कांग्रेस की विभाजक नीति को कर्नाटक ने किया अस्वीकार

कांग्रेस के कुछ नेताओं की ओर से दबे स्वर में कहा भी जा रहा है कि बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया जा सकता है

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भारत की चुनावी राजनीति में असफल होने का जैसा अनूठा रिकॉर्ड राहुल गांधी ने बनाया है, उसे तोड़ पाना शायद किसी भी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष के लिए आसान नहीं होगा। राहुल गांधी के खाते में सिर्फ पंजाब की ही सफलता दर्ज है। इसके अलावा उनकी अगुवाई में कांग्रेस को सिर्फ हार का ही सामना करना पड़ा है। कर्नाटक चुनाव में भी एक बार यही राहुल गांधी ने अपने चुनावी इतिहास को दोहराया। इस चुनावी परीक्षा में राहुल गांधी तो फेल हो ही गए, 21 महीने के राजनीतिक विश्राम के बाद चुनावी राजनीति में अपनी पार्टी में जान फूंकने के इरादे से प्रचार करने उतरीं यूपीए की चेयरपर्सन सोनिया गांधी भी फेल हो गईं। कांग्रेस का दावा था कि सोनिया गांधी के चुनाव प्रचार में उतरने से कांग्रेस के सुप्त पड़े कार्यकर्ता भी उत्साहित होंगे और राज्य में सिद्धारमैया की अगुवाई में कांग्रेस की सरकार आसानी से दोबारा बन जाएगी लेकिन ऐसा हो नहीं सका।

राहुल की भाषणबाजी तो नहीं ही चली, सोनिया गांधी भी कोई करिश्मा नहीं दिखा सकीं। इस तरह दक्षिण भारत का एक बड़ा राज्य कांग्रेस के हाथ से निकल गया। प्रचार के दौरान बीजेपी नेताओं की ओर से बार-बार कहा जा रहा था कि चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस सिर्फ कांग्रेस पीपीपी बनकर रह जाएगी। यानी कांग्रेस पंजाब, पुडुचेरी और परिवार (नेहरू-गांधी परिवार) की पार्टी बनकर रह जायेगी। यह बात भले ही उस समय व्यंग्य के लिहाज से कही गई हो, लेकिन चुनाव परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि अब कांग्रेस के पास सिर्फ पंजाब, पुडुचेरी और मिजोरम ही बचे रह गये हैं। इन तीनों राज्यों में से बड़े राज्य के तौर पर सिर्फ पंजाब को ही माना जा सकता है। कांग्रेस सच में कांग्रेस पीपीएम बनकर रह गयी है। सौ साल से ज्यादा पुरानी इस पार्टी का ये हश्र होगा, ऐसा अनुमान देश के किसी भी राजनीतिक पंडित को चार-पांच साल तक अनुमान नहीं था। लेकिन अपनी जनविरोधी नीतियों और भ्रष्टाचार के रिकॉर्डतोड़ कारनामों की वजह से ही आज कांग्रेस ऐसी दयनीय स्थिति में पहुंच गई है।

जहां तक कर्नाटक के चुनाव परिणामों की बात है, तो 12 मई को मतदान होने के बाद ही इस बात का एहसास हो गया था कि कांग्रेस पूर्ण बहुमत में नहीं आने वाली है। इस बात को उस समय और बल मिला, जब सिद्धारमैया ने कहा कि वह कांग्रेस आलाकमान के कहने पर किसी दलित को भी मुख्यमंत्री पद सौंपने के लिए तैयार हैं। दरअसल कांग्रेस पार्टी भी मतदान के रुझान से ही समझ चुकी थी कि इस बार जनता उन्हें पूर्ण बहुमत नहीं देने वाली है। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के लिए सरकार बना पाना तभी संभव हो सकता था, जबकि जेडीएस कांग्रेस का समर्थन करे। लेकिन जेडीएस प्रमुख एचडी देवेगौड़ा और सिद्धारमैया के बीच के तल्ख रिश्तों के कारण यह भी स्पष्ट था कि किसी भी स्थिति में जेडीएस सिद्धरमैया को मुख्यमंत्री बनाने के लिए तो कांग्रेस का समर्थन नहीं करेगा। इसी कारण कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धरमैया को इस बात के लिए राजी कर लिया था कि वह मुख्यमंत्री पद का मोह त्याग दें और पार्टी हित में जरूरत पड़ने पर देवेगौड़ा की पसंद के किसी व्यक्ति को राज्य का मुख्यमंत्री स्वीकार कर लें।

