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Saturday 4 April 2020

30 साल से ज़िन्दगी तलाशते कश्मीरी हिन्दू

सन 1990 — मस्जिदों से हिन्दुओ के सफाए के पैगाम आए; एक के बाद एक दिल दहलाने वाली खबर आई; जुमे की नमाज़ के बाद सड़को पर जो भी हिन्दू दिखा, काट दिया गया

Editorials

Vidhu Rawal
Vidhu Rawalhttps://www.sirfnews.com/
Haryana state vice-president BJP (Yuva Morcha)

In India

सन 1990 में लाखों कश्मीरी हिन्दू शरणार्थी जो कश्मीर घाटी से जम्मू, दिल्ली और भारत के अन्य शहरों में जान बचाते हुए आए थे, उनमें 9 साल का विपिन भी शामिल था जिसके पिता की कुछ दिन पहले अलगावादियों ने बीच सड़क हत्या कर दी थी। बीमार माँ और तीन साल की एक छोटी बहन थी।

कश्मीर में ज़बरदस्त दहशत का माहौल था, वहाँ रह रहे हिन्दू डर और अफवाह के मारे मर-मरकर जी रहे थे! दिन प्रति दिन की खबरें एक-एक पहर जीना कठिन करती जा रही थी। चारों तरफ लूटपाट, हत्या, आगजनी और कत्लेआम की पिशाच लीला हो रही थी, ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे डराने लगे थे। श्रीनगर के रैनावाड़ी मोहल्ले के हिन्दू लोग अपनी जान-माल की रक्षा के लिए पूरी तरह पास में रहने वाले मुसलमानों पर निर्भर हो गए थे। लेकिन मस्जिदों से अब हिन्दुओ के सफाए के पैगाम आने लगे थे और एक के बाद एक आ रही खबरों से दिल दहल जाता था। जुमे की नमाज़ के बाद सड़को पर जो भी हिन्दू दिखता, काट दिया जाता। ऐसे ही एक कत्लेआम का शिकार विपिन के पिता जवाहरलाल भी हुए थे जो पास के एक स्कूल में मास्टर थे। जवाहरलाल को कश्मीर की आज़ादी के प्रदर्शन में जाने के लिए मज़बूर किया गया और शायद बाकी प्रदर्शनकारी जवाहरलाल के अभिनय से अधिक प्रभावित न हुए हों इसलिए प्रदर्शन के बाद में उन्हें बीच सड़क कत्ल कर दिया गया!

मुस्लिम बाहुल्य स्कूल में पढ़ने वाले विपिन को भी क्रिकेट मैच में पाकिस्तान की भारत पर बाकी बच्चों के साथ जीत का झूठा जश्न मनाना पड़ता था। लेकिन जब कभी भारत जीत जाता तो उसके लिए स्थिति बहुत मुश्किल हो जाती थी। स्कूल के छोटे छोटे बच्चे भी सेना पर हुए ग्रेनेड हमलों का मज़ाक बनाते कि फलां इलाके को हिन्दुस्तान के कब्जे से छुड़वा लिया है। स्थिति हर दिन बद से बदतर होती जा रही थी। सुरक्षाकर्मी थे, लेकिन इतने नहीं कि वो उनकी जान और सामान की सुरक्षा कर सकें।

फिर एक दिन श्रीनगर की दीवारों पर फरमान लिख दिया गया कि हिन्दुओं या तो इस्लाम कबूल करो या अपनी औरतों को छोड़कर कश्मीर से चले जाओ। जम्मू जाने वाली बसों और टैक्सियों पर भी हमले और लूटपाट हो रहे थी। महिलाओं को बसों और टैक्सियों से उतार कर अपहरण कर लिया जाता था। पक्की खबर थी कि उस रात रैनावाड़ी पर हमला होने वाला है। 19 जनवरी 1990 की वो अंधेरी रात कोई कश्मीरी हिन्दू कैसे भूल सकता है जब कड़ाके की ठंड में आधी रात को हिन्दू अपनी गायें और बकरियों को आज़ाद कर उपर पहाड़ियों की तरफ निकल गए। घरों में सामान बिखरा पड़ा था। गैस स्टोव पर देग़चियां और रसोई में बर्तन इधर-उधर फेंके हुए थे। घरों के दरवाज़े खुले थे। लगता था जैसे भूकंप के कारण घर वाले अचानक अपने घरों से भाग खड़े हुए हों… थोड़ी ऊँचाई पर पहुँचने के बाद जब उन्होंने पलट कर अपने घरो को देखा तो सब जले हुए दिख रहे थे!

