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जिन्ना पर जान निसार करती एएमयू

दरअसल राष्ट्रपति को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 7 मार्च 2018 को होने वाले दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होना था

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अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी (एएमयू) स्थायी रूप से विवादों में ही घिरी रहती है। यह उसके डीएनए का हिस्सा सा बन गया लगता है। यहां से दुर्भाग्यवश अकादमिक, खेल किसी अन्य क्षेत्र में बड़ी कामयाबियों के समाचार नहीं मिलते। राष्ट्रविरोधी गतिविधियों और राजनीतिक दलों के विरोध-समर्थन के जरूर मिलते हैं।ताजा मामला एएमयू छात्र संघ के दफ्तर में पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर केलगे होने का है। क्यों लगी है जिन्ना की तस्वीर वहां पर? इस स्वाभाविक सवाल पर एएमयू वाले यह सफाई दे रहे हैं कि जिन्ना सन 1938 में  एएमयू आए थे। उनकी तस्वीर तब से ही छात्र संघ के दफ्तर की शोभा बढ़ा रही है। यानी भारत के दो टुकड़े करवाने वाला इंसान केन्द्र सरकार के अनुदान पर पलने वाली यूनिवर्सिटी में सम्मानपा रहा है। इसे कहते हैं आस्तीन में सांप पालना।जिन्ना की तस्वीर के लगे होने को सही बताते हुए कुछ तथाकथित सेक्युलरवादी कह रहे हैं कि जिन्ना तो बहुत महान नेता थे। वे कभी कांग्रेस में भी रहे। उनका देश की आजादी में योगदान था। कुल मिलाकर ये सब पिलपिले तर्क हैं। यही सारी बातें तो नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, डाक्टर केशव बलीराम हेडगेवार और डाक्टर श्यामा प्रसाद मुखर्जी पर भी लागू होती हैं न? तो इनके फोटो क्यों नहीं लगाये? अगर जिन्ना इतने महान होते तो मजहब के नाम पर देश को तोड़ते नहीं। वे इतने महान नेता थे कि उन्होंने एक दिन भी जेल में नहीं बिताया। खैर, ताजा विवाद के बाद भी लगता है कि एएमयू कोकोई कुछ नहीं कहेगा। वहां पर जिन्ना शान से अपनी जगह पर टंगे ही रहेंगे।

महामहिम को चुनौती

जिन्ना से जुड़े ताजा विवाद से पहले अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी छात्र संघ ने

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के एएमयू में आने पर भी बवाल खड़ा कर दिया था। दरअसल राष्ट्रपति को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 7 मार्च 2018 को होने वाले दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होना था। लेकिन, इस समारोह से पहले ही राष्ट्रपति कोविंद को निमंत्रण देने के सवाल पर विरोध के स्वर उठने लगे थे। छात्र संघ ने अपनी यूनिवर्सिटी प्रशासन से कहा था कि वो कैंपस में किसी राष्ट्रीय स्वयं संघ के कार्यकर्ता को बुलाये जाने का विरोध करते हैं। छात्र संघ ने कहा था कि इस कार्यक्रम में यदि कोई संघ से जुड़ा कार्यकर्ता आया, तो वे उसका पुरजोर विरोध करेंगे।

