प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सिंगापुर यात्रा अपने में बहुत उपयोगी थी। दोनों देशों के बीच अनेक समझौते हुए। आर्थिक और व्यापारिक गतिविधियां बढ़ाने पर सहमति बनीं। इसके लिए कारगर निर्णय लिए गये, लेकिन यह यात्रा द्वीपक्षीय संबंधो तक ही सीमित नहीं रही। अमेरिकी रक्षा मंत्री भी यहां की यात्रा पर थे। उन्होंने नरेंद्र मोदी से वार्ता को खासी अहमियत दी। अमेरिका ने भारत के प्रति अपने समर्थन को दोहराया। बताया जाता है कि रक्षामंत्री ने अपने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को भी इस वार्ता से अवगत कराया है। इस वार्ता से दोनों देशों के बीच कतिपय गलतफहमी भी दूर हुई है। बिना एजेंडे वाला यह संवाद भी बहुत सार्थक रहा। यहां अमेरिकी रक्षामंत्री जिम मैटिस से उनकी मुलाकात बोनस की तरह थी। मोदी और मैटिस की वार्ता भी महत्वपूर्ण थी। इसमें भारत अमेरिका के द्वीपक्षीय रिश्तों के अलावा क्षेत्रीय और वैश्विक संबंधों पर भी बात हुई। चीन, रूस और इंडोनेशिया केद्वीप से संबंधित मसलों पर विचारों का आदान प्रदान हुआ। साझा हित और सुरक्षा के विषय भी इसमें शामिल थे। अमेरिका ने माना कि अपने पड़ोसियों पर दबाब बनाने के लिए विवादित क्षेत्रों में मिसाइल तैनात कर रहा है। वह कृत्रिम द्वीपों और बुनियादी ढांचों का निर्माण कर रहा है। अमेरिकी रक्षा मंत्री से भारतीय प्रधानमंत्री की इस मुलाकात का समय भी महत्वपूर्ण था। कुछ समय पहले मोदी रूस गये थे। वहां रूस के साथ सामरिक हथियारों की खरीद पर सहमति बनी थी। जबकि अमेरिका ने रूस के साथ रक्षा सामग्री खरीदने को प्रतिबंधित किया है। लेकिन सिंगापुर में अमेरिकी विदेश मंत्री ने माना कि इन बातों का दोनों देशों के रिश्तों पर कोई असर नहीं होगा। अमेरिका पहले की तरह भारत को तरजीह देता रहेगा। दोनों देश अच्छे सहयोगी के रूप में कार्य करना जारी रखेंगे। दूसरी बात यह कि अभी भारत और इंडोनेशिया के बीच सवांग द्वीप को लेकर समझौता हुआ है।

अमेरिका भी इसमें सहयोग करेगा, क्योंकि इससे चीन के विस्तार का मुकाबला किया जा सकेगा। एशिया के प्रमुख रक्षा व रणनीतिक मामलों के सम्मेलन, शांगरी-ला वार्ता को संबोधित करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। मोदी ने इस मंच से चीन को कड़ी नसीहत भी दी।प्रधानमंत्री मोदी अपने दौरे के आखिरी दिन सिंगापुर के चांगी नेवल बेस भी गए, यहां उन्होंने भारत और सिंगापुर के नौसेना अधिकारियों से मुलाकात की। साथ ही यहां तैनात आइएनएस सतपुड़ा का भी जायजा लिया। इंडोनेशियाई नौसेना बंदरगाह विकसित करने की योजना के साथ चीन के मुकाबले का मंसूबा दिखाया गया। भारत-इंडोनेशिया के बीच रक्षा और समुद्री सहयोग बढा है। सबांग बंदरगाह में आर्थिक क्षेत्र और ढांचागत निर्माण करना शामिल है। यह वैश्विक व्यापार के सबसे व्यस्त शिपिंग चैनलों में से एक है। स्वतंत्र, पारदर्शी, शांतिपूर्ण, समृद्ध और समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र का मार्ग प्रशस्त हुआ है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के वर्चस्व को बढ़ने से रोकने के लिए भारत कई कदम उठा रहा है। आसियान देश भी चाहते हैं कि भारत इस इलाके में बढ़ी भूमिका अदा करे और आक्रामक चीन का मुकाबला करे। इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर की इस यात्रा का एक मकसद यह भी रहा है। चौथे देश के रूप में अमेरिका भी शामिल हो गया। अमेरिका ने प्रशांत कमान का नाम बदलकर हिंद-प्रशांत कमान कर दिया था। इसके कुछ दिनों बाद यह मुलाकात हुई। मोदी ने बंद कमरे में मैटिस से मुलाकात की, जिसमें दोनों पक्षों ने आपसी और वैश्विक हितों के सभी सुरक्षा मुद्दों पर चर्चा की।

वार्षिक शंगरी-ला वार्ता से अलग यह बैठक हुई। इसके पहले सिंगापुर में छात्रों से मोदी ने ठीक कहा था कि 2001 से लेकर अब तक मैंने पन्द्रह मिनट भी छुट्टी नहीं ली। उनकी इसी कार्यशैली का परिणाम था कि वह सिंगापुर यात्रा में अमेरिका से भी उपयोगी वार्ता कर सके। मोदी ने ठीक कहा कि प्रतिद्वंद्विता से एशिया क्षेत्र पिछड़ जाएगा, जबकि सहयोग वाले एशिया से शताब्दी का स्वरूप तय होगा। मोदी का इशारा चीन की तरफ था। वह प्रतिद्वंदिता की भावना से ग्रसित है। इस कारण अनावश्यक रूप से अपने ही पड़ोसियों पर दबाब बना रहा है। इससे असंतुलन की स्थिति बनी है। नरेंद्र मोदी ने इस खतरे को समझा है। इसके मुकाबले का वह कई स्तर पर प्रयास कर रहे हैं। अमेरिका सहित आसियान के अनेक देशों का समर्थन इस अभियान में मिल रहा है।

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