विपिन अपनी छोटी बहन का हाथ पकड़कर बीमार माँ और पड़ोसियों के टोले के संग सुरक्षित स्थान ढूंढते हुए निकला था। रात भर अंधेरे में जगह जगह जले हुए गाँव, धार्मिक स्थल और रास्ते में बिखरी हुए लाशो से बचते हुए चलते रहे! चलते-चलते पैरो में छाले फफोले हो गए और भूख से अंतड़ियाँ ऐंठ चुकी थी। टोले का अलिखित नियम था की घायल के लिए सबकी जान दांव पर नहीं लगाई जा सकती हैं, सबको आगे बढ़ते रहना हैं, किसी भी हमले की स्थिति में पुरुष लड़ेंगे और महिलायें और बच्चे भाग जायेंगे! चलते-चलते विपिन की माँ की तबियत और ज्यादा खराब हो गई थी, चल नहीं पा रही थी! साथ के लोग कुछ समय तक कंधे पर डाल कर ले जाते रहे, लेकिन मौत का मंजर और ‘अल्लाह हूँ अकबर’ की पीछा करती आवाजो ने उन्हें सख्त निर्णय लेने के लिए मजबूर कर दिया! एक जगह उसकी माँ ने कहा कि अपनी छोटी बहन की ऊँगली पकड़कर आगे चले, वह थोड़ा रुक कर आती हैं और कहीं भी रुकना नहीं, पलट कर आना नहीं। 9 साल का मसूम समझ ना सका और अपनी माँ की बात मानकर आगे निकल गया! एक-दो बार पलट कर देखा, उसकी माँ एक वृक्ष के नीचे बैठ कर उसे देख कर हाथ हिला रही थी। विपिन को लगा सब ठीक हैं और वह टोले संग बढ़ता गया। फिर वह फासला कभी ख़त्म ना होने वाली दूरियों में बदल गया!

20 जनवरी को जैसे-कैसे जम्मू पहुँचे और फिर जम्मू से दिल्ली के एक रिफ्यूजी कैम्प में। तीन साल की छोटी बहन और बाकी रिश्तेदारों के साथ विपिन रिफ्यूजी कंप में ही रहने लगा। थोड़ा सा बड़ा हुआ तो समझ आया की उसकी माँ ने अपने बच्चो की जान बचाने की खातिर उन्हें अपने से दूर कर दिया और चलते रहने का निर्देश दिया था। बरसों तक तो उसे यही लगता रहा की माँ उसी वृक्ष के नीचे बैठी होगी।

पिछले 30 वर्षों से अपने ही देश के शरणार्थी कम्पों में बंधकों की तरह जिन्दगी गुज़ारने को मजबूर लाखों कश्मीरी हिन्दू अपने घर वापिस जाने की आज़ादी का इंतजार कर रहे हैं। वक़्त बदला है, 1990 के दशक में ‘आज़ादी’ के जो नारे कश्मीरी हिन्दुओं को आंतकित कर उनकी सांसे रोक देते थे, वही नारे आज जेएनयू से अलीगढ़ और जामिया से जाधवपुर विश्विद्यालयों में लगने लगे हैं। विपिन भी आज़ादी चाहता है, उस ‘इस्लामिक आतंकवाद’ से आज़ादी जिसने उसके माँ-बाप, घर, बचपन और सब कुछ उससे छीन लिया है।

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