अगर मगर की डगर में स्वस्थ भारत की तस्वीर

देश का वार्षिक स्वास्थ्य बजट 40 हजार करोड़ का है, लेकिन 90 हजार करोड रुपये की दवा साल भर में भारतीय खा जाते हैं। स्वास्थ्य के नाम जारी होने वाला पैसा कहां जाता है, ये किसी को नहीं पता

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वैश्विकरण  के इस युग में खुद को सेहतमंद बनाए रख पाना आसान नहीं रह गया है। खासतौर से उस समय जब सांस्कृतिक एवं पर्यावरणीय प्रदूषण तेजी से बढ रहा हो। बेशक विकास की लकीर बुलेट ट्रेन तक जा पहुंची हो, लेकिन सच यह भी है कि उत्तर प्रदेश के गोरखपुर के बीआरडी अस्पताल तक इसकी पहुंच नहीं हो पायी है। दिल्ली जैसी जगह पर भी स्वास्थ्य सुविधा के नाम पर लूट हो रहा है। फोर्टिज जैसा अस्पताल डेंगी के मरीज से 16 लाख रुपये ऐंठता है तो मैक्स जैसा अस्पताल जीवित बच्चों को मृत घोषित कर देता है। अपोलो पर किडनी रैकेट चलाने का आरोप लगता है। कोई प्लेटलेट्स की गड़बड़ी दिखाकर मरीजों को लूट रहा है तो कोई और तरीके से डरा कर। पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था को कुछ बड़े पूंजीपतियों ने अपने हाथ में ले रखा है। ऐसे में भारत कितना स्वस्थ रह पायेगा एक गंभीर प्रश्न है।

किसी भी राष्ट्र के नागरिक-स्वास्थ्य को समझे बिना वहां के विकास को नहीं समझा जा सकता है। दुनिया के तमाम विकसित देश अपने नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर चिंतनशील हैं व बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतु प्रयत्नशील रहे हैं। नागरिकों का बेहतर स्वास्थ्य राष्ट्र की प्रगति को तीव्रता प्रदान करता है। जिस देश के लोग ज्यादा स्वस्थ रहे हैं, वहां की उत्पादन शक्ति बेहतर रही है। ऐसे में भारत को पूरी तरह कैसे स्वस्थ बनाए जाए यह एक यक्ष प्रश्न है। ऐसे में एक स्वास्थ्य चिंतक होने के नाते कुछ महत्वपूर्ण बिन्दुओं पर मैं चिंतन-मनन करता रहा हूं। हमें लगता है कि सरकार इन सुझावों पर ध्यान दें तो इस दिशा में और बेहतर परिणाम आ सकते हैं।

मेरी समझ से देश की स्वास्थ्य व्यवस्था को नागरिकों के उम्र के हिसाब से तीन भागों में विभक्त करना चाहिए। 0-25 वर्ष तक, 26-60 वर्ष तक और 60 से मृत्युपर्यन्त। शुरू के 25 वर्ष और 60 वर्ष के बाद के नागरिकों के स्वास्थ्य की पूरी व्यवस्था निःशुल्क सरकार को करनी चाहिए। जहां तक26-60 वर्ष तक के नागरिकों के स्वास्थ्य का प्रश्न है तो इन नागरिकों को अनिवार्य रूप से राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत लाना चाहिए। जो कमा रहे हैं उनसे बीमा राशि का प्रीमियम भरवाने चाहिए, जो बेरोजगार हैं, उनकी नौकरी मिलने तक उनका प्रीमियम सरकार को भरना चाहिए।

शुरू के 25 वर्ष नागरिकों को उत्पादक योग्य बनाने का समय है। ऐसे में अगर देश का नागरिक आर्थिक कारणों से खुद को स्वस्थ रखने में नाकाम होता है तो निश्चित रूप से हम जिस उत्पादक शक्ति अथवा मानव संसाधन का निर्माण कर रहे हैं, उसकी नींव कमजोर हो जायेगी और कमजोर नींव पर मजबूत इमारत खड़ी करना संभव नहीं होता। किसी भी लोक-कल्याणकारी राज्य-सरकार का यह महत्वपूर्ण दायित्व होता है कि वह अपने उत्पादन शक्ति को मजबूत करे। अब बारी आती है 26-60 साल के नागरिकों पर ध्यान देने की। इस उम्र के नागरिक सामान्यतः कामकाजी होते हैं और देश के विकास में किसी न किसी रूप से उत्पादन शक्ति बन कर सहयोग कर रहे होते हैं। चाहे वे किसान के रूप में, जवान के रूप में अथवा किसी व्यवसायी के रूप में हों कुछ न कुछ उत्पादन कर ही रहे होते हैं। जब हमारी नींव मजबूत रहेगी तो निश्चित ही इस उम्र में उत्पादन शक्तियां मजबूत इमारत बनाने में सक्षम व सफल रहेंगी और अपनी उत्पादकता का शत प्रतिशत देश हित में अर्पण कर पायेंगी। इनके स्वास्थ्य की देखभाल के लिए इनकी कमाई से न्यूनतम राशि लेकर इन्हें राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा योजना के अंतर्गत लाने की जरूरत है। जिससे उन्हें बीमार होने की सूरत में इलाज के नाम पर अलग से एक रुपया भी खर्च न करना पड़े। अब बात करते हैं देश की सेवा कर चुके और बुढ़ापे की ओर अग्रसर 60 वर्ष की आयु पार कर चुके नागरिकों के स्वास्थ्य की। इनके स्वास्थ्य की जिम्मेदारी भी सरकार को पूरी तरह उठानी चाहिए। और इन्हें खुशहाल और स्वस्थ जीवन यापन के लिए प्रत्येक गांव में एक बुजुर्ग निवास भी खोलने चाहिए, जहां पर गांव भर के बुजुर्ग एक साथ मिलजुल कर रह सकें और गांव के विकास में सहयोग भी दे सकें।

