‘अल्पसंख्यक’ की परिभाषा संविधान द्वारा निर्धारित हो

देश में हिंदू 79.8% हैं जबकि मुसलमान 14.2% हैं; ऐसे में ये भी कहा जा सकता है कि भारत में मुसलमान दूसरा बड़ा बहुसंख्यक समुदाय है, लेकिन ऐसा कहने पर देश की राजनीति में भूचाल उठ खड़ा होगा

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खबर है कि देश के सात राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा मिल सकता है। भारत में हिन्दुओं को शुरू से ही बहुसंख्यक माना जाता रहा है। अंग्रेजों के जमाने में ही ये बात स्पष्ट कर दी गयी थी कि भारत में हिन्दू एक बहुसंख्यक समाज है, जबकि शेष समुदाय अल्पसंख्यक हैं। लेकिन, हिन्दुओं को भारत के कुछ खास क्षेत्रों में अल्पसंख्यक का दर्जा देने की बात आधिकारिक तौर पर पहली बार की जा रही है।

राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग की बनाई हुई तीन सदस्यों की उपसमिति सात राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा देने पर विचार करने के लिए आगामी 14 जून को इस विषय पर सभी पक्षों की दलील सुनेगी। हिंदुओं को जम्मू-कश्मीर, पंजाब, मिजोरम, मेघालय, मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप में अल्पसंख्यक का दर्जा देने की बात पर विचार हो रहा है।

यह अपने आप में बड़ा अजीब लगता है कि भारत में हिंदुओं को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाएगा। भारत में अल्पसंख्यक का अर्थ हमेशा ही गैर-हिंदुओं समझा जाता रहा है। दुर्भाग्य से भारत में बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक शब्द की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है। 1899 में उस समय के ब्रिटिश जनगणना आयुक्त ने सिख, जैन, बौद्ध, पारसी और मुस्लिम को अल्पसंख्यक कहा था जबकि हिंदुओं को देश का बहुसंख्यक समुदाय बताया था। हालांकि इस परिभाषा में कहीं भी इस बात का उल्लेख नहीं था कि अल्पसंख्यक कहे जाने के लिए कुल आबादी में समुदाय विशेष की न्यूनतम कितनी संख्या होनी चाहिए। कई यूरोपीय देशों में कुल आबादी में दस फीसदी से कम आबादी वाले समुदाय को अल्पसंख्यक माना जाता है। ऑस्ट्रेलिया में छह फीसदी से कम आबादी वाले समुदाय को अल्पसंख्यक माना जाता है। लेकिन भारत में ऐसा कुछ भी निर्धारण नहीं किया गया है। भारतीय जनतंत्र में अल्पमत आधे से कम को कहते हैं और आधे से एक भी अधिक को बहुमत कहा जाता है। यह प्रजातांत्रिक व्यवस्था है, लेकिन इसी आधार पर अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक समुदाय का निर्धारण नहीं हो सकता है।

देश में अल्पसंख्यक के मुद्दे को लेकर शुरू से ही राजनीति होती रही है। अंग्रेजों ने 1899 में अल्पसंख्यक शब्द का प्रचलन भारतीय समाज को अलग-अलग समुदायों में तोड़ने के लिए किया था, ताकि भारतीय समुदायों को विभाजित किया जा सके। आजादी के बाद भी अल्पसंख्यक शब्द की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं बन सकी। संविधान के अनुच्छेद 366 पूरा का पूरा परिभाषाओं के लिए ही है। लेकिन, अल्पसंख्यक की परिभाषा इस अनुच्छेद में भी नहीं है। संविधान निर्माताओं ने कभी भी अल्पसंख्यक समुदाय को परिभाषित करने की जरूरत ही महसूस नहीं की। यहां तक की भारत सरकार ने भी 1992 में जब राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग का कानून पारित किया तो उसमें भी अल्पसंख्यक की परिभाषा में यही कहा गया कि ‘अल्पसंख्यक वह समुदाय है जिसे केंद्रीय सरकार अधिसूचित करे।’

