अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्ट को भारत में काफी विश्वसनीय माना जाता है। कई बार ये रिपोर्ट भारत के पक्ष में होती हैं, तो कई बार इसके विपरीत। ऐसी ही एक रिपोर्ट अभी हाल में थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की आई है, जिसमें दुनिया भर में महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों का जिक्र किया गया है। यह रिपोर्ट दुनिया भर के 548 महिला अपराध विशेषज्ञों से बातचीत के निष्कर्ष के आधार पर तैयार की गयी है।

आश्चर्य की बात ये है कि इस रिपोर्ट में भारत को महिलाओं के लिए दुनिया का सबसे खतरनाक और असुरक्षित देश माना गया है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि महिलाओं के खिलाफ यौन हिंसा, यौन व्यापार में जबरन डाले जाने, मानव तस्करी और उनसे जबरन काम करवाए जाने की वजह से भारत की यह स्थिति बनी है। हैरानी की बात सिर्फ यही नहीं कि इसमें भारत को महिलाओं के लिहाज से दुनिया का सबसे खतरनाक और असुरक्षित देश माना गया है, आश्चर्य की बात तो ये है कि गृहयुद्ध में फंसे और महिलाओं की प्रताड़ना के मामले में सबसे बदनाम देश समझे जाने वाले अफगानिस्तान, सीरिया और सोमालिया को इस मामले में क्रमशः दूसरे, तीसरे और चौथे स्थान पर रखा गया है।

यह रिपोर्ट देश में महिलाओं की चिंताजनक तस्वीर पेश करती है। भारत जैसे देश में, जहां महिलाओं को पारंपरिक रूप से देवी का दर्जा दिया गया है, वहां महिलाओं के सबसे असुरक्षित होने की बात चिंताजनक है। और यदि इस रिपोर्ट में अंशभर भी सच्चाई है तो ये देश के नीति-निर्धारकों को स्पष्ट रूप से कटघरे में खड़ी करती है। हालांकि भारत सरकार ने इस रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। केंद्रीय महिला और बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने इस रिपोर्ट को अज्ञात लोगों की धारणा पर आधारित बताते हुए कहा है कि इसमें उन तमाम पहलुओं की उपेक्षा कर दी गयी है, जिनमें भारत ने काफी तरक्की की है।

मंत्रालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि ये सर्वे जिन 548 लोगों के साथ बातचीत करके किया गया है, उनका परिचय, पद, उनकी विशेषज्ञता या योग्यता के बारे में कोई जानकारी नहीं दी गयी है। इसके साथ ही सर्वेक्षण के नतीजे के लिए किसी आंकड़े का सहारा नहीं लिया गया है, सिर्फ बातचीत के आधार पर ही नतीजा निकाल लिया गया है। ऐसे में इस रिपोर्ट को विश्वसनीय नहीं माना जा सकता। हालांकि जानकारों की मानें तो इस सर्वे पर भारत सरकार की आपत्तियां सर्वे करने और निष्कर्ष निकालने को लेकर हैं। लेकिन इसका ये अर्थ कतई नहीं है कि भारत में महिलाओं की स्थिति कोई बहुत अच्छी है। अगर रोज के अखबारों पर ही नजर डाला जाये तो महिलाओं की दयनीय स्थिति की पुष्टि हम खुद कर सकते हैं।

संभव है कि ढंग से सर्वे किया जाये तो इस रैंकिंग में भारत का स्थान पहला न रहे, लेकिन भारत में महिलाएं काफी हद तक असुरक्षित हैं, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता। ग्रामीण भारत की बात यदि छोड़ भी दी जाये, तो शहरी क्षेत्रों और महानगरों में भी महिलाएं दिन ढलने के बाद बेखौफ नहीं घूम सकतीं। आये दिन महिलाओं के साथ छेड़छाड़ और बलात्कार, ट्रैफिकिंग की खबरें आती रहती हैं। हद तो ये है कि पर्यटन के लिए भारत आने वाली विदेशी मेहमानों को भी कई बार ऐसे बुरे अनुभवों का सामना करना पड़ता है।

इनमें से कुछ घटनाएं सुर्खियां बनती हैं, जबकि अधिकांश घटनाएं या तो मीडिया में आ ही नहीं पाती, या फिर आती भी हैं तो किसी कोने में एक छोटी सी खबर के रूप में उनका अस्तित्व सिमटकर रह जाता है। दिल्ली में निर्भया कांड को लेकर उभरे जनाक्रोश के बाद इस बात की उम्मीद बनी थी कि अब देश में महिला की सुरक्षा का मसला एक प्रमुख मसला बन सकेगा। कहने को तो इस दिशा में काफी कुछ काम भी किया गया। महिला सुरक्षा को लेकर गठित जस्टिस वर्मा आयोग की सिफारिश के आधार पर कुछ काम भी हुआ तो कई काम करने के वादे भी किये गये। सरकार ने 300 करोड़ रुपये का निर्भया फंड बना दिया। लेकिन, देश भर में 600 महिला सहायता केंद्र खोलने की बात सिर्फ राजनीतिक वादे का हिस्सा बनकर ही रह गयी।

