जो जीता वही चन्द्रगुप्त

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गुजरात चुनाव के नतीजे तो बाद में सामने आए; पराजय की सम्भावना से भयभीत और शर्मिंदा राजनेता पहले से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में ख़राबी का बहाना ढूंढ चुके थे। निर्लज्जता की पराकाष्ठ वे तब पार कर गए जब उनके सर्वोच्च नेता राहुल गाँधी ने विजयी दल को बधाई दे दी; निर्वाचन आयोग से इस बात की भी पुष्टि हो गई कि सभी मशीनों के नतीजे काग़ज़ी तौर पर प्रमाणित हो चुके हैं — और फिर भी पाटीदार समुदाय के स्वयंभू नेता हार्दिक पटेल ट्वीट के द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में जीती भारतीय जनता पार्टी पर कटाक्ष करने से बाज़ नहीं आए। विभिन्न टेलीविज़न के चैनलों पर और अगले दिन अख़बारों के स्तंभों में कांग्रेस के प्रति दुर्बलता रखने वाले प्रतिनिधि विधवा-विलाप करते रहे और किस प्रकार 18 दिसंबर भाजपा की समुचित विजय की नहीं बल्कि राहुल के बड़े मंच पर आगमन की तिथि है यह लोगों को समझाने का भरसक प्रयास करते रहे। यह केवल पराजित पार्टी के प्रति चाटुकारिता का दृष्टान्त नहीं बल्कि विजयी के परिश्रम का अपमान है। भाजपा के अध्यक्ष अमित शाह प्रत्यक्ष कुछ भी कहें, उन्हें अन्दर ही अन्दर आभास था कि यह लड़ाई आसान नहीं होने वाली। इस कारण पन्ना प्रमुखों को इस तरह सक्रिय किया गया जो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास में अभूतपूर्व था। केंद्र पर आसीन, सन 1980 से प्रतिष्ठित (या 1951 से), विश्व की सबसे बड़ी पार्टी ने द्वार-द्वार खटखटाकर सभी नागरिकों से वोट की विनती करने से संकोच नहीं किया। अंत में इन तमाम तैयारियों से असंतुष्ट प्रधानमंत्री स्वयं मैदान में कूद पड़े। इतनी शिद्दत के साथ उन्होंने ख़ुद को लड़ाई में झोंका कि एक तरफ़ केन्द्रीय प्रशासन की थोड़ी अवहेलना करनी ही पड़ी तो दूसरी ओर वे अपना स्वर भी कम से कम दो बार खो बैठे। गला बैठ गया और रैलियों को संबोधित करने की अवस्था में वे नहीं रहे। कोशिश फिर भी जारी रही। पाकिस्तान का नाम लेकर और मणि शंकर अय्यर की बदतमीज़ी की याद दिलाकर गुजरातियों के स्वाभिमान को ठेस पहुँचाने की कोशिश हुई। यह कहना कठिन है कि उससे लाभ हुआ या नहीं, परन्तु जब गुजराती प्रधानमंत्री के तत्त्वावधान में गुजरात की नई सरकार के चलने का आश्वासन मिला तब शायद राज्य के वोटर प्रेम, अपनापन एवं गर्व की भावनाओं से द्रवित हो उठे।

दूसरी तरफ़ से केवल आलोचना हो रही थी। भाजपा सरकार की 22 साल के शासन की कमियाँ गिनवाई जा रही थी। आश्चर्य है कि कांग्रेस के होने वाले अध्यक्ष राहुल गांधी कोई विकल्प नहीं सुझा रहे थे — न आर्थिक, न प्रशासनिक, न सामाजिक। और तो और, जब आख़िर उनसे पूछा गया कि गुजरात के लिए उनकी विचारधारा न सही, उनका दर्शन क्या है तो दिग्भ्रमित दृष्टि से देखते हुए, तनिक सोचकर उन्होंने एक मनलुभावन जुमला रसीद कर दिया कि “गुजरात का विज़न गुजराती तय करेंगे”। राज्य के लोग गुजरात को कैसे भला अपने ध्येय के प्रति इतने अनिश्चित नेता के हाथों सौंप देते? वह भी तब जब कि स्थानीय कोई नेता मुख्यमंत्री पद के लिए घोषित न हुआ हो, आपस में क्लेश करने वाले तीन जातिवादी नेता केवल वोट की संख्या जोड़ने के लिए एकजुट हुए हों, 50% से अधिक आरक्षण का संवैधानिक सूत्र न बता पा रहे हों और ताइवान से आयातित मशरूम खा कर गोरे बनने का नुस्ख़ा बता रहे हों! ख़ैर, कम से कम इनमें से एक के सहारे सौराष्ट्र में कई सीटें मिलीं, पर कांग्रेस ने अपने गढ़ों से कई सीटें गँवाईं भी।

पराजय का अगला अध्याय सदैव आत्ममंथन होना चाहिए, आत्मश्लाघा कभी नहीं। पर कांग्रेस के चाटुकार अब भी उसी अभ्यास में तल्लीन हैं। आने वाले वर्ष में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, कर्णाटक, त्रिपुरा, मिज़ोरम, मेघालय और नागालैंड की चुनौतियों का सामना करने के लिए सर्वप्रथम अपनी कमियों का अहसास होना ज़रूरी है — जो कांग्रेस में नहीं दिख रहा। यह जो तरह-तरह के सलाहकारों के कारण राहुल गाँधी नित-नए मुद्दे उठाकर अगले दिन भूल जाया करते हैं और पत्रकारों के समक्ष प्रश्नों के अटपटे उत्तर देकर परिहास के पात्र बन जाते हैं — इसका समाधान क्या है? शिवराजसिंह चौहान और रमन सिंह सरीखे मुख्यमंत्रियों की काट कांग्रेस के पास क्या है? पूरे देश से सिकुड़ती कांग्रेस के प्रति इन राज्यों की जनता आस्था क्यों जताए? जिन भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे दल को उन्होंने नई दिल्ली की सत्ता से हटाया था उसे वापस शासक क्यों बनाए? ऐसे कठिन विषयों पर चिंतन-मनन के बजाय कांग्रेसी उन इतिहासकारों की तरह पेश आ रहे हैं जिन्होंने 326 ई० पू० भारतवर्ष के पश्चिमी छोर से पलायन करने वाले, घर लौटने को आतुर अपने सैनिकों का मनोबल न बढ़ा पाने वाले, और तीन साल में विषपान से या कमज़ोरी की बीमारी के कारण देह त्यागने वाले मैसेडॉन के सिकंदर तृतीय को सिकंदर-ए-आज़म के ख़िताब से नवाज़ दिया। अपने जीवन काल में ही सिकंदर उसी प्रकार मात खा रहे थे जैसे कि राहुल गाँधी 2004 से मात खाते आ रहे हैं — मोदी की हवा देश भर में चलने से काफ़ी पहले से! चन्द्रगुप्त मौर्य सिकंदर के रहते पंजाब का इलाक़ा जीत चुके थे और मोदी ने केवल ‘युवा’ राहुल को नहीं, प्रौढ़ और कुटील सोनिया गांधी को भी तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्षा के सक्रिय जीवन के उत्तुंग शिखर पर बतौर गुजरात मुख्यमंत्री और फिर प्रधानमंत्री मात दी है। भारत की नवीन रचना में इतिहास के पुराने, भ्रमित करने वाले मुहावरों का क्या काम? जो जीता वही चन्द्रगुप्त!