राजस्थान में अंदरूनी हलचल ही होंगे प्रभावी

हालांकि प्रदेश के गृहमंत्री गुलाबचन्द कटारिया सभी अटकलों को खारिज करते हुए कहते हैं- कर्नाटक में जो राजनीतिक घटनाक्रम हुआ, उसका राजस्थान के चुनाव में कोई असर नहीं पडेगा

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राजस्थान में इसी वर्ष के अंत में विधानसभा चुनाव होने हैं। राज्य के दोनों ही प्रमुख दल अपनी चुनावी रणनीति बनाने में जुटे हैं। पिछले दिनों कर्नाटक में हुए हाईप्रोफाइल सियासी ड्रामे की छाया राजस्थान के विधानसभा चुनाव में पड़ेगी, ऐसी अटकलें लगाई जा रही हैं। हालांकि राजस्थान का इतिहास रहा है कि यहां के चुनावों पर कभी भी पड़ोसी राज्यों उत्तरप्रदेश, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, गुजरात और मध्यप्रदेश के नतीजों का ज्यादा असर नहीं पड़ा। गुजरात और मध्यप्रदेश में तो लंबे समय से भाजपा सत्ता पर काबिज है लेकिन राजस्थान में हर पांच साल में सत्ता बदलती रही है। ऐसे में सुदूर कर्नाटक के चुनावी नतीजों का राजस्थान में असर पड़ेगा, ऐसी संभावना ना के बराबर है। कर्नाटक में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के बाद भाजपा के केन्द्रीय नेतृत्व की नजरें मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान पर है। इसी को ध्यान में रखते हुए भाजपा की योजना में जुलाई से दौरे, गोष्ठियां और यात्राएं शुरू करने की है। राज्य सरकार की दर्जनों जनकल्याणकारी योजनाओं के बावजूद यहां सरकार के कामकाज को लेकर लोगों में नाराजगी देखने को मिल रही है।
भाजपा संगठन जनता और कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने में रात-दिन जुटा है। इसके परिणाम भी आ रहे हैं। बूथ लेवल से लेकर प्रदेश स्तर तक पार्टी एक्टिव मोड पर है। राज्य में 200 विधानसभा और 25 लोकसभा की सीटें है। विधानसभा चुनाव के महज चार माह बाद ही लोकसभा के चुनाव हैं। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की कर्नाटक में सरकार बनवाने में पर्दे के पीछे जो भूमिका रही है, उससे प्रदेश के कांग्रेस कार्यकर्ताओं और विशेषकर गहलोत समर्थकों में उत्साह है। वहीं भाजपा कार्यकर्ताओं के मन में सबसे बड़ी पार्टी होने के बाद भी सत्तासीन नहीं होने का दर्द कार्यकर्ताओं के जेहन में है। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष का पद लंबे समय तक खाली रहने को कांग्रेस मुद्दा बना रही है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट कहते हैं- भाजपा के अंदर प्रदेश अध्यक्ष की कमान कोई भी संभालने को तैयार नहीं है।
भाजपा के नेता जानते हैं कि इस बार वे बुरी तरह से हारने वाले हैं तो हार का ठीकरा कोई भी अपने सिर नहीं लेना चाहेगा। इसके विपरित पंचायतराज एवं ग्रामीण विकास मंत्री राजेन्द्र राठौड़ हमेशा से ही कांग्रेस पर तीखे हमले बोलते आए हैं। वे कहते हैं- कांग्रेस कई गुटों में बंटी है। ऐसे में उसके सत्ता में आने के सपने देखना मुंगेरीलाल के हसीन सपनों जैसा है। कांग्रेस के ये ख्वाब कभी पूरे नहीं होंगे। भाजपा के बागी नेता और निर्दलीय विधायक हनुमान बेनीवाल और वरिष्ठ विधायक घनश्याम तिवाड़ी खुद पार्टी के लिए बड़ी चुनौती हैं। तिवाड़ी ने पार्टी से अलग होकर विधानसभा चुनाव लड़ने का एलान कर दिया है। वे मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की खुलकर मुखालफत कर रहे हैं। वहीं अन्य जगह भी कुछ विधायक गाहे- बगाहे अपनी सरकार पर टीका टिप्पणी करते नजर आते हैं। कांग्रेस में भी घमासान कम नहीं है। प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट का युवा नेता के रूप में तेजी से उभरना पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को रास नहीं आ रहा है। लिहाजा वे कई बार मीडिया के जरिए अपनी नाराजगी जाहिर करते रहते हैं। अपने जन्मदिन के एक दिन पहले मीडिया से बातचीत में गहलोत ने कहा कि पार्टी के लिए युवा महत्वपूर्ण हैं लेकिन युवा कतार को ना तोड़ें और न ही पद की इच्छा करें। युवा कतार को बड़ी करना सीखें।
वरिष्ठ पत्रकार राजीव जैन का मानना है कि कर्नाटक में भाजपा बड़े दल के रूप में आई है। राज्य में सरकार न बन पाने का असर भाजपा कार्यकर्ताओं पर पड़ेगा। यदि सरकार बनती तो भाजपा कार्यकर्ताओं में उत्साह और कांग्रेस कार्यकर्ताओं में निराशा पनपती। वहीं अब कांग्रेस को उम्मीद है कि कर्नाटक चुनाव के बाद वह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में सरकार बना सकती है। हालांकि प्रदेश के गृहमंत्री गुलाबचन्द कटारिया सभी अटकलों को खारिज करते हुए कहते हैं- कर्नाटक में जो राजनीतिक घटनाक्रम हुआ, उसका राजस्थान के चुनाव में कोई असर नहीं पडेगा। हम राजस्थान ही नहीं बल्कि पूरे देश में चुनाव जीतेगें। हमारे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी हैं और 2019 के बाद भी मोदी ही रहेंगे।
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SOURCEहिन्दुस्थान समाचार/डॉ ईश्वर बैरागी
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