सरकार ने इन केंद्रों में एक ही स्थान पर महिलाओं को कानूनी सहायता, चिकित्सा और मनोवैज्ञानिक परामर्श कराने की बात कही थी। इसी तरह महिला थानों की संख्या बढ़ाने, सार्वजनिक स्थानों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने आदि का भी वादा किया था, लेकिन कोई भी काम अभी तक संतोषजनक नहीं हो सका है। आलम ये है कि महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों की संख्या में साल दर साल बढ़ोतरी होती जा रही है। एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक 2015 में 34,003 बलात्कार के मामले सामने आये थे, जबकि उसके अगले साल यह संख्या बढ़कर 34,600 हो गयी। 2017 में प्रतिदिन औसतन सौ बलात्कार की घटनाएं होने का अनुमान है, हालांकि यह आंकड़ा अभी जारी नहीं किया गया है।

बलात्कार की शिकार होने वाली महिलाओं में युवतियों के साथ ही बच्चियों और बुजुर्ग महिलाओं की भी बड़ी संख्या है। इसके साथ ही महिलाओं को डायन बताकर मार देने की घटनाएं भी कई बार सुर्खियों में आती रहती हैं। साफ है कि निर्भया जैसी हृदयविदारक घटना के बाद भी भारत के जनमानस में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है। जानकारों का कहना है कि आजादी के बाद से ही भारत में भौतिक विकास के लिए जिस तरह से पश्चिमी अंधानुकरण का दौर शुरू हुआ, उसने निश्चित तौर से देश में विकास के कई नए आयाम जरूर शुरू किये, लेकिन उसकी वजह से सामाजिक मूल्यों में लगातार गिरावट आयी। हम हर चीज को पश्चिमी देशों की कसौटी पर कसने लगे और उसके अनुरूप ही आगे का कदम तय करने लगे।

विडंबना यह है कि जिन बातों को पश्चिमी देशों में सामान्य परंपरा का हिस्सा माना जाता है, वे हमें आकर्षित करती हैं, हम उसे अपनाने की कोशिश भी करते हैं, लेकिन हम उन नियमों का पालन नहीं करते, जिनका पालन उन देशों में किया जाता है। फैशन के नाम पर तंग और छोटे वस्त्र पहनना हमारे लिए एक आधुनिक होने का सिंबल है, जबकि हमारे समाज की मानसिकता अभी भी बदल नहीं सकी है। पश्चिमी अंधानुकरण के इस दौर में यौन उन्मुक्तता की बात ने भी आग में घी डालने का काम किया है। अभी तक हम जिन बातों को अपना प्राचीन संस्कार मानते और समझते आए हैं, आज के दौर में उसे ओल्ड ट्रैडिशन समझा जा रहा है। इस स्थिति में बदलाव लाये बिना महिलाओं की स्थिति पूरी तरह से सुरक्षित नहीं बनायी जा सकती है।

दिल्ली में निर्भया कांड के वक्त इस घटना के खिलाफ आंदोलन करने वाले दो युवकों पर ही पड़ोस की एक महिला के साथ बलात्कार करने का आरोप लगा था। यह घटना समाज की विकृति की ओर इशारा करती है। दुर्भाग्य यह है कि अभी तक ऐसी मानसिकता से लोग मुक्त नहीं हो सके हैं। यह सही है कि भारत में महिलाओं की स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं हो सका है, लेकिन सिर्फ इसी आधार पर थॉमसन रॉयटर्स फाउंडेशन की रिपोर्ट को पूरी तरह से सही नहीं माना जा सकता है। इस रिपोर्ट में अफगानिस्तान और सीरिया जैसे देशों का भी नाम शामिल है, जहां महिलाएं खुलकर अपनी बात भी नहीं कह सकतीं।

इसी तरह से महिलाओं के खतना करने या फिर महिलाओं के संगसार (पत्थर मारकर जान लेना) जैसी घटनाएं भारत में कभी भी सुनने को नहीं मिलती, जबकि कई इस्लामी देशों में ये आम परंपरा का हिस्सा हैं। पिछले कुछ सालों में महिलाओं की स्थिति में काफी कुछ सुधार हुआ है। महिलाएं खुलकर अपनी बातें कहने लगी है। इसकी वजह से महिलाओं के साथ होने वाले अपराधों का भी खुलासा पहले की तुलना में ज्यादा होने लगा है। महिलाएं लोक-लाज की वजह से चुप रह जाने की बजाए, खुलकर अपराधियों को दंडित कराने के लिए सामने आ रही हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है के यह रिपोर्ट कुल 548 लोगों से की गई बातचीत पर आधारित है।

सवा अरब से अधिक जनसंख्या वाले भारत जैसे देश में 548 लोगों की राए के आधार पर कोई रिपोर्ट बना देना तथ्यपरक नहीं कहा जा सकता। राष्ट्रीय महिला आयोग ने भी इस रिपोर्ट को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। यह ठीक है कि भारत में महिलाओं की स्थिति आज भी उतनी बेहतर नहीं है, जितनी बेहतर होने की अपेक्षा की जाती है। लेकिन, यह भी एक सच है कि भारत में महिलाओं की स्थिति इतनी भी दयनीय नहीं है, जितनी कई अफ्रीकी और मध्य एशियाई देशों में है।

इसके बावजूद इस रिपोर्ट के नतीजों की आलोचना करने की जगह देश में महिलाओं की हालत पर गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए, जिससे कि देश में महिलाओं की स्थिति में और सुधार आ सके। ऐसा करके ही भारत को महिलाओं के लिए सुरक्षित और निरापद बनाया जा सकता है।

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