कैराना जीतते ही ठीक हो गईं ईवीएम?

लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार तो है, पर लोकतंत्र उस स्थिति में नहीं चल सकता

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लोकसभा और कई राज्यों की विधानसभाओं के उपचुनावों के नतीजे सामने आ गए हैं। नतीजों के बाद अब तो ईवीएम की तथाकथित गड़बड़ी पर कोई सवालिया निशान नहीं खड़े कर रहा है। सब कुछ सामान्य हो गया है। विजयी उम्मीदवार और उनके समर्थकों में उत्साह है। इसमें कुछ भी गलत भी नहीं है। परिणाम सत्तारुढ़ बीजेपी के लिए कोई उत्साहवर्द्धक नहीं रहे। वे मिले-जुले रहे। विपक्ष को कई अहम सीटों पर विजय मिली। उत्तर प्रदेश की खासमखास कैराना लोकसभा सीट को विपक्ष की साझा मुस्लिम उम्मीदवार ने जीत लिया। ये सीट बीजेपी के कद्दावर नेता चौधरी हुकुम सिंह की मृत्यु के कारण रिक्त हुई थी। यहां पर बीजेपी की प्रत्याशित रही। कैराना में बीजेपी की पराजय के बाद सोशल मीडिया से लेकर विपक्ष का कोई भी नेता अब यह नहीं कह रहा कि विपक्षी उम्मीदवार की विजय ईवीएम में गड़बड़ी के कारण हुई। इसे सामान्य विजय माना जा रहा है। अब कहा जा रहा है कि कैराना क्षेत्र के गन्ना किसान सरकार की नीतियों से नाखुश थे। इसके चलते बीजेपी हारी। एक तर्क यह भी रखा जा रहा है कि कैराना में बीजेपी ध्रुवीकरण करने में विफल रही। कुछ यह भी कह रहे हैं कि बीजेपी को हराने के लिए इस्लाम खतरे में बताकर अल्पसंख्यको को भयभीत कर एकमुश्त वोटिंग करवाई। अब तो यह भी कहा जा रहा है कि बीजेपी हारी और जीत इस्लाम की हुई है।

निराशावादी और कुंठित तत्व बीजेपी की तमाम राज्यों में विजय को ईवीएम का चमत्कार बताने वाले अचानक से नदारद हो गए हैं। स्पष्ट है कि इन्हें किसी भी शर्त पर अपनी हार बर्दाश्त नहीं है। ये हारने पर अपनी खीज मिटाने के लिए ईवीएम की बात को बेशर्मी से ले आते हैं। ये निराशावादी और कुंठित तत्व तब भी चुप रहे थे, जब हालिया कर्नाटक विधान सभा चुनावों में बीजेपी स्पष्ट बहुमत पाने से रह गई थी। इन्हें तब भी ईवीएम में गड़बड़ी की बात कहने में कठिनाई हो रही थी। चूंकि वहां कांग्रेस और जनता दल (सेक्युलर) ने अब मिली जुली सरकार का गठन कर लिया है तो इन्हें ईवीएम में गड़बड़ नजर नहीं आई। तब इन्होंने चुनाव आयोग को कोसा नहीं। पिछले पंजाब विधान सभा चुनावों में कांग्रेस की विजय और बीजेपी-अकाली दल गठबंधन की हार को इन ईवीएम के पीछे पड़े बीमार मानसिकता के लोगों ने सहर्ष स्वीकार कर लिया था। आपको याद होगा कि पंजाब विधानसभा के नतीजों पर आम आदमी पार्टी ने ईवीएम में गड़बड़ी के आरोप लगाए थे, जिन्हें चुनाव आयोग ने खारिज कर दिया था। हालांकि उसी आम आदमी पार्टी ने तब ईवीएम में गड़बड़ी के मुद्दे को नहीं उठाया था, जब उसे दिल्ली विधानसभा चुनावों में 70 में से 67 सीटें मिली थीं। आखिर क्यों? अरविंद केजरीवाल को इस सवाल का जवाब तो देना ही होगा।

सर्वोच्च न्यायलय में भी ईवीएम मशीन में गड़बड़ी के मामले को लेकर आये, लेकिन किसी प्रकार यह साबित नहीं कर सके कि मशीन में छेड़छाड़ हुई। कुल मिलाकर ईवीएम में गड़बड़ी को लेकर मिथ्या और आधारहीन ही आरोप लगते रहे हैं। बोलते बैलेट पेपर के पक्ष में ईवीएम की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाने वाले बेशर्मी से मांग कर रहे हैं कि अगला लोकसभा चुनाव बैलेट पेपर से ही किया जाए| ईवीएम को गर्मी में लू, बरसात में पेचिश और सर्दी में जुकाम हो जाता है| जरा इनके तर्कों को सुन लीजिए। बैलेट पेपर के पक्ष में बोलने वाले यह भूल गए कि बैलेट पेपर से होने वाले मतदान के दौरान कितनी गड़बड़ होती थी। जमकर जाली मतदान होता था। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में दबंगजन गरीबों को पोलिंग बूथ पर ही पहुंचने ही नहीं देते थे। मत पत्रों को लूटकर ठप्पा मार देते थे।