स्पष्ट है कि किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने का अधिकार सरकार ने खुद अपने हाथ में लिया है। भारत में प्रचलन में यही देखा गया है कि मुस्लिम, ईसाई, सिख, जैन, बौद्ध, पारसी आदि को अल्पसंख्यक माना जाता है। इन्हें अपने समुदाय का संरक्षण करने के लिए कई अधिकार भी दिए गए हैं। लेकिन, जब संख्या के आधार पर किसी भी समुदाय को अल्पसंख्यक और बहुसंख्यक कहा जाता है तो यह भी देखा जाना चाहिए की किसी खास स्थान या राज्य में किसी समुदाय विशेष की जनसंख्या कितनी है। अल्पसंख्यक आयोग अभी जिस मसले पर विचार कर रहा है, उसमें राज्य में समुदाय विशेष की संख्या को ध्यान में रखने की बात कही गई है। ऐसा इसलिए कहा गया है ताकि स्थान विशेष पर जो समुदाय सच में अल्पसंख्या में है, उसे ही अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सुविधाओं का लाभ मिल सके।

जम्मू-कश्मीर की बात की जाए तो 2011 की जनगणना के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में मुसलमानों की जनसंख्या 68% है जबकि हिंदू सिर्फ 28.44% ही हैं। इसके बावजदू अभी तक के नियमों के मुताबिक जम्मू-कश्मीर में भी मुसलमानों को ही अल्पसंख्यक माना जाता है और अल्पसंख्यकों को मिलने वाली तमाम सुविधाएं भी वहां रह रहे बहुसंख्यक मुसलमानों को ही मिल रही हैं। लेकिन जो समुदाय वहां सच में संख्यात्मक रूप से अल्पसंख्यक है, उसे अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सुविधाओं का कोई फायदा नहीं मिल पा रहा है।

इसी तरह मिजोरम में हिंदुओं की जनसंख्या 2.75% है। नागालैंड में 8.75%, मेघालय में 11.53%, अरुणाचल प्रदेश में 29.04%, मणिपुर में 41.39%, पंजाब में 38.4% और लक्षद्वीप में 2.77% जनसंख्या हिंदुओं की है। पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में ईसाई बहुसंख्यक हैं, वहीं पंजाब में सिख बहुसंख्यक हैं। लेकिन इन सभी राज्यों में बहुसंख्यक होने के बावजूद अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सारी सुविधाएं इन्हीं समुदायों को मिल रही है। दूसरी ओर अल्पसंख्यक होने के बावजूद हिंदू इन राज्यों में अल्पसंख्यकों को मिलने वाली सुविधाओं से महरूम हैं।

सवाल ये है कि अल्पसंख्यक किसे माना जाए और किसे नहीं। क्या इसका निर्धारण राष्ट्रीय स्तर के साथ ही राज्य स्तर पर या इससे भी छोटी इकाई जिला स्तर पर नहीं किया जाना चाहिए? इसके साथ ही यह भी सवाल उठता है कि क्या किसी समुदाय को अल्पसंख्यक घोषित करने के लिए देश की कुल जनसंख्या में उस समुदाय की न्यूनतम हिस्सेदारी की बात तय नहीं की जानी चाहिए?

2011 की जनगणना के मुताबिक भारत में सबसे अधिक जनसंख्या हिंदुओं की है। देश में हिंदू 79.8% हैं जबकि मुसलमान 14.2% हैं। ऐसे में ये भी कहा जा सकता है कि भारत में मुसलमान दूसरा बड़ा बहुसंख्यक समुदाय है। लेकिन ऐसा कहने पर देश की राजनीति में भूचाल उठ खड़ा होगा। देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को लेकर सवाल उठने लगेंगे। दुनिया में इंडोनेशिया और पाकिस्तान के बाद भारत में मुसलमानों की आबादी सबसे अधिक है। लेकिन अल्पसंख्यकों को मिलने वाली तमाम सुविधाओं का सर्वाधिक लाभ मुसलमानों को ही मिल रहा है।

जरूरत इस बात की है कि अल्पसंख्यक शब्द को ढंग से परिभाषित किया जाए और राज्यों के विभिन्न भौगोलिक परिवेश के अनुकूल यह तय किया जाए कि कहां किस समुदाय को अल्पसंख्यक माना जा सकता है क्योंकि जिस ढंग से अल्पसंख्यक शब्द को मौजूदा समय में परिभाषित किया जा रहा है, वह उन राज्यों में हिंदुओं के लिए अहितकर है, जहां वे अल्पसंख्यक हो चुके हैं।

अगर आज अल्पसंख्यक आयोग इस बात की पहल कर रहा है कि जिन राज्यों में हिंदू अल्पसंख्यक हैं, वहां उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा मिल सके तो इसका स्वागत होना चाहिए। वैसे भी ये काम बहुत पहले ही हो जाना चाहिए था, लेकिन देर ही सही जो हो रहा है, एक अच्छा काम हो रहा है।

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