जब इन सिरफिरे छात्र संघ नेताओं की धमकी का विरोध शुरू हुआ तो उन्होंने अपने विरोध की लाइन ही बदल दी। फिर ये कहने लगे कि हमारा विरोध राष्ट्रपति के आने से नहीं है, बल्कि; उस संघी मानसिकता से है जो कि मानवता के खिलाफ है। ‘अगर कोई संघी या महात्मा गांधी की हत्या से जुड़ा अथवा बाबरी मस्जिद विध्वंस में शामिल व्यक्ति इस दीक्षांत समारोह में शामिल होता है, तो उसके साथ क्या किया जाना चाहिए, ये सभी जानते हैं।” छात्र संघ को इस तरह की दादागिरी और गुंडागर्दी करने की इजाजत आखिर किसने दे दी? अलीगढ़ के कैंपस में संघ से जुड़े लोग नहीं आएंगे,यह नापाक फतवा देने की अनुमति किसने दे दी? यह तो हद ही हो गई? जिन्ना को अपना नायक मानने वाली छात्र संघ से कोई यह तो पूछ ले कि यदि राष्ट्रपति अपने केन्द्रीय विश्वविद्यालय के कैंपस में नहीं आएंगे तो फिर मंगल ग्रह से किसी को बुलाया जाए? क्या ये चाहते थेकि पाकिस्तान से कोई दीक्षांत समारोह में आये? लोकतंत्र में वैसे सभी को अपनी राय देने का अधिकार है। लोकतंत्र सभी को अपनी बात कहने का इजाजत जरूर देता है। लेकिन, राष्ट्रद्रोह की इजाजत हरगिज नहीं।क्या ये संघ की तुलना आईएसआई से करना चाहते हैं?  इन्हें क्या मालूम संघ की कुर्बानियों के बारे में? ये कुएं के मेढ़क से भी बदतर हैं। ये बड़े आए कागजी हैं क्रांति करने वाले। इन्हेंसमझना पड़ेगा कि हम समस्त भारतवासी एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में जी रहे हैं, जिसके अंतर्गत उन्हें सभी प्रकार के विचारों को सम्मान करना सीखना ही होगा। नहीं तो उन्हें देश के युवा ठिकाने लगा देंगे।अगर लोकतंत्र में देश की जनता ने किसी भी सरकार को चुना है तो वही जनादेश है। उस जनादेश का सम्मान करना ही होगाIरोकर के करो या गा करके करो देश में सम्मान से जीना है तो पहले प्रचंड जनादेश का सम्मान करना सीखे।मुझे इन छात्र संघ के नेताओं के मानसिक दिवालिया पर भी तरस आता है। ये एक तरफ तो अपने को गांधी का अनुयायी बताते हैं। राष्ट्रपति के इनके कैंपस में आने पर ये गांधी और संघ को बीच में घसीट ले आए थे। अब ये जिन्ना को अपना आदरणीय मानने लगे हैं। जिन्ना तो घनघोर गांधी विरोधी था। वः शख्स तो खुलेआम बापू का अपमान करता था। पर इन अक्ल के दुश्मनों से कौन बहस करता रहे। खैर, ये संतोष की बात है कि राष्ट्रपति एएमयू यूनिवर्सिटी कैंपस में आए और सारा कार्यक्रम बिना किसी अप्रिय घटना के सम्पन्न हो गया। इन बंदरघुड़की देने वाले राष्ट्रद्रोहियों की अक्ल ठिकाने लग गई जबकि प्रशासन ने सख्त रुख अपनाया।

बात यहीं पर ही खत्म नहीं हो रही। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में दलित-आदिवासी और ओबीसी आरक्षण भी लागू नहीं है।अलीगढ़ और जामिया मिलिया यूनिवर्सिटी में अल्पसंख्यक दर्जे के नाम पर दलित, आदिवासी और अन्य पिछड़े वर्ग के छात्रों को मिलने वाला आरक्षण नहीं मिलता। इन दोनों में अल्पसंख्यक सहैसियत की आड़ में दलित-आदिवासी और ओबीसी छात्रों को संविधान प्रदत्त आरक्षण और अन्य सुविधाओं को नकारा जाना वास्तव में गंभीर मामला है।हालांकि, अब केन्द् सरकार की कोशिश शुरू हो रही कि जामिया मिलिया विश्वविद्यालय और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में इन छात्रों को भी उनका संवैधानिक अधिकार मिले। यह वास्तव में एक गहन शोध का विषय है कि इन दोनों विश्वविद्यालयों में दलित-आदिवासी और ओबीसी छात्रों के हक अबतक किसे दे दिये गए? अब कहा जा रहा है कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी 1920 से ही एक सेंट्रल यूनिवर्सिटी है और आज़ादी के बाद जो देश में चार केंद्रीय विश्वविद्यालय थे, अलीगढ़ भी उनमें से एक था। उसका एक अल्पसंख्यक चरित्र है। उसे बनाया ही गया था भारतीय मुसलमानों को आगे बढ़ाने के लिए। उसका अल्पसंख्यक दर्जा ख़त्म करने से उसकी ये पहचान ही ख़त्म हो जाएगी। ये चिंताएं बेबुनियाद हैं। ये सब तर्क इसलिए दिए जा रहे हैं ताकि दलित-आदिवासी और ओबीसी छात्रों को आरक्षण ना देना पड़े। क्या एएमयू यह बतायेगा कि उसमें कितने गैर-मुस्लिम छात्र पढ़ते हैं या पढ़कर अबतक निकले हैं?

यहां पर मुझे यही कहना होगा कि जामिया मिलिया इस्लामिया तो बढ़िया काम भी कर रहा है। जैसे कि हाल ही में संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएएसी) की परीक्षा को जादरअसल राष्ट्रपति को अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में 7 मार्च 2018 को होने वाले दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होना थामिया के 43 छात्रों ने पास किया है। इन सभी छात्रों ने जामिया मिलिया इस्लामिया के ‘रेजिडेंशियल कोचिंगअकाडमी’(आरसीए) से कोचिंग ली थी। 43 छात्रों में से 15 छात्राएं हैं। गत वर्ष यहां से 29 छात्रों ने यूपीएससी की परीक्षा को पास किया था। इस तरह की सकारात्मक खबरें अलीगढ़ से नहीं आतीं। कब आएंगी? कौन जाने। यह देश का दुर्भाग्य नहीं है तो और क्या हैं?

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