फेसबुक पर जो बन्धु मंगलवार की सुबह 1 बजे तक हिंदी हार्टलैंड के तीनों प्रदेशों में भाजपा के जीत का दम भर रहे थे, उनमें से कइयों ने दोपहर तक रुझान देख कर ही बता दिया कि भाजपा क्यों हार रही है। सेकुलर गैंग ने 1999 में भाजपा की हार पर लिखी लाइन फिर से दुहरा दी कि जनता हिंदुत्व नहीं,विकास चाहती है। मुझे आज तक समझ नही आया कि आखिर वह कौन सी जनता है जो कभी भाजपा के हिंदुत्व के खिलाफ मतदान करती है और फिर कुछ माह में कहीं और हिंदुत्व के लिए मतदान कर देती है?

यही समझने की कोशिश में मुझे मेरे इतिहास के शिक्षक याद आये।वह कहा करते थे कि परीक्षा में यदि युद्ध से जुड़ा सवाल हो और हार के कारण पूछे जाएं तो बिना जाने भी लिख देना कि शत्रु की सेना बड़ी थी, उनके हथियार आधुनिक थे, संसाधन बेहतर थे और वे धूर्त भी थे जबकि हारने वाली सेना का हाथी अचानक पागल होकर अपने ही सैनिक कुचलने लगा। हथियारों में जंग लगी थी। सामने कीचड़ था,सेनापति मारा गया,सेना भाग गई, एकता का अभाव था।

हिंदुओं के बारे में यह कहा जाता रहा है कि उनमें ‘सेंस ऑफ हिंस्ट्री’ कतई नही था। मुझे लगता है कि अब भी नही है। मैं जब इन चुनावों और इसके परिणामों पर भाजपा समर्थक और विरोधियों की प्रतिक्रिया देखता हूँ तो मुझे पानीपत याद आता है। पानीपत में तीन युद्ध हुए। पहला युद्ध मुगलों और अफ़ग़ानों के बीच हुआ। इसमें यह निर्णय हुआ कि दिल्ली अफ़ग़ानों के हाथ से निकल जाएगी लेकिन मुगलों को मिलेगी, इसका निर्णय पानीपत में न होकर खानवा के युद्ध मे हुआ। पानीपत की दूसरी लड़ाई में भारत के आकाश में ध्रुव तारे की तरह उभरे हेमचन्द्र विक्रमादित्य का पतन हुआ और मुगलिया सल्तनत स्थायी हुआ। पानीपत का तीसरा युद्ध तो एक महागाथा है। इस पर दर्जनों किताबें लिखी गई लेकिन अब भी उतना ही लिखना शेष है।

यह कहानी पानीपत के युद्ध के मैदान की नहीं बल्कि उस कालखण्ड में घटित घटनाओं का विवरण है। इस कहानी से आप वर्तमान कालखण्ड के राजनीतिक पात्रों व घटनाक्रम में स्पष्ट साम्यता देखें तो यह महज संयोग नहीं होगा।

आदिलशाही और मुगल सल्तनत से लड़ते भिड़ते क्षत्रपति शिवाजी महाराज ने एक राज्य खड़ा किया। मराठा जाति खेतिहर थी लेकिन कुदाल और हल चलाने वालों को हिन्दू स्वराज का स्वप्न देकर महाराज ने उन्हें लड़ाका बना दिया। पचहत्तर वर्षों में मराठा साम्राज्य दक्षिण में लगभग हिन्द महासागर को छूता हुआ,पश्चिम में अटक तक और पूर्व में कटक तक फैल चुका था। कन्नौज के राजा हर्षवर्धन के बाद 1100 वर्षों में हिंदुओं द्वारा स्थापित यह सबसे बड़ा साम्राज्य था लेकिन यह हिंदवी स्वराज न था।

दरअसल हुआ यह कि जब पेशवा बाजीराव बल्लाल घोड़े की पीठ पर ही सोते हुए दिन-रात मराठा साम्राज्य के विस्तार के लिए युद्ध कर रहे थे, तब दिल्ली में मुगल बादशाह मुहम्मद शाह इतनी रंगीनी में जी रहा था कि उसका नाम ही मुहम्मद शाह रंगीला हो गया था। सन 1739 में ईरान के बादशाह नादिरशाह ने दिल्ली पर हमला कर दिया। नादिरशाह के हमले ने मुग़ल सल्तनत की गिरती सेहत को आम कर दिया। बादशाह को तो सुधरना नहीं था,ऐसे में उसके बुद्धिमान वजीर सफदर जंग ने मराठों से समझौता कर लिया। अब मुगल साम्राज्य के सुरक्षा की जिम्मेदारी क्षत्रपति साहू महाराज की थी। बदले में मुगल सल्तनत के पंजाब, सिंध और दोआब से मिलने वाले कर का एक चौथाई भाग मराठों को मिलना था।

