जैव-विविधता संरक्षण से बचेगा जीवन

भारत सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में जीवों की 81,000 प्रजातियां थीं, वहीं वर्तमान में आईयूसीएन के अनुसार अब भारत में 91,000 प्रजातियां पाई जाती हैं

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प्राकृतिक संसाधनों का सीमित उपयोग और सभी जीव-प्राणियों के प्रति दया और उदारता की भावना रखते हुए हम जैव-विविधता का संरक्षण कर सकते हैं। जैव विविधता का अर्थ पृथ्वी पर पाये जाने वाले जीवों की विविधता से है। किसी भौगोलिक क्षेत्र में जीवों और वनस्पतियों की संख्या से है तथा इसका तात्पर्य पौधों के प्रकारों, प्राणियों तथा सूक्ष्म जीवों से है परन्तु जैव विविधता में इन जीवों की विविधता के अलावा उनके आसपास के पर्यावरण को भी शामिल किया जाता है, जहां वे निवास करते हैं या पाये जाते हैं। जैव विविधता की दृष्टि से भारत एक समृद्ध राष्ट्र है। भारत विश्व के 10 एवं एशिया के 4 शीर्ष देशों में शामिल है। विश्व के कुल 17 मेगा डाइवर्सिटी प्रदेशों में भारत को शामिल किया गया हैं। जैव विविधता बाहुल्य क्षेत्रों की दृष्टि से अन्य देशों की तुलना में भारत में ज्यादा हॉट स्पाट क्षेत्र हैं। इन में मुख्य है- इण्डो बर्मा क्षेत्र, हिमालय क्षेत्र, पश्चिमी घाट एवं श्रीलंका, सुण्डालैंड क्षेत्र (निकोबारदीप)। वैश्विक स्तर पर हॉट स्पाट्स जैव विविधता में भारत 16.86 प्रतिशत स्थान रखता है।

ग्लोबल वार्मिंग का सबसे ज्यादा प्रभाव हिमालय क्षेत्र में पड़ा है। फलस्वरूप बढ़ते तापमान के कारण यहां की स्थानीय प्रजातियां भविष्य में ज्यादा संकट में आ सकती हैं। भारत सरकार द्वारा जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत में जीवों की 81,000 प्रजातियां थीं, वहीं वर्तमान में आईयूसीएन के अनुसार अब भारत में 91,000 प्रजातियां पाई जाती हैं। स्तनधारी, पक्षियों और सरीसृपों की संख्या के मामले में भारत अग्रणी हैं। स्थानीय प्रजातियों में कीटों, समुद्री कीड़ों, ताजे जलीय स्पंज, सेंडीपीड्स का बाहुल्य है तथा देश में बड़े रीढ़धारी जानवर स्थानीय प्रजातियांं ज्यादा तादाद में हैं। स्तनधारी जीवों में भी भारत आगे है। इसके अलावा भारत में पादपों की संख्या करीब 47500 पाई जाती है। पुष्प पादपों की प्रजातियों के मामले में देश समृद्ध है। भारत का कुल क्षेत्रफल 32.87 लाख वर्ग किलोमीटर है, जिसके 24.16 प्रतिशत भाग पर वन पाये जाते हैं। यहां उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन से लेकर शीतोष्ण कटिबंधीय तथा शंकुधारी वन पाये जाते हैं। भारत में कम वर्षा वाले क्षेत्रों में कंटीली झाडिय़ां तथा बिखरे पेड़ पाए जाते है विश्व में वनस्पतियों की कुल 36,900 प्रजातियों पाई जाती हैं। जिसमें 33 प्रतिशत भारत में पाई जाती हैं। भारत का समुद्री क्षेत्र 7516 किमी तक फैला है। समुद्री जैव विविधता क्षेत्रों में मैंग्रोव, एश्चुअरी तथा प्रवाल भित्ति जैसी प्रजातियां अपनी अनुकूलता के कारण प्रचुर संख्या में हैं। इनके साथ समुद्री घास की भी कई प्रजातियां पाई जाती हैं। भारत में दस ऐसे भौगोलिक क्षेत्र हैं, जहां स्थल, मिट्टी और जलवायु में भिन्नता पाई जाती है। इसमें हिमालय, मरूस्थल, पश्चिमी घाट, दक्कन प्रायद्वीपीय पठार, अद्र्ध शुष्क क्षेत्र, गंगा का मैदानी क्षेत्र, तटीय क्षेत्र उत्तर पूर्वी क्षेत्र तथा द्वीप समूह शामिल है। जीवमंडल संरक्षण क्षेत्र (बायोस्फियर रिजर्व) यूनेस्को द्वारा स्थापित किये गए हैं।