उत्तर प्रदेश विधान सभा के चुनावी नतीजे आने के बाद बहुजन समाज पार्टी की अध्यक्ष मायावती ने ईवीएम की भूमिका पर सवाल उठाए थे। तब समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भी कहा था कि अगर किसी राष्ट्रीय पार्टी के अध्यक्ष ने ईवीएम पर सवाल उठाए हैं, तो उसकी जांच कराई जानी चाहिए। पर कैराना में मन-माफिक नतीजा आने के बाद ये दोनों ही नेता चुप हैं। ईवीएम पर अब ये सवाल खड़े नहीं कर रहे। अखिलेश यादव तो कोशिश कर रहे थे कि लखनऊ में उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री की हैसियत से मिले बंगले में दो साल तक और रहने की अनुमति मिल जाए। ये तो सरासर मजाक है कि जब आप चुनाव जीतते हैं तब ईवीएम मशीन सही हो जाती है और हारने पर आपको लगता है कि मशीन के साथ छेड़छाड़ की गई है। यानी ये नेता अपनी सुविधानुसार ईवीएम पर अपनी राय देते हैं। चुनाव आयोग ने 2006 में जब ईवीएम के इस्तेमाल पर सभी पार्टियों की बैठक बुलाई थी, तो किसी ने इसका विरोध नहीं किया था। सब ईवीएम के पक्ष में ही खड़े थे।

छेड़छाड़ संभव नहीं दरअसल सच्चाई यह है कि ईवीएम के साथ कोई छेड़छाड़ नहीं कर सकता है, क्योंकि ईवीएम का इंटरनेट का कनेक्शन ही नहीं होता है। यह एक स्टैंड अलोन हार्ड पेपर है। इसके चलते उसे ऑनलाइन हैक करना असंभव है। ईवीएम के माध्यम से होने वाले चुनावों में धांधली की बात करने वाले यह याद रखें कि किस बूथ पर कौन सी ईवीएम को भेजा जाएगा, इसके लिए पहले लोकसभा क्षेत्र फिर विधानसभा क्षेत्र और सबसे अंत में बूथ तय किया जाता है। यानी यह एक लंबी वैज्ञानिक प्रकिया है। यही नहीं, मतदान अधिकारियों को मतदान से एक दिन पहले ही मालूम चल पाता है कि उन्हें कौन सी ईवीएम दी जाएंगी। ईवीएम में दो यूनिट होती हैं, बैलट और कंट्रोल। अब इसमें एक तीसरी यूनिट वीवीपीएटी भी होती है, जो मतदाता को एक पर्ची दिखाती है। इससे वह आश्वस्त हो जाता है कि उसका वोट सही ही पड़ा है।

मतदान अधिकारी सुबह मतदान शुरू होने से पहले मतदान केंद्र पर सभी दलों के प्रत्याशियों के चुनाव अधिकारियों के सामने मॉक पोलिंग (कृत्रिम मतदान) कराते हैं। इस प्रकिया के पश्चात ही उम्मीदवारों के पोलिंग एजेंट मतदान केन्द्र की मतदान टोली के प्रमुख को सही मॉक पोल का प्रमाण पत्र भी देते हैं। ईवीएम मशीनों की इतनी सघन जांच के बाद भी अगर कोई इनमें अपना भरोसा नहीं जताता तो उसका कोई इलाज करना संभव नहीं है। वे लोकतंत्र का अपमान करते हैं और एक वैज्ञानिक लोकतांत्रिक प्रक्रिया का मखौल उड़ाते है। एक बात पर और गौर करना होगा कि देश में इस तरह के तत्व बढ़ते-फैलते चले जा रहे है, जो तब तक नाखुश रहते हैं जब तक उनके मन के मुताबिक फैसले नहीं होते। ये सुप्रीम कोर्ट पर संसद हमले और मुंबई धमाकों के गुनाहगारों क्रमश: अफजल गुरु और याकूब मेमन को फांसी दिए जाने से नाराज थे। इन्हें देश के इन दोनों शत्रुओं से सहानुभूति थी। लोकतंत्र में सबको अपनी बात कहने का अधिकार तो है, पर लोकतंत्र उस स्थिति में नहीं चल सकता, जब कुछ लोग देश की अहम संस्थाओं के खिलाफ ही मोर्चा खोल दें और बेबुनियाद तथ्यों को लेकर बकवास शुरू कर दें। ईवीएम पर हाय-तौबा मचाने वाले यही तो कर रहे हैं।

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