ईरान से कीजिए ‘रूहानी’ बातें

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अन्य कई मुसलमान देशों की तरह ईरान भी इस्लाम से बाहर निकलकर सौदा करने को तब तैयार होगा जब उसे सौदे में आतंक से अधिक फ़ायदा नज़र आएगा; भारत को इस देश के साथ अपने रिश्तों को ऐसा ही मोड़ देना होगा

हाल ही में ईरान के राष्ट्रपति हसन रूहानी का भारतीय दौरा समाप्त हुआ जिस दौरान 9 समझौतों पर दोनों देश सहमत हुए। इतिहास में प्राचीन और मध्ययुग के समय ईरान का भारतियों के लिए विशेष महत्त्व रहा। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की पहली सरकार के ज़माने में भी ईरान से भारत के विशेष सम्बन्ध थे और जलालुद्दीन मुहम्मद रूमी की पंक्तियों के सहारे कवि-प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपने ईरान दौरे के समय फ़ारसी भाषियों का दिल जीत लिया था। इस बार दिसंबर 2017 में उद्घाटित चाबहार बंदरगाह के ज़रिए व्यापार बढ़ाने की पेशकश के अलावा ईरान ने अपने प्राकृतिक संसाधन को आसान शर्तों पर भारत को मुहय्या करवाने की इच्छा भी ज़ाहिर की है। यह चीन-पाकिस्तान की ग्वादर बंदरगाह-केन्द्रित गतिविधियों से बिगड़े क्षेत्र के संतुलन को वापस स्थापित करने की तरफ़ एक महत्त्वपूर्ण क़दम है। मज़हब के नज़रिए से देखें तो विश्व के शिया’ समाज के साथ सुन्नियों के मुक़ाबले हिन्दुओं के बेहतर ताल्लुक़ात रहे हैं। भारत में भी शिया’ओं की छोटी सी जनसंख्या ने अब तक कोई वबाल नहीं खड़ा किया है। सर्वोपरि सांस्कृतिक एका का कारण यह है कि भारत की बोली उर्दू फ़ारसी व कई उत्तर भारतीय भाषाओँ के संमिश्रण से बनी जिसका एक रूप आधुनिक हिन्दी है। भारत के लिए चिंता का विषय बस इतना रहा कि भारत-ईरान रिश्तों की मज़बूती के इन तमाम ऐतिहासिक, भौगोलिक तथा सांस्कृतिक कारणों के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ईरान ने हमारा साथ कम दिया है और मुसलमान राष्ट्रों का साथ ज़्यादा निभाया है। भारत की सभी सरकारों की फ़िलिस्तीन के प्रति कमज़ोरी का एहतराम न करते हुए ईरान ने पाकिस्तान के कश्मीरी आलाप या प्रलाप के साथ अपना सुर मिलाया। उसने इस बात से भी सीख नहीं ली कि पाकिस्तान वही मुल्क है जहाँ आए-दिन शिया’ क़त्ल-ओ-ग़ारत का शिकार होते हैं। कहीं रूहानी भारत के प्रति अपनी ‘उदारता’ इसलिए तो नहीं दिखा रहे कि अमरीका के रवैये से ईरान परेशान है? यहाँ ईरान को नए ख़रीदार चाहिए और नए अंतर्राष्ट्रीय साथी भी। यदि हाँ तो इस विषय पर भावुक होने के बजाय भारत को ईरान के साथ एक सौदा करना चाहिए। यह सौदा शत-प्रतिशत व्यावहारिक होगा।

अगर अमरीका के दबाव में आ कर सऊदी अरब जैसा कट्टर मुसलमान देश ओसामा बिन लादेन ही नहीं बल्कि सभी उग्रवादियों को इस्लाम के गढ़ में नेस्तोनाबूद कर सकता है तो यह मानना होगा कि पैसों की ताक़त और सामरिक शक्ति के आगे मज़हबी नाते कमज़ोर पड़ जाते हैं। भारत के पास अमरीका जितना धन नहीं है और अमरीका की तरह भारत दूसरे देशों में अपनी सेना के सहारे दखलंदाज़ी नहीं करता। परन्तु भारत के पास एक अनोखी शक्ति है। अमरीका के साथ लगातार बेहतर होते भारत के रिश्तों का हवाला देते हुए हमारी सरकार ईरान से कहे कि डोनल्ड ट्रम्प प्रशासन को सद्बुद्धि देने का काम भारत की तरह विश्व की कोई ताक़त नहीं कर सकती। वैश्विक आतंकवाद के युग में भारत और अमरीका के लिए यह ज़रूरी है कि सभी मुसलमानों को एक ही कटघरे में मुल्ज़िम की तरह खड़ा न किया जाए बल्कि ईरान, सोवियत संघ से अलग हुए 20 राष्ट्रों में से अज़रबैजान, कज़ाख़स्तान, किरगिज़स्तान, ताजीकिस्तान, उज्बेकिस्तान व तुर्कमेनिस्तान और सुदूर पूर्व के इंडोनेशिया व मलेशिया जैसे शांत मुसलमान मुल्कों को अपने साथ ले कर चलें और हिन्दू पाश्चात्य के ईसाइयों एवं पूर्व की मुसलमान सभ्यताओं के बीच मध्यस्थता का काम करें। एक तरफ़ अफ्रीका के कई देश मज़हब के नाम पर विभाजित हो चुके हैं। जहाँ अभी विभाजन नहीं हुआ, वहाँ बोको हराम जैसे उग्रवादी संगठनों के मारे आम लोगों और ख़ास कर महिलाओं का जीना मुहाल है। मध्य एशिया में सीरिया में लगी आइ एस आइ एस की आग इराक़ को अपनी चपेट में ले चुकी है और इन आतंकियों की नज़र में शिया’ तो क्या नरमपंथी सुन्नी भी काफ़िर हैं जिनकी ख़ैर नहीं। इस क्षेत्र में भी अमरीका से ग़लतियाँ हुई हैं जिनमें बशर हाफ़िज़ अल असद के ख़िलाफ़ मोर्चा बांधना ग़लत था और इससे पहले बिना ख़तरनाक अस्त्रों के कारख़ाने चलाने के प्रमाण के सद्दाम हुसैन को अपदस्थ करना अन्याय था। इन दिनों मिस्र में हस्तक्षेप के दुष्परिणाम को भूल कर अमरीका ईरान के विद्रोहियों का साथ दे रहा है। ये सारी बातें भारत अमरीका से बैर न कर भी समझा सकता है जिससे ईरान को लाभ होगा। जहाँ उन्हें कोई ठोस लाभ दिखा, ईरानी कश्मीर जैसे मुद्दों पर इस्लामी गुट को छोड़ बाहर निकल आएंगे। भारत के लिए ईरान से व्यापार के बनिस्बत ईरान के कारण क्षेत्र में आ सकने वाली शांति ज़्यादा ज़रूरी है। शांति रहेगी तब तो व्यापार होगा!

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