सकते हैं, बशर्ते कि वे आत्सममर्पण की निशानी सफ़ेद झंडी दिखाकर भारतीय सीमा में प्रवेश करें।

Kashmir thriller featuring Amit Shah
पाकिस्तानियों को बड़ी शर्मिंदगी उठानी पड़ी जब भारतीय सेना की तरफ से उनसे कहा गया कि वे भारत द्वारा मार गिराए गए उनके सैनिकों के शव वापस ले जा सकते हैं, बशर्ते कि वे आत्सममर्पण की निशानी सफ़ेद झंडी दिखाकर भारतीय सीमा में प्रवेश करें

सप्ताहांत में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान, विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी, पाकिस्तान की सेना के प्रवक्ता आसिफ गफूर और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के नेता बिलावल भुट्टो ने भारत पर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में रहने वाले लोगों को निशाना बनाने के लिए क्लस्टर बम का उपयोग करने का आरोप लगाया।

ऐसे में भारत ने कश्मीर में अपने अलर्ट की स्थिति बढ़ा दी है। अतिरिक्त 35,000 सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया और अमरनाथ की वार्षिक तीर्थयात्रा में कटौती की गई। सरकार द्वारा एक चेतावनी के बाद पर्यटकों और तीर्थयात्रियों ने कश्मीर छोड़ दिया और रविवार रात कई प्रमुख राजनीतिक नेताओं को घर में नजरबंद कर दिया गया और आतंकवादी हमले की आशंकाओं के बीच इंटरनेट संचार को रोक दिया गया था।

इसके तुरंत बाद आज संसद में गृह मंत्री अमित शाह ने एक विधेयक पेश किया जिसके अंतर्गत धारा 370 के अलगाववादी प्रावधानों को समाप्त करने की पेशकश की गई। इससे पता चला कि पिछले एक हफ़्ते से घटती में सुरक्षा बलों की तैनाती बढ़ाने के पीछे नरेन्द्र मोदी सरकार की यही मंशा थी। धारा 370 के ख़त्म होने की कोशिश की शुरुआत होते ही कश्मीर में आतंकवाद के बढ़ने की संभावना के मद्दे-नज़र यह क़दम उठाया गया था। वरना पाकिस्तान पर जवाबी सैनिक कार्यवाही के लिए मौजूदा सैनिक काफी थे।

तो 14 फरवरी के पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान अब तक चुप क्यों था? विशेषकर अमरीकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रम्प द्वारा भारत और पाकिस्तान के बीच मध्यस्थता करने की पेशकश से सभी को आश्चर्यचकित करते हुए कश्मीर को एक अंतर्राष्ट्रीय फ़्लैशप्वाइंट के रूप में उजागर करने की कोशिश हुई थी जिसमें अमरीका स्थित पाकिस्तान के पैरोकारों ने एक बड़ी भूमिका अदा की थी। ख़ुद पर दबाव के कारण अमरीकी राष्ट्रपति ने जो बयान दिया था, आगे उन्होंने उससे अपनी कन्नी काट ली क्योंकि तब तक खान पाकिस्तान वापस जा चुके थे औत ट्रम्प को यह ख्याल आ गया था कि इस कालखंड में भारत से दोस्ती अमरीका के हित में है।

पाकिस्तान की कोशिश थी कि एलओसी पर गोलीबारी की तीव्रता बढ़ाने से ट्रम्प और विश्व के अन्य राष्ट्र नेता कश्मीर को “फ़्लैशपॉइंट” मान लेंगे और भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव डालने को तत्पर हो जाएंगे। पाकिस्तान हमेशा से कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता चाहता रहा है जबकि भारत ने इसका हमेशा विरोध किया है यह कहते हुए कि कश्मीर विवाद एक ऐसी समस्या है जो किसी तीसरे पक्ष की उपस्थिति के बिना नई दिल्ली और इस्लामाबाद के बीच सुलझाना मुमकिन है। गौरतलब है कि हर गर्मी के मौसम में पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर में आतंकवादियों को भारत में घुसाने की कोशिश होती है; इस बार संयोग से इसी ऋतु में इमरान खान ट्रम्प से मिले और एलओसी पर गोलीबारी के बहाने अमरीका को समझाने की कोशिश की कि इस क्षेत्र में उनकी मध्यस्थता के बिना समाधान संभव नहीं है।

पाकिस्तान को यह मालूम था कि साथ ही साथ अमरीका को अफ़ग़ानिस्तान से अपने सैनिकों को वापस बुलाते वक़्त उसकी सहायता की आवश्यकता होगी ताकि वह देश वापस तालिबान के आतंकवादियों के चंगुल में न फँस जाए। ऐसे में वाशिंगटन डीसी का ध्यान भारत के खिलाफ आतंकवाद की ओर हट जाए, ऐसी संभावना भी प्रबल थी।

