ट्रैफिक जाम के लिए अभिशप्त भारत

यद्यपि बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप ने ट्रैफिक जाम की वजह से होने वाले नुकसान का जो आकलन किया गया है, वह सिर्फ ईंधन के खर्च में बढ़ोतरी के आधार पर ही किया है

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सड़क पर जाम का सामना करना महानगरीय जीवन की नियति बन चुकी है। ऑफिस टाइम के उस समय सड़क पर भीड़भाड़ काफी बढ़ जाता है। 10 मिनट की दूरी भी तय करने में आधे से घंटे एक घंटे तक का समय लगता है। ज्यादातर भारतीयों ने इस स्थिति को अपनी नियति मान लिया है। लेकिन आपको ये जानकर हैरानी होगी कि महानगरों में होने वाला यही जाम देश को हर साल अरबों डॉलर का चूना लगा रहा है। सिर्फ कोलकाता, दिल्ली, मुंबई और बेंगलुरु में ही हर साल जाम की वजह से देश को 22 अरब डालर की चपत लग जाती है। इस चौकाने वाले तथ्य का खुलासा बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप ने एक स्टडी के बाद किया है। बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप ने ऑनलाइन टैक्सी कंपनी उबर के लिए यह स्टडी की है।

स्टडी के मुताबिक पीक आवर में दिल्ली में ट्रैफिक जाम की वजह से लोगों को सफर करने में सामान्य से 129% ज्यादा समय लगता है। मुंबई में यह आंकड़ा 135% का है, जबकि बेंगलुरु में पीक आवर में सफर करने पर लोगों को सामान्य समय की तुलना में 162% अधिक समय व्यतीत करना पड़ता है। सबसे बुरी स्थिति कोलकाता की बताई गई है, जहां पीक आवर के दौरान सफर करने पर सामान्य समय की तुलना में ट्रैफिक जाम की वजह से 171% अधिक समय बर्बाद होता है। साफ है कि ट्रैफिक जाम की वजह से महानगरों में लोगों को डेढ़ से दो गुना तक ज्यादा समय बर्बाद करना पड़ता है। जाहिर है कि कि ट्रैफिक जाम की वजह से पेट्रोल और डीजल के रूप में ईंधन की खपत में भी बढ़ोतरी होती है। इसके साथ ही प्रदूषण भी अधिक होता है।

यद्यपि बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप ने ट्रैफिक जाम की वजह से होने वाले नुकसान का जो आकलन किया गया है, वह सिर्फ ईंधन के खर्च में बढ़ोतरी के आधार पर ही किया है। इसमें यदि प्रदूषण की वजह से होने वाले नुकसान और समय की बर्बादी के फैक्टर को भी जोड़ दिया जाए, तो सिर्फ इन चार महानगरों में ही होने वाला कुल नुकसान सौ अरब डॉलर के आंकड़े को भी पार कर सकता है। इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता है कि देश के अधिकांश छोटे-बड़े शहरों में ट्रैफिक जाम की स्थिति लगातार बढ़ रही है। इसकी एक बड़ी वजह रोजगार की तलाश, शिक्षा या अन्य वजहों से ग्रामीण भारत से का शहरी भारत की ओर पलायन करना भी है। महानगरों की स्थिति सबसे अधिक बुरी है, जहां जनसंख्या के दबाव की वजह से बुनियादी ढांचा पूरी तरह से चरमरा गया है। सड़कों को चौड़ा करना भी एक हद से ज्यादा संभव नहीं है। ट्रैफिक के वैकल्पिक साधनों का उपयोग भी भारत में तुलनात्मक तौर पर कम होता है। अगर आर्थिक समस्या ना हो तो अधिकांश लोग सार्वजनिक वाहनों में चलने की बजाय अपनी गाड़ियों में चलना पसंद करते हैं। इसी तरह कार पुलिंग की व्यवस्था भी भारत में अभी तक अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच सकी है।

