उचित-अनुचित में अंतर कर पाने में असमर्थ भारत

दुविधा में उलझे रहने के लिए आपका मुसलमान होना ज़रूरी नहीं है; आप हिन्दू कम्युनिस्ट भी हो सकते हैं! कम्युनिस्ट क्यों, आप समाजवादी या असमंजस में पड़े ग़ैर-राजनैतिक नागरिक भी हो सकते हैं

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राष्ट्र के तीन टुकड़े कर देने वाले और नाहक़ ही हज़ारों निर्दोषों को दंगों के हवाले कर देने वाले पाकिस्तान के संस्थापक मुहम्मद अली जिन्ना की एक तस्वीर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में संरक्षित रखने को इस विश्वविद्यालय के छात्र, उनके शिक्षक और उनसे सहानुभूति रखने वाले आतुर हो गए हैं। जिन्ना उस शिक्षण संस्थान से जुड़े थे इसलिए उनका महिमामंडन चलते रहना चाहिए — यह उतना ही भद्दा कुतर्क है जैसा कि आज की जर्मनी में कोई कहे कि अडॉल्फ़ हिटलर का तिरस्कार नहीं होना चाहिए क्योंकि उन्होंने जर्मनी के हित के लिए विश्व को द्वितीय विश्व युद्ध की ओर धकेल दिया था। वृहद् विषय केवल जिन्ना, मुसलमान समाज या किसी संस्थान का नहीं है बल्कि यह है कि आधुनिक भारतीय समाज को उचित और अनुचित, न्याय और अन्याय, मर्यादित और अमर्यादित व्यवहार, देशभक्ति और देशद्रोह के बीच फ़र्क़ करने की तमीज़ नहीं है। और यही कारण है कि आए दिन भारतीय सेना पर उंगलियाँ उठाई जाती हैं; सैनिकों की वीरगति पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया जाता है; राष्ट्रीय ध्वज देश के ही किसी हिस्से में फहराया जाए या न जाए इस पर विवाद खड़ा हो जाता है; राष्ट्रगान के समय खड़ा होना चाहिए या अड़ कर बैठे रहना चाहिए यह भी वितर्क का विषय है; भारत के टुकड़े होने का नारा लगाने वाले देशद्रोही हैं या नहीं यह स्पष्टता भी कई लोगों के चिंतन में नहीं है… और ऐसी दुविधा में उलझे रहने के लिए आपका मुसलमान होना ज़रूरी नहीं है; आप हिन्दू कम्युनिस्ट भी हो सकते हैं! कम्युनिस्ट क्यों, आप समाजवादी या असमंजस में पड़े ग़ैर-राजनैतिक नागरिक भी हो सकते हैं।

इस किंकर्त्तव्यविमूढ़ समाज के निर्माण — या इसे कुकुरमुत्ते की तरह पनपने देने — के लिए सर्वाधिक ज़िम्मेदार हमारी शिक्षा व्यवस्था है जिसमें राष्ट्र के प्रति प्रेम के बीज बच्चों और किशोरों के मन में नहीं बोये जाते। जहाँ राष्ट्रीय ध्वज, राष्ट्रगान, सेना आदि के प्रति आदर जैसे सरल मुद्दों पर भी संशय का अवकाश है, वहाँ इतिहास का पाठ्यक्रम कैसा हो, इतने गहन प्रसंग पर मतैक्य कैसे होगा? इस सामाजिक भ्रान्ति के लिए घरों में बच्चों की नैतिकता गढ़ने के प्रति उदासीन अभिभावक भी दोषी हैं। जहाँ समाज का एक बड़ा अंश स्कूल में पढ़ाए जाने वाले इतिहास से असंतुष्ट है वहाँ कितने घरों में डायरेक्ट एक्शन डे पर चर्चा होती है? यदी जिन्ना के बारे में थोड़ी-बहुत मालूमात हासिल है भी तो बंगाल के बाहर हुसैन शहीद सुहरावर्दी को कितने लोग जानते हैं? यदि यह शिक्षा हिन्दू और मुसलमान परिवारों में अलग-अलग भी दी जाती तो आज के भारत में जिन्ना की पैरवी करने वालों को थोड़ी शर्म तो आती — जब ये पैरोकार यह जानते कि जिन्ना और सुहरावर्दी की अपील ने 16-18 अगस्त 1946 को कलकत्ता में 4,000 निर्दोष लोगों की जान ले ली और 1,00,000 से अधिक को अपने ही देश में बेघर शरणार्थी बना दिया।

इस विषयवस्तु का दूसरा पहलू वस्तुपरक है। यह तर्क दिया जा सकता है कि यूरोप और अमरीका वासी ग़लत हैं; उन्हें हिटलर का बहिष्कार नहीं करना चाहिए बल्कि उस चरित्र का अपक्षपाती, आवेगहीन और संयमित अध्ययन करना चाहिए और उसी प्रकार भारत में जिन्ना के बारे में लोग विभिन्न स्रोतों से जानकारी ले सकते हैं। पर जानकारी प्राप्त करना और उस चरित्र के प्रति अनुरक्त हो जाने में फ़र्क़ है। अ०मु०यू० के बाब-ए-सय्यद के सामने 3,000 छात्रों का धरना-प्रदर्शन एक विघटनकारी शक्ति के प्रति उनकी अनुरक्ति का राज़ फ़ाश कर रहा है। दूसरा अंतर यह है कि हालांकि हिटलर ने यहूदियों को अपने अत्याचार का निशाना बनाया था, आज के युग में पाश्चात्य के ईसाई भी हिटलर का नाम तो क्या, उसके उलटे स्वस्तिक चिन्ह का भी स्मरण नहीं करना चाहते। क्या भारत के हिन्दुओं के प्रति भारत के मुसलमानों को ऐसी एकजुटता का निदर्शन स्थापित नहीं करना चाहिए? जब तक देश में सामाजिक शिक्षा का तंत्र विकसित नहीं हो जाता, सभी परिवारों को अलग-अलग, अपने-अपने बच्चों को राष्ट्र के प्रति समर्पण की शिक्षा देनी होगी। सनद रहे कि राष्ट्र की अपेक्षा मनमर्ज़ी को अधिक महत्त्व देने वाले दुर्बल देश का निर्माण करते हैं। कहा जाता है कि द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब जर्मनी ने फ़्रांस पर हमला किया था तब फ़्रांसिसी अपने-अपने शहर छोड़ कर भाग खड़े हुए थे ताकि प्रतिरोध के कारण हो सकने वाली गोलीबारी से उनके ख़ूबसूरत शहर बदसूरत न हो जाएँ!

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