Monday 8 March 2021
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ममता 2013 के कांग्रेसी कार्यक्रम में मोदी के व्यवहार से सीख लें

2013 के कार्यक्रम में मौजूद कांग्रेसी मोदी के प्रति वैमनस्य का भाव रखते थे, पर तत्कालीन गुजरात के मुख्यमंत्री ने स्थिति ममता से बेहतर संभाली

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कोलकाता में विक्टोरिया मेमोरियल के कार्यक्रम से बेहतर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की 125 वीं जयंती समारोह मनाने के लिए आयोजन नहीं हो सकता था, लेकिन बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का ‘जय श्रीराम’ का नारा सुनकर रूठ जाने की घटना ने अवसर की गरिमा को ठेस पहुँचाई। उन्होंने कार्यक्रम में भाषण देने से इंकार कर दिया और दो मिनट से भी कम समय में अपनी टिप्पणी को समाप्त कर मंच से उतर गई। हालांकि ममता बनर्जी की इस स्वरूप से चार दशकों से उनकी हरकतों से परिचित बंगाल के लोग परिचित हैं, आज कम ही लोगों को याद है अक्टूबर 2013 में तत्कालीन गुजरात मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अहमदाबाद में तुलनात्मक स्थिति में स्वयं को परिमार्जित रखना। मोदी ने स्थिति का कैसे सामना किया और शनिवार को बनर्जी ने जो किया, ये परस्पर विपरीत व्यक्तित्वों को दर्शाने के लिए पर्याप्त है।

उस वर्ष 29 अक्टूबर को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अहमदाबाद में शहर के सरदार पटेल संग्रहालय का उद्घाटन करना था। यह कार्यक्रम गुजरात कांग्रेस के दिग्गज और पूर्व मंत्री दिनशा पटेल द्वारा आयोजित किया जा रहा था। यह सरदार पटेल की जयंती मनाने का कार्यक्रम था। कार्यक्रम का समय ऐसा था कि वातावरण में तनाव को महसूस किया जा सकता था क्योंकि आम चुनाव एक साल के अंदर होना था और एनडीए के प्रधानमंत्री उम्मीदवार मोदी थे। तब तक यह सर्वजनविदित हो चुका था कि कांग्रेस और उसके इको-सिस्टम के लिए मोदी नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त थे — उस वक़्त भी जैसे आज तक बने हुए हैं।

फिर भी जब सिंह अहमदाबाद के हवाई अड्डे में उतरे तो मोदी ने उनका स्वागत किया। इसके विपरीत बनर्जी ने प्रधानमंत्री मोदी के स्वागत के लिए अपने एक मंत्री को भेजने को भेजा। विशेष अवसरों में प्रोटोकॉल की अहमियत का ख़याल ममता बनर्जी ने नहीं रखा, उन्हें इस बात की कोई परवाह नहीं थी कि इससे मोदी की नहीं बल्कि उनकी अपनी छवि धूमिल हो रही है क्योंकि नेताओं के अलग-अलग राजनीतिक दल भले ही हों, वे महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मुद्दों पर एक दिखने चाहिए। नेताजी को श्रद्धेय और आदर का पात्र ही नहीं बल्कि समूचे राष्ट्र के नायक मानने वाली ममता बनर्जी को यह ध्यान नहीं रहा कि 23 जनवरी के राष्ट्रीय अवसर पर केंद्र-राज्य संबंधों के सार्वजनिक पालन के दौरान बचकानी हरकतों से बाज़ आना चाहिए।

खैर, 2013 के उस कार्यक्रम के दौरान संग्रहालय में कांग्रेस के नेताओं के साथ-साथ मंच और दर्शकों में भी कांग्रेस समर्थक भरे हुए थे। भरत सोलंकी से लेकर शंकरसिंह वाघेला तक सभी गुजरात के शीर्ष नेता मौजूद थे। भीड़ का मुख्यमंत्री मोदी के प्रति कोई मेहमाननवाज़ी का बर्ताव नहीं था। तद्पश्चात जब मोदी ने माइक संभाला तो उनके चेहरे पर या वाणी में क्रोध या बेचैनी का कोई चिह्न नहीं था।

अपने भाषण में मोदी ने अहमदाबाद नगरपालिका में अपने कार्यकाल के दौरान महिला आरक्षण, शहरी नियोजन और स्वच्छता पर अपने काम के लिए सरदार पटेल की सराहना की। उन्होंने यूपीए सरकार से गुजरात को मिले विभिन्न पुरस्कारों पर भी प्रकाश डाला।