अगर ऐसा हम करने में सफल रहे तो निश्चित ही भारत को हम एक खुशहाल देश की ओर बढ़ा पाएंगे। संयुक्त राष्ट्र ने कुछ समय पूर्व खुशहाल देशों की वैश्विक सूची जारी किया था, जिसमें पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका एवं बांग्लादेश भी भारत से ऊपर निकल गए। 155 देशों की सूची में हम 122 वें स्थान पर रहे। यह स्थिति यह बताने के लिए काफी है कि सोने की चिड़िया कहे जाने वाले भारत के लोग आज अवसाद में हैं, परेशान हैं, बीमार हैं, भूखे हैं और बेरोजगार हैं।

कहने के लिए देश आजाद है। यहां पर जनता का शासन है। यहां लोग ही मालिक हैं। फिर भी गरीब-अमीर के बीच की दूरी लगातार बढ़ रही है। तीन फीसदी लोग केवल महंगी दवाइयों के कारण गरीबी रेखा से ऊबर नहीं पा रहे हैं। महंगी एंटीबायोटिक्स खरीदने के लिए उनके पास पैसे नहीं हैं। बीमारी, हताशा और कर्ज की बोझ से दबे हुए हैं। देश का किसान सही उत्पादन मूल्य नहीं मिलने के कारण मजदूर बनता जा रहा है। यूरिया एवं कीटनाशकों के बेतहाशा प्रयोग से खेतों से उगने वाले अनाज बीमारी की वजह बन रहे हैं। देश में बीमारी एवं बीमारों की संख्या बढ़ती जा रही है। टीबी, कैंसर, जापानी इंसेफलाइटिस, डेंगी, मलेरिया जैसी बीमारियों ने देश की उत्पादन शक्ति को अपने गिरफ्त में ले लिया है। बीमारियों को ठीक करने वाली तमाम पद्धतियों में आपसी समन्वय का अभाव है। देश का वार्षिक स्वास्थ्य बजट 40 हजार करोड़ का है, लेकिन 90 हजार करोड रुपये की दवा साल भर में भारतीय खा जाते हैं। स्वास्थ्य के नाम जारी होने वाला पैसा कहां जाता है, ये किसी को नहीं पता। आजादी के बाद अगर पोलियो को छोड़ दे तो किसी भी बीमारी को हम समूल खत्म नहीं कर पाए हैं। ऐसे में हमारी स्वास्थ्य-नीति कटघरे में तो है ही।

स्वास्थ्य ही क्यों हमारी किसान नीति भी कहां कुछ कर पा रही है। किसानों को उनकी मेहनत का उचित मूल्य आज तक हम नहीं दे पाए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार देश में 65 फीसदी यानी आधे से ज्यादा लोग किसानी पर निर्भर हैं। 35 फीसद लोग नौकरी, उद्योग धंधे आदि पर निर्भर हैं। विडंबना है कि किसान के उत्पाद का मूल्य सरकार तय करती है और उसके उत्पाद से उत्पादित वस्तु का मूल्य उद्योगपति तय करता है।

विकास के मौजूदा मॉडल को भारतीय संदर्भ में परिभाषित किए जाने की सख्त जरूरत है। नहीं तो सोने की चिड़िया कहा जाने वाला भारत बिना हाड़ मांस की चिड़िया बन कर रह जायेगा। अगर 2018 में इन विषयों पर हम थोड़ा भी संजीदा हो गए, तो निश्चित ही स्वस्थ भारत की दिशा में एक बेहतर कदम होगा।

हिन्दुस्थान समाचार/आशुतोष कुमार सिंह
(लेखक स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक एवं स्वस्थ भारत न्यास के चेयरमैन हैं)