राहुल के लिए अच्छा है मोदी के सामने न बोलना

राहुल को भाषण के लिए पन्द्रह मिनट मिले या एक घन्टा, बातें यही रहेंगी। वैसे राहुल गांधी को यह समझना चाहिए कि आमजन के बीच उन्होंने ऐसी बातों से अपनी विश्वसनियता और गंभीरता दोनों को बहुत कम किया है

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यह संयोग था कि राहुल गांधी का अमेठी और नरेंद्र मोदी का लंदन में दिया गया भाषण लगभग एक साथ चर्चा में आया। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अमेठी में एक दिलचस्प बात कही। उनके अनुसार लोकसभा में पन्द्रह मिनट बोलने का मौका मिले तो नरेंद्र मोदी कहीं नहीं टिकेंगे। इसमें पहली बात यह कि राहुल को लोकसभा में बोलने के अनेक बार अवसर मिले हैं। लेकिन वह लोगों को कितना प्रभावित कर सके, वह कितनी गंभीरता दिखा सके या नरेंद्र मोदी को उनके भाषण से कितनी परेशानी हुई, इस बारे में किसी को गलतफहमी नहीं होगी। अनेक बार राहुल ने सरकार पर निशाना लगाने के लिए मल्लिकार्जुन खड़गे और ज्योतिरादित्य सिंधिया को आगे किया, खुद पीछे बैठे रहे। इसके अलावा संसद में लगातार हंगामा करने की रणनीति भी राहुल ने ही बनाई थी। इस प्रकार सरकार के खिलाफ अपनी बात रखने के कई अवसर राहुल ने हंगामे के हवाले कर दिए। ऐसे में पहली बात तो यह कि राहुल खुद संसद में पर्याप्त बोलने से बचते रहे हैं।

दूसरी बात यह कि शीर्ष नेताओं के लिए अपनी बात रखने के लिए संसद एक मात्र मंच नहीं है। अमेठी से लेकर लंदन, कोलंबिया तक वह चाहे जहां बोलें उनको उतना ही प्रचार मिलता है। तीसरी बात यह कि राहुल के पास मोदी के खिलाफ बोलने को कुछ भी नया नहीं है। न उनकी बातों में कोई रहस्य है। पिछले चार वर्षों से घुमा फिरा कर वह एक ही जैसे बयान दे रहे हैं। इसमें अपने को बेहद ईमानदार, आर्थिक रूप से कमजोर, सादगी में महात्मा गांधी जैसे, गरीबों, वंचितों, दलितों के मसीहा बताने का मकसद रहा है। जबकि इन सभी विशेषताओं का उल्टा नरेंद्र मोदी का लक्षण बताया जा रहा है। वह भ्रष्टाचार में डूबे हैं, सूट-बूट की सरकार चला रहे हैं। गरीबों, वंचितों, दलितों को कुचल रहे हैं। उनके विरोधी हैं, भारत के आमजन के धन हड़प कर विजय माल्या, नीरव मोदी को दे दिया, उन्हें भगा दिया आदि।

राहुल को भाषण के लिए पन्द्रह मिनट मिले या एक घन्टा, बातें यही रहेंगी। वैसे राहुल गांधी को यह समझना चाहिए कि आमजन के बीच उन्होंने ऐसी बातों से अपनी विश्वसनियता और गंभीरता दोनों को बहुत कम किया है। फिर भी यह मानना होगा कि राहुल की लोकसभा में बोलने की जो तमन्ना थी, वह अमेठी के हालिया दौरे में पूरी हो गई। दूसरा संयोग लंदन में बना। भारतीय समुदाय से नरेंद्र मोदी का संवाद का कार्यक्रम पूर्व निर्धारित था। जब यह कार्यक्रम तय हुआ था, तब कोई नहीं जानता था कि राहुल पन्द्रह मिनट बोल कर मोदी को उखाड़ने का दावा करेंगे। या उसी समय एटीएम में कैश की किल्लत होगी और राहुल कहेंगे कि नरेंद्र मोदी ने नीरव मोदी को देश का खजाना दे दिया। फिर भी नरेंद्र मोदी के संवाद कार्यक्रम में अनेक महत्वपूर्ण बिंदु आये। यह लगा कि आज भी लोकप्रियता और विश्वसनीयता में नरेंद मोदी शीर्ष पर हैं। विपक्ष को उनके मुकाबले के लिए जमावड़ा करना पड़ रहा है। मोदी ने किसी का नाम नहीं लिया। लेकिन उनकी बात में राहुल के सवालों का जबाब था। सत्तर वर्ष में अठारह हजार गांवों में बिजली नहीं पहुंच सकी थी। मोदी ने यहां बिजली पहुंचाने का संकल्प लिया और उसे पूरा करके दिखाया। एक हजार दिन में यह कार्य लगभग पूरा कर दिया गया। इसी तरह सीमित समय में करोड़ों की संख्या में गरीब परिवारों के लिए शौचालय बनाये गए। चार करोड़ परिवारों को बिजली के कनेक्शन दिए गए।

नरेंद्र मोदी ने लंदन के सेंट्रल हॉल वेस्टमिंस्टर में ‘भारत की बात-सबके साथ’ कार्यक्रम को बहुत सराहना मिली। मोदी ने ठीक कहा कि उन्हें विपक्ष की आलोचना से समस्या नहीं है। लेकिन आलोचना करने के लिए रिसर्च करना चाहिए और उचित तथ्यों का पता लगाना चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा। अब सिर्फ आरोप लगाए जाते हैं। करोड़ों की संख्या में वंचित परिवारों को गैस कनेक्शन दिए गए। मुद्रा योजना से गरीबों और छोटे व्यवसायियों को लाभ मिला। दस करोड़ गरीबों को पांच लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा दिया जा रहा है। फसल बीमा को पहली बार इतना व्यापक बनाया गया। विजय माल्या, नीरव मोदी कांग्रेस की ही देन है। मोदी सरकार इस व्यवस्था पर नकेल कस रही है। आधे से ज्यादा इनकी संपत्ति जब्त हो चुकी है। इसके अलावा मोदी की सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात नीयत को लेकर थी। उन्होंने कहा कि वह भी आम व्यक्ति हैं। गलतियां हो सकती हैं। लेकिन उनकी नीयत में खोट नहीं है। ऐसा नहीं कि मोदी ने कहा इसलिए यह बात ठीक है। आज लोगों को मोदी की नीयत पर विश्वास है। इस मुकाबले में कोई नेता उनके आस पास भी नहीं है। राहुल को यही बात समझनी चाहिए। किसी की नीयत पर विश्वास बातों से नहीं, कार्यों से बनता है। कांग्रेस के सामने यही कठिनाई है। वह जब गरीबों के प्रति हमदर्दी दिखती है, तो सवाल उसकी तरफ भी उठता है। उसने सबसे अधिक समय तक शासन किया। फिर भी बहुत गरीबी है, बेरोजगारी है। कांग्रेस आर्थिक गड़बड़ी का आरोप लगाती है, तो फिर उस पर सवाल उठते हैं। आज कुछ लोग विदेश भागते हैं, तो चर्चा हो जाती थी। पहले काला धन कितनी मात्रा में विदेश भेजा जाता था, इसकी चर्चा लोग भूले नहीं हैं। ऐसी बातों से राहुल का मोदी से मुकाबला करना मुश्किल होगा।

हिन्दुस्थान समाचार/डॉ. दिलीप अग्निहोत्री