मुख्यमंत्री मोदी ने यह भी संदेश दिया कि भारत में माओवाद और आतंकवाद सफल नहीं होगा। उन्होंने बस एक राजनीतिक बात कही थी कि क्यों सरदार पटेल भारत के पहले प्रधानमंत्री नहीं बने, लेकिन यह कहते वक़्त उन्होंने किसी का नाम लेकर उन्हें बुरा-भला नहीं कहा।

मनमोहन सिंह ने कांग्रेस की पटकथा के हिसाब से चलते हुए अन्य बातों के साथ सरदार पटेल की धर्मनिरपेक्षता पर प्रकाश डाला। उनकी टिप्पणी का लक्ष्य स्पष्ट था और इस पर बहस की जा सकती थी, लेकिन कोई उनपर यह आरोप नहीं लगा सकता था कि उनका कहना अनुचित था।

विक्टोरिया मेमोरियल में ममता बनर्जी का आचरण इसके विपरीत था। अहमदाबाद में मनमोहन सिंह के विपरीत प्रधानमंत्री मोदी अपने लंबे भाषण में राजनीति से बिल्कुल स्पष्ट रहे। उनके भाषण का फोकस नेताजी थे, बोस के दर्शन और पश्चिम बंगाल की महानता की ही बातें प्रधानमंत्री मोदी ने कही। नेताजी के सेकुलरिज्म से ममता के सेकुलरिज्म की तुलना की जा सकती थी, पर प्रधानमंत्री ने ऐसा कुछ भी किया नहीं।

लोकतंत्र में राजनीतिक नेताओं और कैडरों के बीच तू-तू-मैं-मैं आम है, यह बहस स्वस्थ भिहो सकती है, बशर्ते यह शालीनता के साथ किया जाए। वर्ष 2013 के अहमदाबाद और 2021 के कोलकाता में कम से कम दो समानताएँ थीं — भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख हस्तियों के जन्मदिन कार्यक्रम और दो विपरीतधर्मी दलों से संबंधित प्रधानमंत्री और मुखमंत्री। लेकिन चाहे मुख्यमंत्री मोदी की बात करें या प्रधानमंत्री मोदी की, दोनों ने मर्यादा और अवसर की गरिमा का ध्यान रखते हुए राजनीति को अपने भाषण में स्थान नहीं दिया। इससे उनको कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा कि 2013 में अहमदाबाद के कांग्रेसी जमघट का रवैया उनके प्रति वैमनस्य का था और 2021 में कोलकाता में नेताजी भवन के रास्ते कुछ टीएमसी कार्यकर्ताओं ने उन्हें काले झंडे दिखाये थे। यदि ‘जय श्रीराम’ सुनकर ममता बनर्जी रूस सकती थी तो तृणमूल कांग्रेस के काले झंडे देख नरेन्द्र मोदी इसका उल्लेख कर अपने भाषण में आपत्ति जाता सकते थे। परंतु कुछ अवसरों के लिए गरिमापूर्ण आचरण की आवश्यकता होती है, यह जान कर मोदी ने अपनी वक्तृता से ऐसी कड़वाहट को बाहर रखा।

यहीं ममता बनर्जी परीक्षा में अनुत्तीर्ण हुईं। एक बड़े बहुमत के साथ लोकतांत्रिक रूप से चुने गए मुख्यमंत्री के रूप में वे अपने आचरण द्वारा कार्यक्रम की प्रतिष्ठा बढ़ा सकती थीं, लेकिन उन्होंने शादी में आए नाराज़ फूफा का रोल अदा करना बेहतर समझा! शायद यही कारण है कि वो 34 लम्बे साल जब ऐसा लगता था कि बंगाल में वाम मोर्चे के शासन का कभी अंत नहीं होगा, जब कांग्रेस में सत्ता में वापसी की इच्छा दिखती नहीं थी या दल इसके लिए सक्षम नहीं लगता था पर इस बीच ममता बनर्जी एकमात्र तेज़-तर्रार विपक्ष की नेता दिखती थीं, तब भी बंगाल के लोग उनके व्यवहार के कारण सकुचाए ऐसी टिप्पणी किया करते थे कि अगर सत्ता हाथ आए तो क्या मुख्यमंत्री के पद की गरिमा यह महिला संभाल पाएगी?

Mausumi Dasgupta
Mausumi Dasgupta
Literary affairs writer, consultant for overseas education, history and economics enthusiast

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