प्रश्न उठता है कि जब मुगल साम्राज्य इतना कमजोर हो चुका था और मराठा साम्राज्य मुग़ल मुक्त भारत बनाकर हिन्दू स्वराज कायम करने को बना था तो फिर मराठों ने मुगलों को दिल्ली से हटाया क्यों नही? उल्टे उनके रक्षा का भार क्यों ले लिया? ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि दिल्ली में मुगलों की सत्ता 200 वर्षों से कायम थी। यह एक ‘व्यवस्था’ बन चुका था।इस ‘व्यवस्था’ से बहुत सारे लोग बहुत स्तरों पर जुड़े थे, लाभान्वित होते थे। अब यदि यह व्यवस्था बदले तो विद्रोह भी होगा। दूसरे नई व्यवस्था कायम करना आसान काम तो नही होता, तो क्या बेहतर न था कि उसी व्यवस्था का हिस्सा बनकर सत्ता सुख लिया जाए? लेकिन वादा तो हिन्दू स्वराज का था।

मराठों के इस फैसले ने कई कठिनाइयाँ खड़ी कर दी। पेशवा बाजीराव ने राजपूताना और उत्तर के अन्य हिन्दू राजाओं से अच्छे सम्बन्ध बनाये थे। इन राजवंशो ने 200 वर्षों तक खून का घूँट पीकर मुगलों का अत्याचार और अन्याय सहा था। अब जबकि मुगल साम्राज्य की जड़ें सूख रही थीं तो वे भी अपना हिसाब बराबर करने को बेचैन थे,लेकिन अब उनके रास्ते मे मराठे खड़े थे। वे उखाड़ना तो मुगलों को चाहते थे लेकिन उन्हें लड़ना मराठों से पड़ता था जो अब उसी व्यवस्था का हिस्सा थे। इससे उत्तर के हिन्दू राजाओं और मराठों के सम्बंध अत्यंत खराब हो गए।

मुगलों ने परिस्थितियों को देखते हुए भले ही अपने सल्तनत की सुरक्षा की जिम्मेदारी मराठों को दे दी लेकिन उनके अंदर यह भाव बना रहा कि दिल्ली तो तैमूर के वंशजों का ही है और इसपर हिंदुओं का कोई भी अधिकार उनके लिए शर्म की बात है। अब जब मराठों को ही दिल्ली की रक्षा करनी थी तो जाहिर है कि उनकी सेना दिल्ली या उसके आसपास रहती ही थी।दिल्ली में तब मन्दिर नही के बराबर ही होते थे, इसलिए मराठे सैनिक यमुना किनारे शिवलिंग बना कर उसकी पूजा करते थे। इन सबसे दिल्ली की हवा बदल रही थी और मुगल एस्टेब्लिशमेंट के मजबूत स्तम्भ मुस्लिम धर्मगुरुओं को ये सहन न था। ऐसे ही एक धर्मगुरु शाह वलीउल्लाह थे। शाह वलीउल्लाह सूफी थे लेकिन अब सूफीवाद से काम चलने वाला न था। उन्होने रुहेलखण्ड के सरदार नजीबुद्दौला के साथ मिलकर एक षड्यंत्र रचा। अफगानिस्तान के बादशाह अहमद शाह अब्दाली को पत्र लिखकर मुसलमानों के दुर्दशा की झूठी कहानी बनाई और मराठों को दक्कन तक खदेड़ने का आमंत्रण दिया। वलीउल्लाह की जबान से तो जैसे तेजाब बहता था, उसका अब्दाली पर ठीक ठाक असर हुआ। हिन्दू स्वराज का लक्ष्य भूल, जिस व्यवस्था को बचाने के लिए मराठे दक्कन से दिल्ली में डेरा डाले थे, वही व्यवस्था उन्हें मिटाने के रास्ते ढूंढ रही थी।

