राज्यपाल के रूप में राम नाईक के प्रत्येक कार्य के पीछे संवैधानिक आधार होता है। वह अपनी सीमा समझते हैं और उसी के अनुरूप निर्णय करते है। यह अजीब है कि पूर्व मुख्यमंत्री आवास प्रकरण पर जो लोग जांच की मांग कर रहे थे, वे राज्यपाल पर हमला बोल रहे हैं। जिस पत्रकार वार्ता में राज्यपाल के लिए तीखे शब्द प्रयोग किये गए, उसी में जांच की मांग भी की गई। समाजवादी पार्टी प्रमुख ने कहा कि मीडिया से पहले उस घर में कौन कौन गया इसकी भी जांच होनी चाहिए। अब यह कैसे हो सकता है वह जांच की मांग करें तो समाजवाद और राज्यपाल जांच का सुझाव दें तो संघ की आत्मा। जबकि राज्यपाल नाईक ने भी केवल बंगले में तोड़-फोड़ की जांच कराने और दोषी को कानून के अनुरूप सजा देने का सुझाव दिया था। उन्होंने न किसी को दोषी बताया, न किसी का नाम लिया। ऐसे में राज्यपाल पर हमले की बात समझ से परे है। उनके पत्र के मूल विचार को समझना चाहिए था। उन्होंने लिखा कि पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले राज्य सम्पत्ति विभाग की अमानत है। इनका रखरखाव लोगों द्वारा दिये गए कर से होता है। इसलिए इसमें तोड़-फोड़ की जांच होनी चाहिए। विडंबना देखिये कि कुछ दिन पहले यही बात अखिलेश यादव कह रहे थे। उनका कहना था कि इसके पीछे किसी अधिकारी की साजिश है, इसलिए जांच होनी चाहिए। यही बात राज्यपाल ने कही है। राज्यपाल द्वारा इसका संज्ञान लेना सराहनीय है। वह सोते से जागे नहीं है। वह कर्तव्यों के निर्वाह में जागते ही रहते हैं। वह संवैधानिक मुखिया हैं। उनका पत्र मात्र एक बंगले तक सीमित नहीं था। प्रायः देखा जाता है कि अपनी मांगे पूरी न होने या शासन-प्रसाशन के प्रति विरोध व्यक्त करने के लिए प्रदर्शनकारी सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाते हैं। दूसरी बात यह कि बड़ी संख्या में सरकारीकर्मी सरकारी आवास में रहते हैं। सार्वजनिक स्थानों पर भी सम्पत्ति को नुकसान पहुचाया जाता है। ईस्टर्न एक्प्रेसवे का उद्घाटन कुछ दिन पहले ही हुआ है। यहां यात्रियों की सुविधा के लिए लगाई गई अनेक सामग्री को लोग उखाड़ ले गए। राज्यपाल के पत्र को उस व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखना चाहिए।
यदि शीर्ष स्तर पर सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने की जांच कर कार्रवाई नहीं की जाती तो नीचे तक उसका गलत सन्देश जाता। जिसका स्वागत होना चाहिए था, उसके लिए कटुतापूर्ण बयान दिया गया। ऐसा भी नहीं कि राज्यपाल ने किसी एक बंगले पर ही अपने सुझाव दिए। यह बात उनकी राज्य विभाग के संबंधित अधिकारी के साथ बातचीत से स्पष्ट होती है। उस अधिकारी ने राज्यपाल को बताया कि खाली हुए सभी बंगलों की वीडियोग्राफी कराई जाएगी और यह राज्यपाल को भी दी जाएगी। इस बात से राम नाईक संतुष्ट हुए। उनकी दिलचस्पी किसी व्यक्ति या बंगला विशेष पर नहीं थी। संवैधानिक मुखिया के रूप में वह सरकारी संपत्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने का सन्देश देना चाहते थे। राज्यपाल ने इसमें कुछ भी गलत नहीं लिखा कि चार विक्रमादित्य आवास खाली करने से पूर्व उसमें की गई तोड़ फोड़ व नुकसान पहुंचाने का मामला मीडिया और आमलोगों में चर्चा का विषय है। यह नितांत अनुचित और गंभीर मामला है। पूर्व मुख्यमंत्री को आवंटित आवास राज्य संपत्ति के कोटे में आते हैं। इसलिए मुख्यमंत्री इस पर विधि के अनुरूप कार्रवाई करें। ऐसे में यह कहना ठीक नहीं था कि राज्यपाल सोते-सोते जागते हैं और वह संविधान की आत्मा को खत्म कर रहे हैं।
