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महाराष्ट्र सरकार की क़र्ज़ माफ़ी पर उठाए किसान ने सवाल

राज्य में रु० 34,000 करोड़ की ऋण माफ़ी के बाद 4,500 से अधिक किसानों ने आत्महत्या की; पाँच वर्षों में 14,034 किसानों ने जानें गँवाईं

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क़र्ज़ के बोझ तले दबे किसान महाराष्ट्र के सतारा जिले के सूखाग्रस्त खतव तालुका के निवासी शरद इंगले सरकार से केवल एक ही उम्मीद रखते हैं। यह क़र्ज़ माफ़ी नहीं है; वह चाहते हैं कि सरकार स्वामीनाथन समिति की सिफ़ारिशों को स्वीकार करे।

बेमौसम बारिश ने उनके आलू, प्याज़ और अन्य फसलों को नष्ट कर दिया, इंगले को समझ में नहीं आ रहा कि अपना परिवार कैसे चलाएं। उन्होंने और अन्य किसानों ने बैंकों, ऋण समितियों और निजी ऋणदाताओं से ऋण लिया हुआ है। राज्य सरकार की रु० 2 लाख तक की ऋण माफ़ी इंगले जैसे किसानों के लिए कोई ख़ास मददगार साबित नहीं होगी।

जब राजनेता ऋण माफ़ी की बात करते हैं तो वे स्वीकार करते हैं कि कृषि आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है। वे एक ग़लत संकेत दे रहे हैं कि खेती आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है। लेकिन इसे आर्थिक रूप से व्यवहार्य कैसे बनाया जाए यह आपकी चुनौती है। ऋण माफ़ी किसानों को ग़लत तरीक़े से मदद करने का एक दृष्टांत है।

— कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन

मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने विधानसभा के शीतकालीन सत्र के अंतिम दिन शनिवार को विधान सभा में ऋण माफ़ी योजना की घोषणा की। उन्होंने कहा, “मेरी सरकार 30 सितंबर 2019 तक के फ़सल के लिए लिए गए क़र्ज़ माफ़ कर रही है। राशि के लिए अधिकतम राशि रु० 2 लाख है।” ठाकरे ने कहा कि इस योजना को महात्मा ज्योतिराव फुले की क़र्ज़ माफ़ी योजना कहा जाएगा।

इंगले इससे ख़ुश नहीं। उन्होंने कहा, “सरकार को समस्या के मूल कारण का पता लगाना चाहिए। किसानों को अपनी उपज का मूल्य तय करने का अधिकार मिलना चाहिए, तभी खेती लाभदायक होगी।” उन्होंने कहा कि ऋण किसानों के जीवन का हिस्सा बन गए हैं और वे तब तक क़र्ज़ लेना बंद नहीं कर पाएंगे जब तक खेती लाभदायक नहीं होगी।

नासिक के किसान बबलू जाधव कहते हैं कि किसान प्राकृतिक आपदा, सरकारी हस्तक्षेप, बिचौलियों और व्यापारियों के दुष्चक्र में फंस गए हैं।

ठाकरे सरकार की ऋण माफ़ी से पहले, उनके पूर्ववर्ती देवेंद्र फड़नवीस ने जून 2017 में रु० 34,022 करोड़ की ऋण माफ़ी की घोषणा की थी जो राज्य भर के 89 लाख किसानों को राहत देने वाली थी। उस समय फडणवीस ने कहा था, “यह एक ऐतिहासिक निर्णय है। हमारी सरकार द्वारा घोषित छूट राशि सबसे अधिक है।”

वास्तव में फडणवीस सरकार की क़र्ज़माफ़ी के नतीजों के हिसाब से ज्यादा पैदावार नहीं हुई। पिछले पांच वर्षों (2014-18) में महाराष्ट्र 14,034 किसानों की आत्महत्या का गवाह रहा, यानी कि प्रत्येक दिन आठ आत्महत्याएँ! हक़ीक़त में रु० 34,000 करोड़ की ऋण माफ़ी के बाद 4,500 से अधिक लोगों ने आत्महत्या की। पिछले पांच वर्षों में कुल किसान आत्महत्याओं में से ऋण माफ़ी योजना की घोषणा के बाद 32 प्रतिशत आत्महत्याएँ हुईं।

महाराष्ट्र की कृषि आबादी में खेत मज़दूरों की हिस्सेदारी 52 प्रतिशत है। सन 2014 और 2016 के बीच महाराष्ट्र में कुल किसान आत्महत्याओं में से 32 प्रतिशत (3,808) खेत मज़दूरों द्वारा किए गए थे हालांकि क़र्ज़माफ़ी खेत मजदूरों को कवर नहीं करती है।

किसानों को अपनी उपज का मूल्य तय करने का अधिकार मिलना चाहिए, तभी खेती लाभदायक होगी

— सतारा जिले के सूखाग्रस्त खतव तालुका के निवासी किसान शरद इंगले

आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, जम्मू और कश्मीर और पुदुचेरी में अधिक खेत मज़दूरों ने आत्महत्या की है, भले ही ये राज्य पिछले कई वर्षों से किसानों का क़र्ज़ माफ़ करते आए हैं।

प्रख्यात कृषि वैज्ञानिक एमएस स्वामीनाथन ने अप्रैल में कहा था कि ऋण माफ़ी पिछड़े या अव्यावहारिक कृषि को दर्शाती है। “जब राजनेता ऋण माफ़ी की बात करते हैं तो वे स्वीकार करते हैं कि कृषि आर्थिक रूप से व्यावहारिक नहीं है। वे एक ग़लत संकेत दे रहे हैं कि खेती आर्थिक रूप से व्यवहार्य नहीं है। लेकिन इसे आर्थिक रूप से व्यवहार्य कैसे बनाया जाए यह आपकी चुनौती है। ऋण माफ़ी किसानों को ग़लत तरीक़े से मदद करने का एक दृष्टांत है,” उन्होंने कहा था।

“यह (ऋण माफ़ी) बीमा पॉलिसी का एक हिस्सा होना चाहिए। यदि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा नहीं होती है या बारिश अधिक या कम होती है तो आपको ऋण को माफ़ करना होगा या अगले कुछ वर्षों में क़िस्त बाँटना होगा,” स्वामीनाथन ने कहा था। लेकिन स्वामीनाथन के अनुसार “क़र्ज़ माफ़ी हर पार्टी की नीति बन चुकी है। यह दीर्घकालिक व्यावहारिक नीति नहीं है। एक प्रकार से सभी सरकारों ने अपने हाथ खड़े कर दिए हैं एक तरह से मान लिया है कि खेती के अर्थशास्त्र में सुधार करने में वे सक्षम नहीं हैं।”

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