अब्दाली 1747 में हिंदुस्तान आया। दिल्ली में तब मराठा फौज बस कुछ हजार ही थी। ऐसे में वह लूट-मार करके और मथुरा, वृंदावन को ध्वस्त कर लौट गया।मराठे जब तक पुणे से सेना तैयार कर दिल्ली पहुँचते तबतक अब्दाली जा चुका था। इसके बाद ही मराठों ने सिंध और पंजाब पर भगवा लहराया। यह उनका सर्वश्रेष्ठ समय था। अब्दाली पंजाब नही छोड़ सकता था। अफगानिस्तान के शुष्क पठारों में अपना साम्राज्य कायम रखने के लिए उसे पंजाब की उपजाऊ भूमि चाहिए थी। ऐसे में उसने सन 1760 में दुबारा हमला किया। मराठा सेना भी पेशवा के चचेरे भाई और प्रधानमंत्री सदाशिव राव के नेतृत्व में उत्तर को निकल पड़ी।

रुहेलखण्ड का सरदार नजीबुद्दौला और अवध के नवाब शुजाउद्दौला एक दूसरे के दुश्मन थे। शिया और सुन्नी का झगड़ा भी था लेकिन इस्लाम की रक्षा के लिए दोनों ही अब्दाली के साथ खड़े हो गए। वहीं नाराज हिन्दू राजाओं पर मराठा सेनापति सदाशिव राव के अपील का कोई असर न हुआ। उन्होंने एक तरह से NOTA दबा दिया। उत्तर भारत के सभी छोटे बड़े मुसलमान सरदार अब्दाली के साथ हो लिए लेकिन मराठे अकेले और कमजोर रह गए।

मराठा सेना और अब्दाली की सेना में पानीपत के मैदान में भीषण भिड़ंत हुई जिसे संसार पानीपत के तृतीय युद्ध के रूप में जानता है। इस युद्ध का परिणाम मराठों के पराजय के रूप में सामने आया। हिन्दू स्वराज का स्वप्न नष्ट हो गया।मराठे अगले दस साल के लिए दिल्ली से दूर रहे और इन दस सालों में हिंदुस्तान हमेशा के लिए बदल गया क्योंकि सत्ता के खेल में ईस्ट इंडिया कम्पनी’ नाम का एक नया खिलाड़ी इन दस सालों में बड़ी तेजी से आगे आ चुका था।

तीन अत्यंत महत्वपूर्ण बातें हैं जिनपर विचार किया जाना चाहिए ―

  1. अब्दाली नादिरशाह का गुलाम था। नादिरशाह ने जब दिल्ली पर कब्जा किया था तब उसने शाही परिवार की महिलाओं को अपने दरबार मे नृत्य प्रस्तुत करने पर विवश कर दिया था। सूफी मौलवी वलीउल्लाह जानता था कि अब्दाली भी एक लुटेरा ही है और दिल्ली में वह भी लूट ही मचाएगा फिर भी उसने अब्दाली को मौका क्यों दिया? क्या इसलिए नही कि उसके लिए साध्य,साधन से अधिक महत्वपूर्ण थे?

  2. मराठे हिन्दू स्वराज का विचार त्याग बस किसी तरह राज करने में विश्वास करने लगे थे, फिर भी वलीउल्लाह को ऐसा क्यों लगने लगा था कि हिन्दू शक्तिशाली हो रहे हैं और इस्लामिक राज्य खतरे में है? क्या उसे भ्रम था या वह कुछ ऐसा देख रहा था जिससे बाकी सब अनजान थे?

  3. पुणे से चितपावन पेशवा बारम्बार पत्र लिखकर उत्तर में मौजूद सरदारों से कहते कि तुम्हारी विजय अधूरी है यदि प्रयाग और काशी को स्वतंत्र न करा सको। यहाँ मथुरा और अयोध्या की बात इसीलिए नही होती क्योंकि मथुरा को जाटों ने मुक्त करा लिया था और अयोध्या के बगल फैजाबाद में अवध के नवाब की राजधानी थी। अब किसी से राजधानी तो नही मांग सकते न।सरदार सोचते कि पहले राजनीतिक अनुकूलता आ जाये फिर यह काम भी हो ही जायेगा लेकिन विधाता को कुछ और ही मान्य था। राजनैतिक अनुकूलता से पहले पानीपत की प्रतिकूलता आ गई.

अब पानीपत का चतुर्थ सामने दिख रहा है। विरोधी पक्ष सभी अन्तर्विरोधों को पाटकर मजबूत गठजोड़ बना रहे हैं। कुछ NOTA दबाएंगे। दिल्ली फिर से दस साल दूर होगा या शायद आंखों से ओझल ही हो जाये। इतिहास से सीखिए वरना वह खुद को दुहराता रहेगा। बार-बार, हर बार,त्रासदी बनकर।

मुकुल मिश्र