राम नाईक संविधान के प्रति बहुत सजग रहते हैं। वह अपने इस दायरे के अंतर्गत ही कार्य करते हैं। बंगले में तोड़-फोड़ हुई, यह सच्चाई अब सबके सामने है। किसने की, यह जांच का विषय है। राज्यपाल का सुझाव संविधान की भावना के अनुरूप है। ऐसे कार्यों से संविधान की आस्था खत्म नहीं होती। बल्कि उसे मजबूती मिलती है। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को घसीटने का भी कोई औचित्य नहीं था। उधर कांग्रेस अध्यक्ष महात्मा गांधी की हत्या के लिए संघ को दोषी बता रहे हैं। उनके लिए उस समय दिए गए न्यायिक निर्णय कोई महत्व नहीं, जिसमें महात्मा गांधी की हत्या के आरोप से संघ को बरी किया गया था। इतना ही नहीं जवाहरलाल नेहरू और लालबहादुर शास्त्री ने गणतंत्र दिवस परेड पर पथ संचलन के लिए संघ को आमंत्रित किया था। राहुल ने एक झटके में नेहरू जी और शास्त्री जी को गलत साबित कर दिया। उसी प्रकार युवा नेता अखिलेश यादव ने भी पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले खाली कराने को साजिश करार दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने अन्य पूर्व मुख्यमंत्रियों का नाम नहीं लिया। कहा कि उनके और मायावती के खिलाफ साजिश की गई है। साथ में यह भी जोड़ा कि वह न्यायपालिका का सम्मान करते हैं।
पूर्व मुख्यमंत्रियों का बंगला खाली कराने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। इसमें कल्याण सिंह, राजनाथ सिंह और नारायण दत्त तिवारी भी शामिल थे। लेकिन अपनी चुनावी सुविधा के अनुरूप केवल अपने और मायावती के खिलाफ साजिश बताया गया। गौरतलब है कि बीएसपी प्रमुख ने केवल अपने बंगले की बात की। गठबन्धन की जरूरत उन्हें भी है। लेकिन उन्होंने किसी अनचाव नहीं किया। वैसे यह गनीमत है कि बंगला खाली करने वालों में कल्याण सिंह भी हैं। अन्यथा इस मसले को समीकरण के हिसाब से नया रंग भी दिया जा सकता था। जो लोग सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी किसी साजिश का अंदेशा व्यक्त कर रहे हैं, वह इसे दूसरी दिशा में मोड़ भी सकते थे। अखिलेश ने कहा कि सरकार के इशारे पर मुझे बदनाम करने की साजिश की गई। यदि गंजेड़ी या स्मैकिए टोंटी निकाल ले गए तो इसका खुलासा भी जांच से ही हो सकता है। इस प्रकरण पर राजनीतिक पार्टियों के आरोप प्रत्यारोप अपनी जगह पर है। लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और राज्यपाल के लिए अनुचित टिप्पणियों से बचना चाहिए। संघ के प्रचारकों का तो अपना कोई निजी आवास भी नहीं होता। उन्हें किसी पूर्व मुख्यमंत्री के बंगले से क्या लेना देना। बीजेपी पर चाहे जितना हमला बोला जाए, उस पर किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। बीजेपी उसका जबाब देगी। इसी प्रकार राज्यपाल द्वारा विधि के अनुसार जांच कराने के सुझाव पर भी नाराजगी अनुचित थी। खासतौर पर तब जबकि जांच की मांग पहले से की जा रही थी।

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