पाकिस्तान यह भूल गया था कि आतंकवादी देश का समर्थन ट्रम्प के पिंड में नहीं है, भले ही तात्कालिक लाभ के लिए पाकिस्तानी लॉबी अमरीकी राष्ट्रपति से कुछ भी बुलवा ले। और भारत में आतंकवादियों के परोक्ष समर्थक और प्रत्यक्ष सहानुभूति रखने वालों ने उस वक़्त अपनी हार मान ली जब उनके लाख भड़काने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रम्प के ख़िलाफ़ संसद में आकर कोई बयान नहीं दिया। मोदी को पता था कि अमरीका से किन परिस्थियों में मध्यस्थता वाला बयान आया था जिसके औपचारिक खंडन के लिए विदेश मंत्री एस जयशंकर का संसद में बोलना काफी था। मोदी ऐसे बयानबाज़ी से दूर रहे।

‘Stop Trump-bashing; blame flawed Nehruvian foreign policy’

ट्रम्प ने जनवरी 2017 में पदभार संभालने के बाद से सदैव पाकिस्तान और वहां से पैदा होने वाले इस्लामी आतंकवाद पर सख्ती बरती है। अगस्त 2017 में दक्षिण एशिया पर अमरीकी नीति पर अपने भाषण में ट्रम्प ने पाकिस्तान के बारे में कहा था कि वह देश “अक्सर अराजकता, हिंसा और आतंक के एजेंटों को सुरक्षित पनाहगाह देता है”। उन्होंने यह भी कहा था कि अमरीका “पाकिस्तान के बारे में चुप नहीं रह सकता है”। अमरीकी राष्ट्रपति ने कहा था कि आतंकवादी संगठनों, तालिबान और अन्य समूहों के लिए पाकिस्तान का सुरक्षित पनाहगाह इस क्षेत्र के लिए खतरा पैदा करते हैं।”

इसके बाद 1 जनवरी 2018 को पाकिस्तान को बदनाम करने वाला उनका ट्वीट था, “संयुक्त राज्य अमरीका ने पिछले 15 वर्षों में पाकिस्तान को मूर्खतापूर्ण तरीके से 33 बिलियन डॉलर से अधिक की सहायता दी है और उन्होंने हमें झूठ बोलने और धोखा देने के अलावा कुछ नहीं दिया है; हमारे नेताओं को वे मूर्ख समझते हैं। वे उन आतंकवादियों को सुरक्षित पनाह देते हैं जिनके ख़ात्मे के लिए हम अफ़ग़ानिस्तान में कोशिश करते हैं। अब और नहीं!”

19 नवंबर 2018 को एक अन्य भाषण में ट्रम्प ने कहा, “हम अब पाकिस्तान को अरबों डॉलर का भुगतान नहीं करते हैं क्योंकि वे हमारे पैसे ले लेते हैं और हमारे लिए कुछ भी नहीं करते; बिन लादेन एक प्रमुख उदाहरण है, अफ़ग़ानिस्तान एक और। वे ऐसे कई देशों में से एक हैं जो अमरीका से मदद लेते हैं पर बदले में अमरीका को कुछ भी नहीं देते! अब ऐसा और नहीं होगा।”

इसके साथ ही ट्रम्प ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सहायता में 1.3 बिलियन डॉलर की कटौती की घोषणा कर दी। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र की सूची में पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद आतंकवादी समूह के प्रमुख मौलाना मसूद अज़हर को एक आतंकवादी क़रार डे दिया गया, जिसमें अमरीका, फ्रांस और बर्तानिया ने बड़ी भूमिका निभाई।

लेकिन तालिबान के साथ निपटने के लिए इस्लामाबाद पर बहुत अधिक निर्भर होने के कारण पाकिस्तान को लग सकता है कि अमरीका का ध्यान भारत में हो रहे पाकिस्तानी इस्लामी आतंकवाद से हट जाएगा। आखिर अमरीकी अफ़ग़ान दलदल से किसी भी कीमत पर निकलना जो चाहता है!

वहीं 26 फरवरी को बालाकोट आतंकी शिविर पर हमले के बाद एक सोच यह उभरी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद से निपटने का प्रतिमान बदल दिया है। ऐसे में अगर अमरीका भारत पर दबाव डालता तो पाकिस्तान की तुलनात्मक रूप से कमज़ोर सैन्य बल से उत्पन्न उसकी कमज़ोर स्थिति थोड़ी सुधर सकती थी। इन्हीं आंकलनों और इनकी व्यावहारिकता परखने के लिए पाकिस्तान ने छह महीने बिताए। इस्लामाबाद ने फिर सोचा कि आतंकवाद से निपटने के लिए भारत के संकल्प को फिर से परखने का समय सही है। अगर भारतीय प्रतिक्रिया तीव्र होती है तो पाकिस्तान तनाव को कम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन की मांग कर सकता है। पर कश्मीर से धारा 370 हटाकर और क्षेत्र में अतिरिक्त 35,000 सैनिकों को भेजकर मोदी सरकार ने इसे किले का रूप दे दिया है। धारा 35ए के न होने की सूरत में यहाँ हिन्दू भी आकर बस सकते हैं और जब कश्मीरी पंडित आश्वस्त महसूस करें तो घाटी में लौट सकते हैं। इसके उपरान्त आतंकवादियों को मिल रहे स्थानीय मुसलमानों की मदद कम हो जाएगी जिससे गृह क्षेत्र में सरकार का सरदर्द भी कम होगा। आगे भारत को केवल सीमा और एलओसी पर सतर्कता केन्द्रित रखनी होगी।