Tuesday 11 May 2021
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दिल्ली में अनधिकृत क़ब्रों, मज़ारों के ज़रिए ज़मीन जिहाद

दिल्ली में ज़मीन हथियाने के लिए वक्फ़ बोर्ड के लोग व अन्य मुसलमान जगह-जगह क़ब्रें और मज़ारें बनवा रहे हैं; कहीं चुपके-चुपके तो कहीं खुल्लमखुल्ला

पिछले वर्ष लॉकडाउन के दौरान कुछ मुसलामानों द्वारा ये हरकतें शुरू हो गई थीं। महरौली के निकट संजय वन में सरकारी (दिल्ली विकास प्राधिकरण) ज़मीन को हथियाने के लिए रातोंरात नई क़ब्रें ‘प्रकट’ हुई थीं जिनकी रखवाली असली और फ़र्ज़ी पुलिस वाले मिलकर कर रहे थे। अब ऐसा खुली सड़कों में भी हो रहा है। हाल ही में सिर्फ़ न्यूज़ ने छत्तरपुर मेट्रो स्टेशन के नज़दीक के ट्रैफिक क्रासिंग पर बनी एक नई क़ब्र का विडियो फ़ेसबुक पर साझा किया था।

इससे पहले साल 2020 में दिल्ली में ज़मीन जिहाद की कई घटनाएँ सामने आईं जो एक गहरे षड़यंत्र की ओर इशारा कर रही थी। दक्षिण दिल्ली में लगभग 500 एकड़ में फैला हुआ है संजय वन। इस वन की सीमाएँ हौज़ ख़ास, छतरपुर, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू), महरौली जैसे क्षेत्रों से लगी हुई हैं।

इस संरक्षित इलाक़े पर बरसों से मुसलमानों की नज़र रही है। इन तत्वों ने लॉकडाउन को अपने लिए सुनहरा अवसर माना और इस दौरान इन लोगों ने इस वन के अंदर अनेक स्थानों पर मजारें बना दीं। यह जानकारी मई 2020 के प्रथम सप्ताह में उस समय मिली जब एक स्थानीय युवा किसी कारणवश वन में गया। वहां वह मज़ारों को देखकर दंग रह गया। उसने उन मज़ारों पर एक वीडियो बनाया और उसे सोशल मीडिया में ‘वायरल’ कर दिया।

वीडियो में वह कह रहा है, ‘‘मैं लालकोट की दीवार पर हूं। यहां से एक नवनिर्मित मज़ार साफ़ दिखाई दे रही है। इसके साथ ही दो कमरे भी दिखाई दे रहे हैं। मार्च के अंतिम दिनों तक इस जगह पर कुछ भी नहीं बना था। ये सब चीज़ें लॉकडाउन के दौरान बनी हैं।’’

वह युवक कहता है, ‘‘वन के अंदर आते समय रास्ते में अनेक अन्य मज़ारें भी मिलीं जो कुछ दिनों में ही बनी हैं। उन पर नई हरी चादरें डली हुई हैं।’’

लेकिन इस वन की देखरेख करने वाली संस्था दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) किसी नए निर्माण से मना कर रही है। डीडीए में सेक्शन अफ़सर और इस वन के प्रभारी सोनू वर्मा ने अपने विभाग की सफ़ाई में पिछले साल कहा था, ‘‘2018 के बाद से इस वन में कोई नया निर्माण नहीं हुआ है। हां, लॉकडाउन के दौरान इतना ज़रूर हुआ है कि एक मुसलमान ने एक कब्र के आसपास कुछ पत्थरों को हरे रंग से रंग दिया था।”

“विडियो बनाने वाला युवक कई दिनों से इस वन में आता रहा। उसकी शिकायत 26 मई 2020 को महरौली थाने में की गई। पुलिस से निवेदन गया कि उस मुसलमान को वन में न आने दें और यदि आए तो उसके विरुद्ध कार्रवाई करें।’’

वर्मा ने यह भी कहा था, ‘‘डीडीए संजय वन के अंदर एक र्इंट भी किसी को नहीं लगाने देगा, किसी बड़े निर्माण का तो सवाल ही नहीं है। लेकिन वन के अंदर पहले से जो कुछ भी बना (मस्जिद, मदरसा, मज़ार) है, उस पर डीडीए कुछ नहीं कर सकता है।’’

महरौली भाग के विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष सुनील घावरी ने कहा कि शीला दीक्षित के मुख्यमंत्री बनने के बाद दिल्ली वक्फ़ बोर्ड की नज़र संजय वन पर पड़ी थी। वक्फ़ बोर्ड ने वन के अंदर के पुराने भवनों को वक्फ संपत्ति बताकर क़ब्ज़ा शुरू कर दिया। आज भी वक्फ़ बोर्ड यही कर रहा है। इसी का परिणाम है कि लॉकडाउन के दौरान कुछ लोगों ने वन के अंदर निर्माण कार्य कर लिया।

भले ही डीडीए कुछ भी कहे, महरौली के स्थानीय लोग मानते हैं कि संजय वन जमीन जिहाद का शिकार हो चुका है। लोगों ने यह भी कहा कि जिस मुसलमान व्यक्ति की पुलिस से शिकायत की गई है, वह केवल एक मोहरा है। उसके पीछे ज़मीन जिहाद करने वाले तत्व डटकर खड़े हैं और इनकी संख्या का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।