सिद्धारमैया इस चुनाव के पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं यह चुनाव उनका आखिरी विधानसभा चुनाव है। इसके बाद वे चुनावी राजनीति से अलग हो जायेंगे। ऐसे में सिद्धारमैया के लिए मुख्यमंत्री पद का मोह छोड़ पाना आसान नहीं था। लेकिन पार्टी आलाकमान के कहने पर उन्होंने अपनी स्थान पर किसी दूसरे व्यक्ति को भी मुख्यमंत्री पद पर स्वीकार करने की बात मान ली थी। अब चुनाव परिणामों से स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस सामान्य हालत में तो अपनी सरकार नहीं ही बना सकती है। हां यह जरूर है कि अगर एक बार फिर 2004 की तरह एन. धर्मसिंह वाला फार्मूला चल गया तो कांग्रेस की सरकार बन सकती है।

कांग्रेस के कुछ नेताओं की ओर से दबे स्वर में कहा भी जा रहा है कि बीजेपी को सत्ता से दूर रखने के लिए जेडीएस नेता एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बनने का प्रस्ताव दिया जा सकता है। 2004 में इसी फॉर्मूले के कारण बीजेपी सबसे ज्यादा सीट जीतने के बाद भी सरकार नहीं बना सकी थी, जबकि कांग्रेस और जेडीएस ने गठबंधन कर एन धर्मसिंह की सरकार बना ली थी। लेकिन अभी की स्थिति यही है कि कर्नाटक में बीजेपी की सरकार बनती नजर आ रही है और स्पष्ट हो गया है कि कांग्रेस को एक बार फिर बुरी तरह से हार का सामना करना पड़ा है। चुनाव के पहले कांग्रेस नेताओं को कर्नाटक से इंदिरा गांधी की तरह ही अपनी वापसी करने का भी भरोसा था। 1977 में जनता पार्टी के हाथों बुरी तरह से हार का सामना करने के बाद जब कांग्रेस का मनोबल बुरी तरह से गिरा हुआ था तब कर्नाटक के चिकमगलूर उपचुनाव ने कांग्रेस को नया जीवन दिया था। चिकमगलूर के उपचुनाव में इंदिरा गांधी उम्मीदवार थीं और उन्होंने वहां पर जबरदस्त जीत हासिल की थी। चिकमगलूर की जीत के बाद कांग्रेस न केवल उत्साहित हुई, बल्कि 1980 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत की नींव भी चिकमगलूर की जीत को ही माना जाता है। कांग्रेस को उम्मीद थी कि 2014 में बीजेपी के हाथों हुई करारी हार के बाद अब कर्नाटक में पार्टी अपनी जीत से आगे के विजय अभियान की शुरुआत करेगी। कांग्रेस ने कर्नाटक में जीत के लिए हर हथकंडा अपनाया। सिद्धारमैया ने कन्नड़ भाषा विवाद को लेकर भी खुलकर भाषा आंदोलन का समर्थन किया। यही नहीं उन्होंने कन्नड़ अस्मिता के नाम पर अलग अलग झंडे का भी दांव चला। और तो और बीजेपी के सबसे मजबूत वोट बैंक लिंगायत समाज में सेंध लगाने के लिए उन्होंने लिंगायतों को अल्पसंख्यक का दर्जा देने का भी एलान कर दिया। लेकिन समाज में बंटवारा करने की ये नीति भी कांग्रेस के काम नहीं आ सकी और कर्नाटक के मतदाताओं ने स्पष्ट कर दिया कि वे समाज को तोड़ने की नीतियों का समर्थन नहीं करते। परिणाम साफ है, दक्षिण का एक प्रमुख राज्य कांग्रेस के हाथ से निकल गया है और बीजेपी एक बार फिर दक्षिण के इस प्रमुख राज्य पर काबिज होती दिख रही है। बीजेपी की यह जीत इसी साल मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में होने वाले विधानसभा चुनावों में भी उसका मनोबल बढ़ाने का काम करेगी, जबकि इन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को गिरे हुए मनोबल के साथ जाना पड़ेगा। निश्चित रूप से इसका असर 2019 में होने वाले आम चुनावों पर भी पड़ेगा।

हिन्दुस्थान समाचार/दिव्य उत्कर्ष