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अनुमान लगाया जा सकता है कि अगर एक बस में 40 यात्री भी सफर करें तो सिर्फ एक गाड़ी उन्हें उनके गंतव्य तक पहुंचा सकती है, लेकिन अगर यही 40 व्यक्ति अपनी-अपनी गाड़ियों में जाएं, तो ये गाड़ियां सड़क पर कितना जगह घेरेंगी। कुछ समय पहले रोड ट्रैफिक सेंसेज नामक एनजीओ के सर्वे में भी बताया गया था कि अगर महानगरों में ट्रैफिक जाम की स्थिति पर समय रहते ध्यान नहीं दिया गया तो 2025 तक जाम की स्थिति इतनी बिगड़ जाएगी कि लोगों को 10 किलोमीटर की दूरी तय करने के लिए भी घंटों का समय बर्बाद करना होगा। अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसी स्थिति में ईंधन का खर्च किस हद तक बढ़ जाएगा और लोगों का कितना समय बर्बाद होगा। बर्बाद होने वाले इस समय को अगर श्रम घंटा मानकर आकलन किया जाये तो देश को जाम की वजह से होने वाले नुकसान का आकलन किया जा सकता है।

द इंडियन फेडेरेशन ऑफ रोड सेफ्टी के एक सर्वेक्षण में भी आशंका जताई गई है कि अगर ट्रैफिक की यही स्थिति बनी रही और गाड़ियों की संख्या इसी रफ्तार से बढ़ती रहे, तो 2030 तक दिल्ली की सड़कें चलने लायक नहीं नहीं रह जाएंगी और पीक आवर के अलावा सामान्य समय में भी लोगों को सड़कों पर भारी जाम का सामना करना पड़ेगा। भारत जैसे देश में गाड़ियों का ईंधन एक बड़ी समस्या है। हमें अपनी जरूरत का 80% ईंधन आयात करना पड़ता है। स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में पेट्रोलियम पदार्थ का मूल्य बढ़ने या घटने का सीधा असर देश के आम लोगों की जेब पर पड़ता है। अनुमान लगाया जा सकता है कि ऐसे में ट्रैफिक जाम की वजह से होने वाली ईंधन की बर्बादी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कितनी घातक सिद्ध हो रही है। ऐसी स्थिति में सवाल उठता है कि लोग क्या करें।

सरकार के स्तर पर लोगों को पब्लिक ट्रांसपोर्ट का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित और व्यक्तिगत गाड़ियों को खरीदने से हतोत्साहित किया जा सकता है। इसके लिए निजी गाड़ियों पर भारी टैक्स भी लादा जा सकता है। पेट्रोलियम ईंधन की राशनिंग भी की जा सकती है। ऐसा होने पर लोगों का रुझान स्वाभाविक रूप से पब्लिक ट्रांसपोर्ट की ओर जाएगा। इसके अलावा निजी गाड़ियों की अगर बात करें तो कार पुलिंग एक बेहतर व्यवस्था है। हर व्यक्ति अपनी अपनी कार में जाए और उसमें बाकी सीटें खाली रहे, इससे बेहतर है कि एक ही कार में चार या पांच लोग जाएं। इससे सड़क पर तीन या चार कारें कम निकलेंगी। अगर ऐसी व्यवस्था हो गई तो ट्रैफिक का दबाव एक झटके में 70 से 80% तक कम हो जाएगा और ट्रैफिक जाम की समस्या से काफी हद तक निजात भी मिल सकेगा। हमें यह समझ लेना चाहिए कि आज भले ही दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरु में ट्रैफिक जाम की वजह से सालाना 22 अरब डॉलर के ही नुकसान का आकलन किया गया है, लेकिन अगर हम अभी भी नहीं सुधरे तो आने वाले सालों में यह नुकसान सौ अरब डॉलर या इससे भी काफी अधिक हो सकता है।

हिन्दुस्थान समाचार/योगिता पाठक

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