भारत में 18 जीवमंडल संरक्षण क्षेत्र हैं, जो इस प्रकार हैं – पचमढ़ी, पन्ना, नीलगिरी, नंदादेवी, नोकरेक, मानस, सुंदरवन, मन्नार की खड़ी, ग्रेट निकोबार, सिमलीपाल, डिबरूशिकोबा डिहांग-डबांग, कंचनजंघा, अगस्थामलाई, अचनकमार-अमरकंटक कच्छ, कोल्डडेजर्ट तथा शीशाचलम। इन 18 क्षेत्रों में केवल सात को ही विश्व नेटवर्क जीव मंडल संरक्षण क्षेत्र की सूची में शामिल किया गया है। ये हैं- पचमढ़ी, नंदादेवी, नीलगिरी, सिमलीपाल तथा नोकरेक। जीवमंडल संरक्षण क्षेत्र उद्देश्य पौधों और जन्तुओं की विविधता व अखण्डता को संरक्षित करना, पारिस्थितिकीय संरक्षण,अनुसंधान का प्रोत्साहन, शिक्षा, प्रशिक्षण तथा जन-जागरूकता, विविधता, पारिस्थितकी तथा समाज के बीच सहजीवी संबंधों का विकास, प्रौद्योगिकी द्वारा प्राकृतिक स्रोतों का सतत प्रयोग, जैविक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक आयामों को समाहित करना है। बायोस्फियर रिजर्व 18 क्षेत्रों के अलावा भारत में राष्ट्रीय उद्यान 100, वन्य प्राणी अभ्यारण्य 515, टाइगर रिजर्व 47 तथा पक्षी उद्यान 21 हैं। समाज और पर्यावरण की दृष्टि से जैव विविधता का संरक्षण जरूरी है। इसके विभिन्न कारण हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या के भोजन की जरूरतों की पूर्ति फसलों और पशुओं से होती है। फसलों के बीजों और पशुओं की नस्लों में हमें निरंतर उन्नत सुधार करना पड़ता है। उनके अनुवांशिक सुधार के लिए देशज जीव-जातियों की आवश्यकता होती है। सभी जैविक पदार्थों की आहार श्रृंखला का जीव-विज्ञान में महत्व है। जैसे कि यदि सांपों की प्रजाति नहीं रहेगी तो चूहों की तादाद बढ़ जाएगी, जिससे आहार श्रृंखला पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। आर्थिक कारणों में पशु-पक्षी, वन, पालतू जानवर, पेड़-पौधे मानव समाज के लिए अत्यन्त उपयोगी हैं। इनके न होने से आहार श्रृंखला पर संकट हो जाएगा। इसी तरह शिक्षा एवं शोधकार्य के लिए जैव विविधता का संरक्षण जरूरी है। सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी जैव विविधता के संरक्षण का विशेष महत्व है।

भारत में पिछले कुछ दशकों से औद्योगीकरण और शहरीकरण का निरंतर विस्तार हुआ है। फलस्वरूप जंगलों में पेड़ों की संख्या कम हुई। कृषिभूमि को परिवर्तित कर ग्रामीण तथा शहरी आवास बनाए जा रहे हैं। सडक़ों, पुल तथा अन्य निर्माण हो रहे हैं। जीव-जन्तुओं के आवास के आसपास मानवीय गतिविधियों का दखल बढ़ रहा है। हमें इसे रोकना होगा। जंगली जानवरों के प्राकृतिक आवासों से छेड़छाड़ बंद हो, पशु-पक्षियों तथा पेड़-पौधों को प्राकृतिक वातावरण में रहने दिया जाए। यदि संभव न हो तो जीव-जंतुओं के कृत्रिम आवास (चिडिय़ाघर) में उनका संरक्षण किया जाए। असुरक्षित प्रजातियों को विशेष संरक्षण देने की जरूरत है। बायोस्फियर रिजर्व ओर राष्ट्रीय उद्यानों का सीमांकन किया जाए। असुरिक्षत जीवों के अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर प्रतिबंध हो। किसी विशेष प्रजाति को ही नहीं बल्कि पूरे पारिस्थतिकी तंत्र का संरक्षण किया जाए। पशु-पक्षियों के शिकार की घटनाओं को रोकने के कड़े उपाय किये जाएं। राष्ट्रीय, प्रादेशिक तथा जिला स्तर पर कार्यक्रम नियमित रूप से आयोजित किये जाएं। इन उपायों से हम असुरक्षित प्रजातियों को सुरक्षा दे पाएंगे साथ ही जैव-विविधता का संरक्षण करने में सफल हो सकेंगे।

हिन्दुस्थान समाचार/श्रीराम माहेश्वरी

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