महरौली के अनेक लोगों ने बताया कि इस वन पर काफी समय से दिल्ली वक्फ़ बोर्ड की नजर है। चूँकि वन के अंदर जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पुराने ढाँचे और क़ब्रें हैं, वक्फ़ बोर्ड का कहना है कि ये सब वक्फ़ संपत्तियां हैं। इसलिए उसकी देखरेख में पिछले दो दशक में वन के अंदर बड़ी संख्या में मस्जिद और मदरसे बन गए हैं।

मामले को लेकर मुखर घावरी ने कहा, ‘‘पहले तो स्थानीय लोग वक्फ बोर्ड की मंशा को समझ नहीं पा रहे थे, जब तक लोगों को उसकी मंशा समझ में आई तब तक बोर्ड ने हज़ारों गज़ ज़मीन पर क़ब्ज़ा कर लिया। 2013 में पहली बार लोगों ने बोर्ड की इस हरकत का विरोध करना शुरू किया। इसके बाद वक्फ़ बोर्ड किसी बड़ी जगह पर हथिया नहीं सका है, लेकिन अभी भी वह शांत नहीं बैठा है। इसी का परिणाम है कि लॉकडाउन के दौरान कुछ लोगों ने वन के अंदर निर्माण कार्य कर लिया।’’

दिल्ली वक्फ बोर्ड अपनी मनमानी चलाने के लिए फर्जी काग़ज़ात का सहारा लेता है। इसका एक उदाहरण संजय वन क्षेत्र का ही है। वन क्षेत्र में एक जैन मंदिर है। इसके पास ही एक बहुत ही पुराना और जर्जर सरकारी भवन है। 2013 में दिल्ली वक्फ़ बोर्ड ने उस भवन को घेरने के लिए चारदीवारी बनाने का काम शुरू किया, तो स्थानीय लोगों ने उसका विरोध किया। उस समय दिल्ली वक्फ बोर्ड ने कहा कि यह भवन भारत सरकार ने दिल्ली वक्फ बोर्ड को दे दिया है। फिर भी लोगों ने चारदीवारी नहीं बनने दी।

इसके बाद महरौली के लोगों ने दिल्ली सरकार के राजस्व विभाग से सी-1 फॉर्म के माध्यम से इस भवन के बारे में जानकारी मांगी गई। पता चला कि राजस्व विभाग के रोज़नामचे में यह दर्ज है कि वह भवन दिल्ली वक्फ बोर्ड को दे दिया गया है, लेकिन राजस्व विभाग यह नहीं बता पाया कि किसके आदेश से वह भवन दिल्ली वक्फ बोर्ड को दिया गया है।

घावरी इसे दिल्ली वक्फ़ बोर्ड का ज़मीन घोटाला मानते हैं। वे कहते हैं कि इस तरह नक़ली काग़ज़ात के आधार पर दिल्ली वक्फ बोर्ड अनेक सार्वजनिक और निजी संपत्ति पर क़ब्ज़ा कर चुका है। इस तरह के अनेक मामले न्यायालयों में भी चल रहे हैं।    

महरौली निवासी मनमोहन मल्होत्रा ने हमारे संवाद प्रतिनिधि को बताया कि वन के अंदर बने मदरसों में रहने वाले अधिकतर बच्चे दिल्ली से बाहर के होते हैं। मल्होत्रा ने कहा, ‘‘वोट बैंक की राजनीति करने वाले संजय वन पर कब्जा करवा रहे हैं। कुछ नेताओं का रवैया बहुत ही शर्मनाक है। वे लोग देश से बड़ा कुर्सी को मानते हैं और उस कुर्सी के लिए एक खास वर्ग को सरकारी संपत्ति पर भी कब्जा करने की छूट दे देते हैं।’’ 

महरौली के ही एक अन्य निवासी मयंक गुप्ता कहते हैं कि केवल संजय वन ही नहीं, बल्कि महरौली के आसपास की सभी पुरानी सरकारी इमारतों पर मुसलमानों ने कब्जा कर लिया है। इनमें मेवात, राजस्थान आदि राज्यों से लाकर लोगों को रखा जाता है।

कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि दिल्ली में वक्फ बोर्ड ज़मीन जिहाद कर रहा है। इस जिहाद को रोकने की ज़रूरत है, नहीं तो आने वाले दिनों में यह दिल्ली में अनेक समस्याएँ पैदा करेगा।

दिल्ली ज़मीन जिहाद को झुठलाता ‘फ़ैक्ट-चेक’

इस दावे को झूठा बताते हुए पिछले साल लल्लन टॉप ने एक ‘फ़ैक्ट-चेक’ रिपोर्ट प्रकाशित की थी, लेकिन दावे को “फ़र्ज़ी” बताने के लिए उपर्युक्त मीडिया हाउस को एक मुसलमान ‘स्कॉलर’ के अलावा कोई नहीं मिला।

कथित स्कॉलर राना सफ़वी की एक पुरानी ट्वीट के हवाले से लल्लन टॉप ने भाजपा और विहिप के दावों को ग़लत बताया। ट्वीट में राना सफ़वी इन क़ब्रों को 12वीं सदी की बताती हैं हालांकि इसपर लगी सीमेंट बिल्कुल ताज़ी है। यही नहीं, 12वीं सदी में निर्माण कार्य में सीमेंट का इस्तेमाल नहीं होता था।

सबसे बड़ी बात यह कि वीडियो बनाने वालों ने जब असली और नक़ली पुलिस वालों से जवाब तलब किया तो बिना परिचय पत्र के ख़ुद तो दिल्ली पुलिस के बताने वाले लोग इन क़ब्रों के बचाव में कुछ नहीं कह पाए, बल्कि कैमरा से मुँह छुपाने की कोशिश करते रहे। प्रमाण के लिए यह विडियो देखिये —

Publishing partner: Uprising

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